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REPORT
डिकोडिंग इंडियाज चेंजिंग मानसून पैटर्न्स
अ तहसील-लेवल असेसमेंट
17 January, 2024 | Climate Resilience
श्रवण प्रभु और विश्वास चितले

प्रस्तावित उद्धरणः प्रभु, श्रवण और विश्वास चितले. 2024. डिकोडिंग इंडियाज चेंजिंग मानसून पैटर्नः ए तहसील-लेवल असेसमेंट. न्यू दिल्लीः काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरमेंट एंड वॉटर।

डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

यह अध्ययन दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून से सितंबर) और उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर से दिसंबर) के दौरान संपूर्ण भारत में उप-जिलास्तर (तहसील स्तर) पर मानसून के बदलते पैटर्न का आकलन करता है। यह अध्ययन पिछले चार दशकों (1982-2022) के रुझानों का विश्लेषण करता है, जिसमें पिछले एक दशक में बारिश पैटर्न में हुए परिवर्तनों को मापने पर विशेष जोर दिया गया है। हमने विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा समर्थित स्थापित सांख्यिकीय मानदंडों और सूचकांकों (established statistical criteria and indices) का उपयोग करके यह जलवायु-वैज्ञानिक विश्लेषण किया है।

भारतीय मानसून की सूक्ष्म-जलवायु परिवर्तनशीलता को मान्यता (micro-climatic variabilities) देते हुए, यह अध्ययन स्थानीय स्तर पर जलवायु कार्य योजनाओं को विकसित करने का सुझाव देता है। इसका उद्देश्य अनुलग्नक प्रारूप में मानसून के आंकड़ों की विस्तृत जानकारी देते हुए स्थानीय स्तर पर नीति-निर्धारकों और प्रशासकों की सहायता करना है, ताकि इसे तहसील स्तर पर मानसून के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए उपयोग किया जा सके।

मुख्य बिन्दु

  • पिछले 40 वर्षों (1982-2022) के दौरान नई दिल्ली, बेंगलुरु, नीलगिरी, जयपुर, कच्छ और इंदौर जैसे 23 प्रतिशत जिलों ने बारिश की कमी और अत्यधिक बारिश वाले वर्षों को देखा है।
  • पिछले दशक (2012-2022) में 55 प्रतिशत तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली बारिश में वृद्धि और 11 प्रतिशत तहसीलों में कमी देखी गई। बारिश में यह अंतर जलवायु संबंधी आधार रेखा (1982-2011) की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक है। राजस्थान, गुजरात, केंद्रीय महाराष्ट्र और तमिलनाडु की पारंपरिक रूप से अपेक्षाकृत शुष्क तहसीलों में बारिश में सांख्यिकीय रूप से उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
  • जिन 11 प्रतिशत तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वर्षा में कमी दर्ज की गई, उनमें से 68 प्रतिशत तहसीलों ने जून से सितंबर तक सभी महीनों में कम बारिश का सामना किया, जबकि 87 प्रतिशत तहसीलों ने मानसून के शुरुआती महीनों, जून और जुलाई, में बारिश में गिरावट देखी, जो खरीफ की फसलों की बुवाई के लिए महत्वपूर्ण समय होता है। ये तहसीलें भारत के आधे से अधिक कृषि उत्पादन करने वाले सिंधु-गंगा के मैदानों, पूर्वोत्तर भारत और भारत के हिमालयी क्षेत्र में फैली हैं।
  • दक्षिण पश्चिमी मानसून के दौरान पिछले एक दशक में 64 प्रतिशत भारतीय तहसीलों में अधिक बारिश वाले दिनों की आवृत्ति बढ़ी है। यह पैटर्न उच्चतम जीडीपी वाले राज्यों- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक की तहसीलों में बहुत सशक्त है।
  • पिछले एक दशक में, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर) बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गोवा के साथ पूर्वी तट पर ओडिशा और पश्चिम बंगाल की तहसीलों में अक्टूबर से दिसंबर तक की बारिश में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, जो उनकी सामान्य रूप से शुष्क परिस्थितियों के विपरीत है।
  • भारत में 48 प्रतिशत तहसीलों में अक्टूबर महीने में बारिश में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि देखी गई, जिसके पीछे इस उपमहाद्वीप से दक्षिण-पश्चिम मानसून की देर से होने वाली वापसी कारण हो सकती है।

क्या आपके कोई प्रश्न हैं?

