
प्रस्तावित उद्धरण: मोहंती, अबिनाश। 2020। प्रिपेयरिंग इंडिया फॉर एक्सट्रीम क्लाइमेट इवेंट्स: मैपिंग हॉटस्पॉट्स एंड रिस्पांस मकैनिज्म। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू)
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
यह भारत के चक्रवात, बाढ़ और सूखे जैसे चरम जलवायु घटनाओं का जिला-स्तरीय आकलन करने वाला अपनी तरह का पहला अध्ययन है। इसमें जटिलताओं और गैर-रेखीय रुझानों व पैटर्न पर चर्चा करने वाले जिला-स्तरीय आकलन तैयार करने के लिए स्थानिक (spatial) और कालिक (temporal) मॉडलिंग का उपयोग किया गया है। जलवायु आपदाओं की आवृत्ति के अलावा, यह अध्ययन संबंधित घटनाओं के पैटर्न और उनके प्रभावों के आपस में मिलने के कारणों की भी जांच करता है। इसके अतिरिक्त, यह देश के भीतर उप-क्षेत्र स्तरों पर जलवायु घटनाओं के रुझानों में बदलाव का भी विश्लेषण करता है। 50 वर्षों (1970-2019) बीते हुए समय के स्तर पर चरम जलवायु घटनाओं की सूची बनाने के लिए, यह अध्ययन पंचवर्षीय दशकीय विश्लेषण (pentad decadal analysis) का उपयोग करता है।
इस अध्ययन में चर्चा की गई चरम जलवायु घटनाओं का वर्गीकरण

जलवायु परिवर्तन मानव-निर्मित और प्राकृतिक पारिस्थितिकी-तंत्र के साथ-साथ मानव-केंद्रित और आर्थिक गतिविधियों के सामने अभूतपूर्व चुनौतियां खड़ी की है। इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण, तर्क संगत रूप से, चरम मौसम की आवृत्ति में हुई बढ़ोतरी है। जलवायु परिवर्तन प्रेरित चरम मौसम की घटनाओं के कारण 1999-2018 के दौरान पूरे विश्व में 4,95,000 इंसानी मौतें हुईं। इसके अलावा, इस अवधि में 12,000 से अधिक चरम मौसम की घटनाओं के कारण 3.54 ट्रिलियन यूएस डॉलर (क्रय शक्ति समता या पीपीपी के संदर्भ से) का नुकसान हुआ। परिवर्तित जलवायु की पृष्ठभूमि में, मौसमी और जलवायु संबंधी घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता, स्थानिक सीमा, अवधि और पैटर्न भी बदल रहे हैं, जिससे जलवायु की अप्रत्याशित चरम स्थितियां देखने को मिल रही है (झाई एवं अन्य, 2018)।
जलवायु जोखिम सूचकांक, 2018 के अनुसार, भारत क्लाइमेट वल्नरेबिलिटी रैंकिंग में नौ स्थान ऊपर बढ़ गया, और पूरे विश्व में पांचवां सर्वाधिक जलवायु सुभेद्य देश बन गया (जर्मन वॉच, 2018)। तूफान बढ़कर चक्रवातों में बदल रहे हैं, सूख आधे से ज्यादा देश को प्रभावित कर रहा है, और अभूतपूर्व पैमाने पर आने वाली बाढ़ से बहुत ज्यादा नुकसान हो रहा है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जलवायु परिवर्तित हो रही है और बहुत तेजी से परिवर्तित हो रही है।
वैश्विक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और प्रादेशिक (subnational) स्तर पर जलवायु गतिविधियां पृथ्वी के तापमान में किसी भी बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, हमें इस ‘लक्ष्य’ तापमान वृद्धि के परिणामों पर विचार करना चाहिए, क्योंकि चरम मौसमी घटनाओं का वर्तमान रुझान पिछले 100 वर्षों में 0.6 डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि का परिणाम है (आईएमडी 2019)।
