
प्रस्तावित उद्धरणः प्रभु, श्रवण और विश्वास चितले. 2024. डिकोडिंग इंडियाज चेंजिंग मानसून पैटर्नः ए तहसील-लेवल असेसमेंट. न्यू दिल्लीः काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरमेंट एंड वॉटर।
डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
यह अध्ययन दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) और उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर से दिसंबर) के दौरान संपूर्ण भारत में उप-जिलास्तर (तहसील स्तर) पर मानसून के बदलते पैटर्न का आकलन करता है। यह अध्ययन पिछले चार दशकों (1982-2022) के रुझानों का विश्लेषण करता है, जिसमें पिछले एक दशक में बारिश पैटर्न में हुए परिवर्तनों को मापने पर विशेष जोर दिया गया है। हमने विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा समर्थित स्थापित सांख्यिकीय मानदंडों और सूचकांकों (established statistical criteria and indices) का उपयोग करके यह जलवायु-वैज्ञानिक विश्लेषण किया है।
भारतीय मानसून की सूक्ष्म-जलवायु परिवर्तनशीलता को मान्यता (micro-climatic variabilities) देते हुए, यह अध्ययन स्थानीय स्तर पर जलवायु कार्य योजनाओं को विकसित करने का सुझाव देता है। इसका उद्देश्य अनुलग्नक प्रारूप में मानसून के आंकड़ों की विस्तृत जानकारी देते हुए स्थानीय स्तर पर नीति-निर्धारकों और प्रशासकों की सहायता करना है, ताकि इसे तहसील स्तर पर मानसून के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए उपयोग किया जा सके।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून बहुत महत्वपूर्ण है और इसे अक्सर कृषि क्षेत्र की रीढ़ कहा जाता है, जो भारत की आधी से अधिक आबादी को रोजगार देता है। मानसून जल संसाधन प्रबंधन और जल आधारित स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, भारतीय मानसून की परिवर्तनशीलता (उतार-चढ़ाव) और उससे जुड़ी आर्द्र व शुष्क स्थितियों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सहित देश के सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर सीधा असर पड़ता है (गाडगिल और गाडगिल 2006; वांग, गाडगिल और कुमार 2006; गुलाटी, सैनी और जैन 2013)।
केवल 2022 में, एशिया ने 81 से ज्यादा प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया, जिनमें से 83 प्रतिशत आपदाएं जल-मौसम से संबंधित रहीं। भारत को, मुख्य रूप से मानसून के कारण आई बाढ़ से, काफी नुकसान हुआ (डब्ल्यूएमओ 2023)। भारतीय मानसून अपने स्वभाव के कारण भले ही विभिन्न स्थान और समय में उच्च परिवर्तनशीलता को दिखाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के वर्तमान रुझानों से संकेत मिलता है कि हम उम्मीद से पहले ग्लोबल वार्मिंग का रिकॉर्ड तोड़ देंगे (डब्ल्यूएमओ 2023)। ऐसे में, हमें इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने की जरूरत है कि ये जलवायु परिवर्तन भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जलवायु परिघटना यानी मानसून की परिवर्तनशीलता को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।
उपलब्ध शोध साहित्य में विभिन्न प्रतिनिधिकारी संकेंद्रण विकल्पों (representative concentration pathways) के तहत मध्यम अवधि (2025 तक) और दीर्घ अवधि (2100 तक) में केंद्रीय मानसून क्षेत्रों में बढ़ी हुई बारिश के साथ मानसून के मौसमों की सघनता पूर्वानुमान लगाया गया है। फिर भी, अल्पकालिक सूक्ष्म स्थानिक परिवर्तनशीलता को दर्ज कर पाना एक चुनौती रही है, खास तौर पर जिलास्तर से आगे। मौजूदा आकलन अक्सर मोटे आधारों पर लंबी अवधि की दीर्घकालिक प्रवृत्तियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और महीनों व दिनों में विस्तृत मौसमों के अंदर की जटिल बारीकियों, या यहां तक कि एक ही जिले के भीतर की विविधताओं को ध्यान में नहीं रख पाते हैं।