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रिसर्च एनालिस्ट
"स्वाभाविक रूप से उच्च अनिश्चिचतता प्रदर्शित वाले भारतीय मानसून में अब जलवायु परिवर्तन के कारण विभिन्न मौसमों और भौगोलिक क्षेत्रों में अधिक तेज बदलाव दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति कृषि, जल और ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती है। बारिश के इस बदलते पैटर्न के खिलाफ लचीलापन विकसित के लिए जरूरत है कि जलवायु जोखिमों के विस्तृत आकलनों के आधार पर स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को मुख्यधारा में लाया जाए। हमारा अध्ययन न केवल इन परिवर्तनों का आकलन पेश करता है, बल्कि तहसीलस्तरीय जानकारियों को उपलब्ध कराते हुए नीति-निर्धारकों को सशक्त बनाता है।"

कार्यकारी सारांश

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मानसून बहुत महत्वपूर्ण है और इसे अक्सर कृषि क्षेत्र की रीढ़ कहा जाता है, जो भारत की आधी से अधिक आबादी को रोजगार देता है। मानसून जल संसाधन प्रबंधन और जल आधारित स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, भारतीय मानसून की परिवर्तनशीलता (उतार-चढ़ाव) और उससे जुड़ी आर्द्र व शुष्क स्थितियों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सहित देश के सामाजिक-आर्थिक पक्षों पर सीधा असर पड़ता है (गाडगिल और गाडगिल 2006; वांग, गाडगिल और कुमार 2006; गुलाटी, सैनी और जैन 2013)।

केवल 2022 में, एशिया ने 81 से ज्यादा प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया, जिनमें से 83 प्रतिशत आपदाएं जल-मौसम से संबंधित रहीं। भारत को, मुख्य रूप से मानसून के कारण आई बाढ़ से, काफी नुकसान हुआ (डब्ल्यूएमओ 2023)। भारतीय मानसून अपने स्वभाव के कारण भले ही विभिन्न स्थान और समय में उच्च परिवर्तनशीलता को दिखाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के वर्तमान रुझानों से संकेत मिलता है कि हम उम्मीद से पहले ग्लोबल वार्मिंग का रिकॉर्ड तोड़ देंगे (डब्ल्यूएमओ 2023)। ऐसे में, हमें इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने की जरूरत है कि ये जलवायु परिवर्तन भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण जलवायु परिघटना यानी मानसून की परिवर्तनशीलता को कैसे प्रभावित कर सकते हैं।

उपलब्ध शोध साहित्य में विभिन्न प्रतिनिधिकारी संकेंद्रण विकल्पों (representative concentration pathways) के तहत मध्यम अवधि (2025 तक) और दीर्घ अवधि (2100 तक) में केंद्रीय मानसून क्षेत्रों में बढ़ी हुई बारिश के साथ मानसून के मौसमों की सघनता पूर्वानुमान लगाया गया है। फिर भी, अल्पकालिक सूक्ष्म स्थानिक परिवर्तनशीलता को दर्ज कर पाना एक चुनौती रही है, खास तौर पर जिलास्तर से आगे। मौजूदा आकलन अक्सर मोटे आधारों पर लंबी अवधि की दीर्घकालिक प्रवृत्तियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और महीनों व दिनों में विस्तृत मौसमों के अंदर की जटिल बारीकियों, या यहां तक कि एक ही जिले के भीतर की विविधताओं को ध्यान में नहीं रख पाते हैं।

अल्पकालिक परिवर्तनशीलता के उन्नत विश्लेषणों में इस कमी को दूर करने और भारतीय मानसून की जटिलताओं को सुलझाने के लिए, हमने भारत का उप-जिलास्तर पर मानसून की परिवर्तनशीलता का पहला आकलन किया है। भारत में उप-जिले को तहसील, तालुका, मंडल, सर्किल और उप-प्रभाग के रूप में जाना जाता है। हालांकि, हमने अपने अध्ययन में इन प्रशासनिक इकाइयों के लिए देश के अधिकांश हिस्सों में प्रचलित नाम के साथ तालमेल लाने के लिए इन्हें तहसील के रूप में संदर्भित किया है। हमने बताया है कि इंटर-एनुअल वेरिएबिलिटी (वर्ष-दर-वर्ष सामने आने वाली परिवर्तनशीलता) और इंट्रा-एनुअल वेरिएबिलिटी (किसी वर्ष के भीतर होने वाले परिवर्तन और आर्द्र व शुष्क चरम स्थितियां) के संदर्भ में दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व मानसून के दौरान पूरे भारत में बारिश का पैटर्न कैसे बदल रहा है।