यह रिपोर्ट भारत में जलवायु की चरम घटनाओं का सूक्ष्म-स्तरीय जोखिम मूल्यांकन पेश करती है। भू-स्थानिक, सामयिक विश्लेषण के जरिए हम जिलास्तर पर चरम मौसम की घटनाओं के प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन उपलब्ध कराते हैं। चरम मौसमी घटनाओं के लिए हॉटस्पॉट जिलों और जलवायु परिवर्तन परिदृश्य की पहचान करने के लिए, हमने भारत में चरम मौसमी घटनाओं के पंचवर्षीय दशकीय विश्लेषण (1970-2019) का उपयोग किया है (देखें चित्र ईएस1)। अध्ययन इस पर बात करता है कि स्थानीय स्तर पर व्यापक जोखिम मूल्यांकन आज के समय की मांग है और यह भारत के सभी जिलों में किया जाना चाहिए। यह अध्ययन जल-मौसम संबंधित आपदाओं के मिश्रित जोखिम और उनके एकीकृत प्रभावों का भी अवलोकन करता है। हमारे विश्लेषण के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप ने 1970 के बाद से 478 से अधिक चरम मौसमी घटनाएं देखी हैं और 2005 के बाद उनकी आवृत्ति में तेजी आई है।
चित्र ईएस1 - 75 प्रतिशत से अधिक भारतीय जिले चरम जलवायु की घटनाओं के हॉटस्पॉट हैं
स्रोत: लेखक का विश्लेषण
हमारे विश्लेषण के अनुसार, भारत ने 2000-2019 में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ 1970 से लेकर 2019 तक चरम मौसम की घटनाओं में अत्यधिक तेज वृद्धि देखी है। विशेषता आधारित मानचित्रों की उपलब्धता के कारण हमने पंचवर्षीय दशकीय विश्लेषण के लिए 2005 को प्राथमिक रूप से संदर्भ वर्ष माना, जिन्हें हमने इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) से प्राप्त किया था। हालांकि, यह अध्ययन अन्य घटनाओं पर आंकड़ों की कमी के चलते केवल जल-मौसमी आपदाओं पर केंद्रित है। हमने इमरजेंसी इवेंट डेटाबेस (ईएम-डीएटी) मानकों के अनुरूप 1970-2019 के लिए चरम घटनाओं का जिला-स्तरीय रोस्टर विकसित किया और भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), और कृषि मंत्रालय के आंकड़ों का उपयोग करके इसे और भी अद्यतन (अपडेट) किया है।
हमारे विश्लेषण में मिला कि भारत के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के कई हिस्सों में बाढ़ और सूखा सामान्य बात हो गई है। चित्र ईएस1 भारत में चरम जलवायु घटनाओं वाले हॉटस्पॉट जिलों को दर्शाता है। हमारा अनुमान है कि 2005 के बाद की अवधि में भारत में कम से कम 55 या उससे ज्यादा जिलों में वर्ष-दर-वर्ष भीषण बाढ़ की घटनाएं देखी गईं (भारत में सालाना 97.51 मिलियन लोग भीषण बाढ़ की घटनाओं से प्रभावित होते हैं)। वर्षास्तर में बढ़ोतरी बाढ़ की भीषण या चरम घटनाओं को बढ़ा रही है, जिससे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो रहा है और जान, माल, आजीविका और संपत्तियों की व्यापक हानि से सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना अव्यवस्थित हो रहा है। इसी तरह 79 जिलों में वर्ष-दर-वर्ष भीषण सूखे की घटनाएं देखी गईं (140.06 मिलियन लोग भीषण सूखे की घटनाओं से प्रभावित हुए), और 24 जिलों में प्रतिवर्ष अत्यधिक चक्रवात की घटनाएं देखी गईं (42.50 मिलियन लोग तूफान, भीषण चक्रवात और संबंधित घटनाओं से प्रभावित हुए)। 1970-2005 की अवधि में 250 चरम जलवायु की घटनाएं हुईं, 2005 के बाद की अवधि में 310 चरम मौसम और संबंधित घटनाएं दर्ज की गईं (जिनमें लू और शीत लहर जैसी धीमी शुरुआती वाली घटनाएं शामिल हैं)। बार-बार आने वाली बाढ़ और सूखा, भारत में खाद्य और जल सुरक्षा के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की है। हमारे विश्लेषणों से सामने आए अनुभवजन्य साक्ष्य बढ़ते सूक्ष्म तापमान के कारण मानसून के कमजोर होने से भी मेल खाते हैं। इसे इस तथ्य से भी सत्यापित किया जा सकता है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने गर्मियों के दौरान रिकॉर्ड तोड़ तापमान और कमजोर मानसून के चलते 2015 में पानी की भारी कमी का सामना किया था।