अल्पकालिक परिवर्तनशीलता के उन्नत विश्लेषणों में इस कमी को दूर करने और भारतीय मानसून की जटिलताओं को सुलझाने के लिए, हमने भारत का उप-जिलास्तर पर मानसून की परिवर्तनशीलता का पहला आकलन किया है। भारत में उप-जिले को तहसील, तालुका, मंडल, सर्किल और उप-प्रभाग के रूप में जाना जाता है। हालांकि, हमने अपने अध्ययन में इन प्रशासनिक इकाइयों के लिए देश के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित नाम के साथ तालमेल लाने के लिए इन्हें तहसील के रूप में संदर्भित किया है। हमने बताया है कि इंटर-एनुअल वेरिएबिलिटी (वर्ष-दर-वर्ष सामने आने वाली परिवर्तनशीलता) और इंट्रा-एनुअल वेरिएबिलिटी (किसी वर्ष के भीतर होने वाले परिवर्तन और आर्द्र व शुष्क चरम स्थितियां) के संदर्भ में दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व मानसून के दौरान पूरे भारत में बारिश का पैटर्न कैसे बदल रहा है।
इस आकलन के लिए, हमने इंडियन मानसून डेटा एसिमिलेशन एंड एनालिसिस प्रोजेक्ट (आईएमडीएए) से प्राप्त सबसे नए 12-किमी हाई-रिजॉल्यूशन रि-एनालिसिस आंकड़ों का उपयोग किया है। सर्वे ऑफ इंडिया से प्राप्त शेपफाइल (shapefile) के अनुसार, 12-किमी स्थानिक ग्रिड (12-km spatial grid) में 4,723 तहसीलों में से 4,419 तहसीलें शामिल हैं। हमारा आकलन पिछले चार दशकों (1982-2022) के रुझानों को रेखांकित करता है, जिसमें पिछले दशक (2012-2022) में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जिसे जेजेएएस कहा जाता है, क्योंकि यह जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर महीने तक फैला होता है) और उत्तर-पूर्व मानसून (जिसे ओएनडी कहा जाता है, क्योंकि यह अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर महीने तक होता है) के दौरान बारिश के पैटर्न में आए बदलावों का पता लगाने पर विशेष जोर दिया गया है। हमने इन परिवर्तनों का सटीक आकलन और मापन करने के लिए विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) से मान्यता प्राप्त स्थापित सांख्यिकीय मानदंडों और सूचकांकों का उपयोग करके एक भू-स्थानिक जलवायु संबंधी विश्लेषण किया।
चित्र ईएस1 पिछले दशक में देश के अधिकांश हिस्सों में जेजेएएस बारिश में वृद्धि हुई है, लेकिन सिंधु-गंगा के मैदानों, पूर्वोत्तर भारत और भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कमी आई है।
चित्र ईएस2 पिछले दशक में भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों तटों पर अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर (ओएनडी) बारिश में वृद्धि देखी गई है
चित्र ईएस3 उत्तर और पूर्व क्षेत्रों की अधिकांश तहसीलों में मासिक बारिश में अधिक परिवर्तनशीलता देखी गई है
स्रोत: लेखक का विश्लेषण
नोटः प्रशासनिक सीमा की शेपफाइल में तहसील-स्तरीय नाम से जुड़ी जानकारी उपलब्ध न होने के कारण जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और लक्षद्वीप जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।
डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत को प्रभावित करने वाला प्रमुख मानसून है, जो जून से सितंबर तक रहता है। जून के आस-पास, मानसून दक्षिण-पश्चिमी तट पर केरल से होकर धीरे-धीरे पूरे देश में आगे बढ़ता है। इस मानसून के आने का बेसब्री से इंतजार होता है, क्योंकि यह चिलचिलाती गर्मी से राहत देता है और भारत के विविधतापूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और अर्थव्यवस्था, खासकर खरीफ फसलों की खेती में महत्वपूर्ण योगदान देता है। भारत, उत्तर-पूर्व मानसून से भी प्रभावित होता है, जिसे शीतकालीन मानसून या लौटता हुआ मानसून भी कहा जाता है, जो प्रायद्वीपीय भारत को प्रभावित करता है और अक्टूबर से दिसंबर तक चलता है। यह मानसून दक्षिण-पश्चिमी मानसून की तुलना में कम तीव्र होता है, लेकिन रबी (सर्दियों) फसलों की खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और भूजल रिचार्ज में मदद करता है।