इस आकलन के लिए, हमने इंडियन मानसून डेटा एसिमिलेशन एंड एनालिसिस प्रोजेक्ट (आईएमडीएए) से प्राप्त सबसे नए 12-किमी हाई-रिजॉल्यूशन रि-एनालिसिस आंकड़ों का उपयोग किया है। सर्वे ऑफ इंडिया से प्राप्त शेपफाइल (shapefile) के अनुसार, 12-किमी स्थानिक ग्रिड (12-km spatial grid) में 4,723 तहसीलों में से 4,419 तहसीलें शामिल हैं। हमारा आकलन पिछले चार दशकों (1982-2022) के रुझानों को रेखांकित करता है, जिसमें पिछले दशक (2012-2022) में दक्षिण-पश्चिम मानसून (जिसे जेजेएएस कहा जाता है, क्योंकि यह जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर महीने तक फैला होता है) और उत्तर-पूर्व मानसून (जिसे ओएनडी कहा जाता है, क्योंकि यह अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर महीने तक होता है) के दौरान बारिश के पैटर्न में आए बदलावों का पता लगाने पर विशेष जोर दिया गया है। हमने इन परिवर्तनों का सटीक आकलन और मापन करने के लिए विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) और भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) से मान्यता प्राप्त स्थापित सांख्यिकीय मानदंडों और सूचकांकों का उपयोग करके एक भू-स्थानिक जलवायु संबंधी विश्लेषण किया।

मुख्य बिन्दु

  • पिछले 40 वर्षों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान, हमने पाया कि एक इकाई के रूप में संपूर्ण भारत ने 29 ‘सामान्य’, 8 ‘सामान्य से अधिक’, और 3 ‘सामान्य से कम’ मानसून वाले वर्षों का अनुभव किया। हालांकि, जिलास्तर पर इन प्रवृत्तियों के विश्लेषण से पता चला कि भारत के लगभग 30 प्रतिशत जिले कम वर्षा वाले वर्षों, जबकि 38 प्रतिशत जिले अत्यधिक वर्षा वाले वर्षों के गवाह रहे। इसमें से नई दिल्ली, बेंगलुरु, नीलगिरी, जयपुर, कच्छ और इंदौर जैसे 23 प्रतिशत जिलों ने कम और अत्यधिक बारिश वाले वर्षों की उच्च संख्या दर्ज की।
  • इन रुझानों को और सूक्ष्मता से समझने पर हमने पाया कि पिछले दशक (2012-2022) में 55 प्रतिशत तहसीलों में दक्षिण-पश्चिम मानसूनी बारिश में क्लाइमेट बेसलाइन (1982-2011) की तुलना में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि देखी गई। राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों की पारंपरिक रूप से शुष्क तहसीलों में जेजेएएस मानसून के दौरान होने वाली बारिश में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण वृद्धि देखी गई।
  • यद्यपि दक्षिण-पश्चिम मानसून में कमी की प्रवृत्ति चालीस वर्षों से सांख्यिकीय रूप से लगातार महत्वपूर्ण नहीं रही, लेकिन हमने पाया कि लगभग 11 प्रतिशत भारतीय तहसीलों में विशेष रूप से पिछले दशक (2012-2022) के दौरान क्लाइमेट बेसलाइन (1982-2011) की तुलना में बारिश में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखी गई। ये तहसीलें भारत के आधे से अधिक कृषि उत्पादन करने वाले सिंधु-गंगा के मैदानों, पूर्वोत्तर भारत और भारतीय हिमालयी क्षेत्र में स्थित हैं। इन क्षेत्रों में नाजुक, लेकिन अत्यधिक विविधतापूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद है। इन तहसीलों ने जून से सितंबर तक सभी महीनों में लगभग 68 प्रतिशत कम बारिश देखी, जबकि जून और जुलाई के शुरुआती मानसूनी महीनों में 87 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज की, जो खरीफ फसलों की बुवाई के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है।
  • स्थानीकृत आर्द्र बारिश चरम (localised wet rainfall extremes) घटनाओं के अध्ययन में, हमने पाया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान लगभग 64 प्रतिशत भारतीय तहसीलों ने पिछले दशक में प्रति वर्ष 1-15 दिनों तक भारी बारिश वाले दिनों की आवृत्ति में वृद्धि देखी। यह पैटर्न उच्च जीडीपी वाले राज्यों- महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और कर्नाटक की तहसीलों में अत्यधिक प्रभावी पाई गई। इसके अलावा, हमने पाया कि दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान जिन तहसीलों ने बारिश में वृद्धि देखी, उनमें यह अतिरिक्त बारिश कम समय में भारी बारिश की घटना के रूप में सामने आ रही है।
  • मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत को प्रभावित करने वाली उत्तर-पूर्व मानसून (अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर) की बारिश पिछले एक दशक (2012-2022) में तमिलनाडु की लगभग 80 प्रतिशत, तेलंगाना की 44 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश की 39 प्रतिशत तहसीलों में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है। भले ही शेष भारतीय राज्य इस अवधि में सामान्य रूप से शुष्क रहते हैं, लेकिन हमने पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गोवा की तहसीलों के साथ-साथ पूर्वी तट पर ओडिशा व पश्चिम बंगाल की तहसीलों में अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर में होने वाली बारिश में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण वृद्धि होने का रुझान पाया है। इस वृद्धि के लिए आंशिक रूप से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती गतिविधियां जिम्मेदार हो सकती हैं।
  • इसके अलावा, मासिक परिवर्तनशीलता के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में लगभग 48 प्रतिशत तहसीलों में अक्टूबर में 10 प्रतिशत से अधिक बारिश हुई। इसके पीछे इस उपमहाद्वीप से दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी में देरी जिम्मेदार हो सकती है।