हमने पाया है कि भारत के कुछ क्षेत्रों (जिलों) में चरम घटनाओं का पैटर्न बदल रहा है। जैसे कुछ सूखा-प्रवण जिले बाढ़-प्रवण बन रहे हैं और बाढ़-प्रवण जिले सूखे की चपेट में आ रहे हैं। राजकोट, सुरेंद्रनगर, अजमेर, जोधपुर, औरंगाबाद और ऐसे कुछ अन्य जिले हैं, जहां पर हमने बाढ़ से सूखे की दिशा में बदलाव की प्रवृत्ति देखी है। बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और तमिलनाडु के कुछ जिलों में सूखे और बाढ़ की घटनाएं एक साथ देखी गईं। ये रुझान वास्तव में चिंताजनक हैं और स्थानीय स्तर पर व्यापक जोखिम मूल्यांकन करने की मांग करते हैं, जिसमें संयुक्त प्रभावों को चिन्हित करने के लिए एक ग्रिड-स्तरीय जलवायु विश्लेषण की आवश्यकता होती है।
हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में कई क्षेत्रों (जिलों) में माइक्रो-क्लाइमेटिक जोन परिवर्तित हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण माइक्रो-क्लाइमेट जोन,कोपेन-गीजर वर्गीकरण के आधार पर वर्गीकृत, बदल रहे हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है कि माइक्रो-क्लाइमेट जोन में बदलाव सभी क्षेत्रों में गंभीर उथल-पुथल को बढ़ावा दे सकता है। उदाहरण के लिए, वार्षिक औसत तापमान में प्रत्येक 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी कृषि उत्पादकता को 15-20 प्रतिशत तक घटा देगी। बाढ़ और चक्रवात की उच्च संभावना वाले जिले 'सीडब्ल्यूए' (मानसून-प्रभावित आर्द्र उपोष्ण-कटिबंधीय जलवायु) श्रेणी, और सूखे की उच्च संभावना वाले जिले 'बीएसएच' (गर्म अर्ध-शुष्क जलवायु) श्रेणी में आते हैं। बाढ़-आधारित क्लाइमेट जोन एडब्ल्यू उष्णकटिबंधीय की तरफ जा रहे हैं, जिसकी पहचान शुष्क मौसम से होती है, इसलिए, अनुभवजन्य रूप से यह सिद्ध होता है कि बाढ़ की उच्च संभावना वाले क्षेत्र सूखे की उच्च संभावना वाले क्षेत्र बन रहे हैं। जैसा कि क्लाइमेट जोन परिवर्तन से स्पष्ट है, एक ओर चक्रवात के हॉटस्पॉट सीडब्ल्यूए से एडब्ल्यू उष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों की दिशा में बदल रहे हैं, वहीं अर्बन हीट आइलैड (यूएचआई) प्रभाव और समुद्री जलस्तर में वृद्धि चक्रवाती विक्षोभों को गर्म क्षेत्रों की तरफ धकेल रही है। सूखे की घटनाएं बहुत ज्यादा तेज हो रही हैं, और इस विश्लेषण के अनुभवजन्य साक्ष्य बताते हैं कि दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सूखा पड़ने की संभावना लगातार बढ़ रही है।