हमारे अध्ययन में यह पता चला है कि भारतीय मानसून की स्वभावगत परिवर्तनशीलता जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक प्रभावित हुई है। पारंपरिक रूप से मानसूनी बारिश के मामले में समृद्ध क्षेत्रों जैसे पूर्वोत्तर भारत, सिंधु-गंगा के मैदान और भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में पिछले एक दशक में मानसूनी बारिश में कमी देखी गई है। इसके विपरीत राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित पारंपरिक रूप से शुष्क क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश में वृद्धि देखी गई। तमिलनाडु में उत्तर-पूर्व मानसून सघन हुआ है और पूर्वी तट पर ओडिशा व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के साथ पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गोवा में अक्टूबर से दिसंबर तक बारिश में वृद्धि देखी गई है।
भारत में मानसून पैटर्न को कई कारक प्रभावित करते हैं। मुख्य कारक भूमि और समुद्र का अलग-अलग स्तर पर गर्म होना है। गर्मियों के दौरान, भारतीय उपमहाद्वीप गर्म हो जाता है, जिससे कम दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं। इस बीच आस-पास के महासागर अपेक्षाकृत कम तापमान बनाए रखते हैं, जिससे उच्च दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं, जिसकी वजह से दबाव प्रवणता (pressure gradient) दक्षिण-पश्चिम मानसून को सक्रिय करती है, हिंद महासागर से नम हवा को खींचती है। अन्य कारकों में अल नीनो-दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation) शामिल है, जिसमें अल नीनो शुष्क परिस्थितियां पैदा करता है और ला-नीना मानसून को बढ़ाता है। हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) भी भूमिका निभाता है, जो समुद्र की सतह के तापमान को प्रभावित करता है। इसके अलावा तिब्बती पठार, पश्चिमी घाट और हिमालय पर्वत जैसी विशेषताएं हवा के पैटर्न पर असर डालती हैं, जिससे सभी क्षेत्रों में बारिश का वितरण (rainfall distribution) प्रभावित होता है।
जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ेगा, वैज्ञानिक समझ है कि वाष्पीकरण में बढ़ोतरी के कारण संपूर्ण बारिश में वृद्धि होगी। इस घटना के परिणामस्वरूप गर्म होती जलवायु के कारण वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में बारिश बढ़ने का अनुमान है। भारत से जुड़ा अनुमान इस रुझान के अनुरूप है और देश में दक्षिण-पश्चिम व उत्तर-पूर्व दोनों ही मानसूनों में भारी बारिश वाले दिनों के साथ-साथ बारिश बढ़ने का अनुमान है। भारत के लिए जलवायु परिवर्तन के पूर्वानुमान इक्कीसवीं सदी के अंत तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में 10-14 प्रतिशत की महत्वपूर्ण वृद्धि के संकेत देते हैं।
बदलते मानसून पैटर्न से अनुकूलन लाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ नीति, अनुसंधान और नागरिक विज्ञान को जोड़ने की जरूरत है। शुरुआत में, अति-स्थानीय स्तर पर नीति-निर्धारण को बढ़ावा देना जरूरी है, जिसमें जिला और शहर के स्तर पर जलवायु कार्य योजनाएं बनाने पर जोर देना चाहिए। इन योजनाओं में कृषि, जल और ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए जलवायु संबंधी जोखिमों का आकलन शामिल होना चाहिए। दूसरा, प्रमुख क्षेत्रों को बदलते पैटर्न के अनुरूप अपने दृष्टिकोणों का रणनीतिक रूप से पुनर्मूल्यांकन और समायोजन करना चाहिए। इसके लिए फसल चक्रों और आपदा प्रबंधन कैलेंडर को नए सिरे से बनाना होगा, ताकि बदलते मानसून की परिवर्तनशील प्रकृति के साथ तालमेल बैठाया जा सके।
Roadmap of the methodology to assess the climate co-benefits of the SUP ban in Tamil Nadu
Unlocking finance for NbS in Indian Cities
Locally-led Climate Action in the Global South
Towards Climate-resilient Indian Industries:
Roadmap of the methodology to assess the climate co-benefits of the SUP ban in Maharashtra