जहां एक तरफ चरम जलवायु की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, वहीं पर हमारे पास सेंडाई फ्रेमवर्क के अनुपालन के लिए एक दशक से भी कम समय बचा है। ऐसे में योजना में सुधार और नीति कार्यान्वयन के लिए जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभावों को घटाने की दिशा में बहुत ज्यादा ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। निश्चित तौर पर, लचीलापन निर्माण करने की भारतीय रणनीति के मूल में जोखिम मूल्यांकन सिद्धांत होना चाहिए। यद्यपि वैश्विक, राष्ट्रीय और प्रादेशिक गतिविधियां 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे की सीमा को लक्षित कर रही हैं, इन चरम घटनाओं से उत्पन्न होने वाली गंभीर चुनौतियों पर ध्यान देना जरूरी है, खासकर कमजोर वर्गों और क्षेत्रों के सामने आने वाली चुनौतियों पर। चरम जलवायु घटनाएं विनाशकारी सिद्ध होती हैं, प्राकृतिक और मानव निर्मित इकोसिस्टम को नुकसान पहुंचाती हैं, क्योंकि ये नॉन-लीनियर होती हैं यानी इनका अनुमान करना मुश्किल होता है। हमारा विश्लेषण ऐसे प्रमुख सुझाव देता है, जो लचीले विकल्पों की दिशा में प्रयासों को गति दे सकते हैं। कुछ सुझावों में एक व्यापक जलवायु जोखिम मानचित्र (comprehensive climate risk atlas) तैयार करना, सभी क्षेत्रों में सभी स्तरों पर जलवायु जोखिम आकलन को मुख्यधारा में लाना, नवाचारयुक्त जोखिम वित्तपोषण उपायों के माध्यम से वित्तपोषण में अंतरों को भरना, और लचीलापन व अनुकूलन क्षमता को बढ़ाना शामिल है। अब समय आ गया है कि हम आपदा जोखिमों के शमन और संभावित जलवायु अनिश्चितताओं का सामना करने की बेहतर तैयारी करने के लिए अपने दृष्टिकोण पर नए सिरे से विचार करें और उसे नई दिशा दें।
भारत, विश्व के सर्वाधिक सुभेद्य देशों (vulnerable countries) में से एक है और इसका जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति जोखिम प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में 575 से अधिक जिले जल-मौसम आपदाओं के संयुक्त प्रभावों से प्रभावित हैं। ऐतिहासिक समय शृंखला (historical time series) का विश्लेषण करके यह अध्ययन चरम जलवायु घटनाओं की संरचना को रेखांकित करते हुए जिलास्तर पर बदलती जलवायु का साक्ष्य उपलब्ध कराता है। इस अध्ययन से मिली एक प्रमुख सीख है कि व्यापक जोखिम मूल्यांकन के लिए सुभेद्यता मूल्यांकन (vulnerability assessments) के पारंपरिक दृष्टिकोण को उन्नत बनाने की जरूरत है। किसी भी जोखिम-मूल्यांकन प्रक्रिया के लिए जोखिम मूल्यांकन के सिद्धांतों का पालन इसके मूल में रहना चाहिए और इसे यथासंभव व्यापक सीमा तक लागू करना चाहिए (सीईईडब्ल्यू 2015)। इससे हमें जोखिम मूल्यांकन के जोखिम मूल्यांकन, सुभेद्यता मूल्यांकन और संयुक्त घटनाओं के मूल्यांकन जैसे विभिन्न हिस्सों को विस्तार से समझने में मदद मिलेगी (ओमर एवं अन्य 2014)। उदाहरण के लिए, अब तक चरम जलवायु घटनाओं की अधिकतर चर्चाओं में उन संबद्ध घटनाओं और प्रक्रियाओं की जानकारी जुटाना (mapping) शामिल नहीं था, जो प्रभावों को बढ़ाती हैं। हमारे अध्ययन के प्रमुख सुझाव इन पांच पहलुओं पर केंद्रित हैं: जलवायु जोखिम का एटलस तैयार करना, एक एकीकृत आपातकालीन निगरानी प्रणाली का विकास करना, जोखिम मूल्यांकन को मुख्यधारा में लाना, अनुकूलन व लचीलेपन की क्षमता को बढ़ाना, जोखिम-मूल्यांकन प्रक्रिया में सभी हितधारकों की भागीदारी बढ़ाना और स्थानीय, प्रादेशिक, राष्ट्रीय योजनाओं का एकीकरण करना।
क्लाइमेट रिस्क एटलस (सीआरए) विकसित करना
हमारा जोखिम मूल्यांकन अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उच्च क्षमता के साथ संयुक्त जोखिमों की पहचान करने से तैयारियां उन्नत होंगी और नीतियां व नियोजन की क्लाइमेट-प्रूफिंग सक्षम बन सकेगी। हमारा विश्लेषण आगे सुझाव देता है कि 2005 के बाद 310 से ज्यादा चरम जलवायु घटनाओं और संबंधित घटनाओं ने विनाशकारी प्रभाव डाला है और अल्पकालिक समय सीमा में जलवायु जोखिमों का अनुमान करना बेहद जरूरी है। क्लाइमेट रिस्क एटलस (सीआरए) रिस्क मीट्रिक मॉडलिंग के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों और तत्वों में विशिष्ट जलवायु जोखिमों से आने वाले खतरों को समझने, उनकी पहचान और मापन करने के लिए एक आधार प्रदान करेगा। इससे अल्पकालिक समयसीमा में लचीलापन युक्त समुदायों, देशों और क्षेत्रों के निर्माण के लिए साक्ष्य तैयार होंगे, जो सूक्ष्म जलवायु संबंधी आकलनों को भी ध्यान में रखते हैं। यह क्लाइमेट रिस्क एटलस गतिशीलता के साथ विश्लेषित किए गए हाई-रेज़ोल्यूशन मानचित्रों (dynamically analysed high-resolution maps) के साथ क्लाउड कंप्यूटिंग इंटरफेस पर एक जोखिम-सूचित निर्णयन-कर्ता टूलकिट (risk-informed decision-making toolkit) होगा। यह विभिन्न क्षेत्रों के लिए घटते क्रम में जोखिम रेटिंग सूचकांकों (downscaled risk rating indices) के माध्यम से जलवायु जोखिमों के प्रभावों को मापने में मदद करेगा। यह एटलस अति-महत्वपूर्ण, आपातकालीन, परिवहन और संबंधित क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे की क्लाइमेट-प्रूफिंग में सहायता करेगा।
एक एकीकृत आपातकालीन निगरानी प्रणाली (आईईएसएम) विकसित करना
आपदा और आपातकालीन प्रबंधन के मामले में, प्रभावी तैयारी (effective preparedness) एक दीर्घावधि, एकीकृत और बहुआयामी दृष्टिकोण है। यह प्रशासनिक ढांचे और सामुदायिक तैयारियों को मजबूत बनाता है और लचीलेपन व अनुकूलन (resilience and adaptation) को व्यवस्थित ढंग से तैयार करता है (सीईईडब्ल्यू 2020)। हमारा विश्लेषण बताता है कि भारतीय उपमहाद्वीप का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्से के सामने जल-मौसम संबंधी आपदाओं का खतरा मौजूद है, और इसलिए इसकी निगरानी करना आवश्यक है। यह जोखिम आकलन एक राष्ट्रव्यापी, केंद्रीकृत, सुरचित और रियल टाइम डिजिटल डिजास्टर/इमरजेंसी सतर्कता और प्रबंधन प्रणाली के विकास में और अधिक मदद कर सकता है। राष्ट्रीय स्तर पर आपातकालीन स्थितियों से जुड़ी तैयारियों की सभी गतिविधियों की सेवा देने के लिए, गृह मंत्रालय राष्ट्रीय एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) डेटाबेस और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एसडीएमए) की बुनियादी निगरानी और ट्रैकिंग प्रणाली को बढ़ा सकता है, जिसमें सुभेद्यता मूल्यांकन और जोखिम मूल्यांकन के परिणाम पूरक हो सकते हैं।
सभी स्तरों पर जोखिम मूल्यांकन को मुख्यधारा में लाना
जैसा कि हमने पहले रेखांकित किया है, व्यापक जोखिम मूल्यांकन करने के लिए जलवायु विज्ञान या मौसम संबंधी अध्ययनों को निरंतर, भरोसेमंद और उच्च-क्षमता के ऐतिहासिक आंकड़ों की उपलब्धता बहुत जरूरी है। जोखिम मूल्यांकन हमें तैयारियों (preparedness) की एक सीमा निर्धारित करने में सहायता करता है। यद्यपि जोखिम अनिश्चित होते हैं, लेकिन संभावित नुकसान को घटाने के लिए तैयारी (preparation) निश्चित और सामूहिक कार्रवाई की सीमा में होती है। जोखिम मूल्यांकन में कुछ प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष, परिवर्तनकारी और उभरते हुए जोखिमों पर बहुत सटीक ध्यान देने की जरूरत होती है, जो सर्वाधिक सुभेद्य समुदायों और क्षेत्रों के सामने दीर्घकालिक और गैर-दीर्घकालिक आपदाएं खड़ी करते हैं। किसी भी जोखिम मूल्यांकन का पहला कदम जोखिम की पहचान करना यानी स्थानीय, प्रादेशिक, क्षेत्र विशेष और विभिन्न क्षेत्रों के स्तर पर जोखिमों को चिन्हित करना है। जोखिम पहचान (Risk assessments) को द्वितीयक (कृषि और श्रम उत्पादकता, औद्योगिक मूल्य, दबावपूर्ण प्रवासन और जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान इत्यादि) और तृतीयक (संसाधन की कमी के कारण संघर्ष और राजस्व) स्तरों पर हानि व क्षति की सीमा पर भी सटीकता से ध्यान देना चाहिए। कम से कम संभावित निम्न स्तर पर जोखिम मूल्यांकन में समस्या के बारे में सामान्य भाषा में विवरण होना चाहिए। प्रत्येक आपदा और क्षेत्र के लिए लॉस प्रीसिडेंस कर्व आइडेंटिफिकेशन के माध्यम से, जोखिम पहचान को व्यापक और सूक्ष्म जलवायु स्तरों पर जलवायुगत और मौसमगत प्रक्रियाओं को शामिल करने की जरूरत है।
अनुकूलन और सहने की क्षमता (लचीलापन) को बढ़ाना
हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि सूक्ष्म जलवायु क्षेत्र में बदलाव की प्रवृत्ति है, जिससे सूखाग्रस्त क्षेत्र बाढ़ग्रस्त होते जा रहे हैं और बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र सूखा से प्रभावित हो रहे हैं। इस बदलते पैटर्न के कारण जीवन, आजीविका और निवेश को जलवायु परिवर्तन से सुरक्षित रखने के लिए अनुकूलन और लचीलापन क्षमता को बढ़ाने की आवश्यकता होगी। आपदा जोखिम शमन योजनाओं के कार्यान्वयन के स्तर पर भी क्षमता सीमित है। हम जिस दृष्टिकोण से अनुकूलन और लचीलेपन की क्षमता का निर्माण करते हैं, वह इस पर आधारित होना चाहिए कि हम क्या जानते हैं, क्या हो सकता है और क्या किया जा सकता है। उपयुक्त मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) को तैयार किया जाना चाहिए और नियोजन व डिजाइनिंग में सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। लचीलेपन को बढ़ाने के लिए इसे जमीनी स्तर पर परिचालन प्रशिक्षण (operational training) के साथ जोड़ना चाहिए। राज्य और जिला-स्तरीय आपदा योजनाएं विभिन्न तरह के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को सूचीबद्ध करती हैं। यदि उच्च क्षमता के जोखिम मूल्यांकन के साथ मिलान करके देखें तो विकासात्मक परियोजना नियोजन (developmental project planning) में आपदा जोखिम न्यूनीकरण को मुख्यधारा में लाने से हानि व क्षति को घटाया जा सकता है। यह अनुकूलन क्षमता प्रशिक्षण केवल सरकारी पदाधिकारियों पर ही केंद्रित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें राजमिस्त्रियों, वास्तुकारों, डिजाइनरों और अग्रिम पंक्ति के अन्य प्रासंगिक हितधारकों को भी शामिल करना चाहिए।
जोखिम मूल्यांकन प्रक्रियाओं में सभी हितधारकों की भागीदारी को बढ़ाना
2015 में जोखिम मूल्यांकन पर सीईईडब्ल्यू के एक वैश्विक अध्ययन ने भागीदारीपूर्ण जुड़ाव के महत्व को रेखांकित किया था और यह भागीदारी लचीलेपन के निर्माण की कुंजी है। किसी भी जोखिम मूल्यांकन प्रक्रिया की शुरुआत में ही नीति-निर्माताओं और निर्णयकर्ताओं को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि समस्याओं की पहचान हो सके और समाधान व्यावहारिक हों (सीईईडब्ल्यू 2015)। जोखिम मूल्यांकन के दायरे में जलवायु वैज्ञानिकों के अतिरिक्त सार्वजनिक नीति, आर्थिक, बीमा और उद्योग भागीदारों को शामिल किया जाना चाहिए, जिनके पास विभिन्न स्तरों पर जोखिम-सूचित नियोजन (risk-informed planning) की मुख्य जिम्मेदारी है। अक्सर जोखिम-मूल्यांकन प्रक्रिया जलवायु परिवर्तन से प्रभावित लोगों को हाशिए पर रख देती है। समुदायों के पास भले ही वैज्ञानिक विशेषज्ञता न हो, लेकिन उनके पास पारंपरिक प्रबंधन पद्धतियां हैं और ये ऐसे आसान और कारगर उपाय हैं, जिन्हें बगैर किसी वित्तीय बोझ के सामुदायिक स्तर पर उपयोग में लाया जा सकता है। शमन, अनुकूलन और लचीलापन-निर्माण के प्रयासों को अलग-अलग काम नहीं करना चाहिए, इसकी जगह पर शमन और अनुकूलन के सह-लाभों को समझने वाला दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। दीर्घावधि और अल्पावधि जोखिम अनुमानों में सह-लाभों और जोखिम संवेदनशीलता कार्यों (hazard sensitivity functions) को शामिल करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
स्थानीय, प्रादेशिक और राष्ट्रीय योजनाओं में जोखिम मूल्यांकन को एकीकृत करना
जैसा कि हम सेंडाई फ्रेमवर्क के पहले चरण को पूर्ण करने के नजदीक हैं, तब यह समझना जरूरी है कि समर्पित योजनाएं, भले ही महत्वपूर्ण होती हैं, अक्सर कार्य व वित्तीय आवंटन में दोहराव को बढ़ावा देती हैं। भारत में योजनाओं में राष्ट्रीय आपदा योजनाओं से लेकर डीआरआर की निगरानी वाली राज्य और जिला आपदा योजनाएं तक शामिल होती हैं। इसी तरह से जलवायु गतिविधियों के लिए हमारे पास राष्ट्रीय स्तर पर एनएपीसीसी (नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज) और राज्य स्तर पर एसएपीसीसी (स्टेट एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज) हैं। हमारा विश्लेषण यह सुझाव देता है कि वर्तमान में 1.0921 अरब लोगों के सामने चरम जलवायु घटनाओं और संबंधित जलवायु घटनाओं का खतरा मौजूद है। ये योजनाएं अपने नियोजन और कार्यान्वयन में देश या राज्यों के स्तर पर जोखिम आकलनों के बारे में विचार नहीं करती हैं (मैकबीन एवं अन्य 2012)। इन योजनाओं को सभी स्तरों पर मुख्यधारा में लाने और एकीकृत करने की जरूरत है। ये सभी योजनाएं कारकों और मानकों के एक अलग समूह के साथ जोखिम शमन और लचीलापन निर्माण (mitigating risks and building resilience) पर ध्यान देती हैं। हानि और क्षति का शमन एक एकीकृत दृष्टिकोण की जरूरत रेखांकित करता है, जहां सभी गतिविधियों में तालमेल होना चाहिए और उनके मूल्यांकन के मानक एक समान होने चाहिए। इस एकीकृत दृष्टिकोण में क्षेत्रीय और सामाजिक-आर्थिक दोनों संकेतक शामिल होने चाहिए।
Roadmap of the methodology to assess the climate co-benefits of the SUP ban in Tamil Nadu
Unlocking finance for NbS in Indian Cities
Locally-led Climate Action in the Global South
Towards Climate-resilient Indian Industries:
Roadmap of the methodology to assess the climate co-benefits of the SUP ban in Maharashtra