चित्र ईएस1 पिछले दशक में देश के अधिकांश हिस्सों में जेजेएएस बारिश में वृद्धि हुई है, लेकिन सिंधु-गंगा के मैदानों, पूर्वोत्तर भारत और भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कमी आई है।

चित्र ईएस2 पिछले दशक में भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों तटों पर अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर (ओएनडी) बारिश में वृद्धि देखी गई है

चित्र ईएस3 उत्तर और पूर्व क्षेत्रों की अधिकांश तहसीलों में मासिक बारिश में अधिक परिवर्तनशीलता देखी गई है

स्रोत: लेखक का विश्लेषण

नोटः प्रशासनिक सीमा की शेपफाइल में तहसील-स्तरीय नाम से जुड़ी जानकारी उपलब्ध न होने के कारण जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और लक्षद्वीप जैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

निष्कर्ष और आगे का रास्ता
  • हमारे निष्कर्षों के आधार पर बहुत ही स्थानीय स्तर पर मानसून की जानकारी जुटाना: माह-दर-माह उच्च परिवर्तनशीलता और भारी बारिश की बढ़ती चरम घटनाओं जैसे उभरते हुए जटिल रुझानों पर विचार करते हुए, मानसून परिवर्तनशीलता के प्रति लचीलापन लाने के लिए स्थानीय स्तर पर नीति-निर्धारण होना बहुत जरूरी है। वर्तमान में, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) राष्ट्रीय, जोन, राज्य, मौसम विज्ञान संबंधी उप-प्रभागों और जिलास्तर पर मानसून की जानकारियां उपलब्ध कराता है, जो वर्तमान अवलोकन केंद्रों (observation stations) के आकलनों पर आधारित होती हैं। हालांकि, इस नेटवर्क में अति-सूक्ष्म प्रशासनिक स्तर पर मानसून की जानकारी जुटाने के लिए आवश्यक सघनता का अभाव है। हमने जेजेएएस और ओएनडी दोनों मौसमों के लिए भारत में सभी तहसीलों में मानसून परिवर्तनशीलता का आकलन करने के लिए आईएमडीएए के रि-एनालिसिस डेटा का उपयोग किया है। हमने डब्ल्यूएमओ और आईएमडी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए अनुलग्नक 1 में इस अध्ययन में शामिल सभी तहसीलों के लिए भिन्नता का गुणांक (coefficient of variation) और दीर्घावधि औसत (एलपीए) उपलब्ध कराया है। स्थानीय नीति-निर्धारकों को स्थानीय स्तर पर मानसून के प्रदर्शन का विश्लेषण करने के लिए इन आंकड़ों (मेट्रिक्स) का उपयोग करना चाहिए। यह आपदा का सामना करने की तैयारियों और प्रतिक्रिया को बेहतर बनाने के लिए समग्र और लागू करने योग्य जानकारियां उपलब्ध कराती है।
  • तहसील-स्तर पर जलवायु संबंधी जोखिम के आकलन को शामिल करके जिला-स्तर पर जलवायु कार्ययोजनाएं (climate action plans) बनानाः पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) के 2019 के निर्देश के अनुरूप सभी भारतीय राज्य और केंद्र शासित प्रदेश 2030 तक के लिए जलवायु परिवर्तन संबंधी राज्य कार्य योजनाओं (एसएपीसीसी) की समीक्षा कर रहे हैं। भले ही, वर्तमान कार्य योजनाएं जिलास्तरीय जलवायु जोखिम विश्लेषण पर केंद्रित हैं, लेकिन हमारे निष्कर्षों से तहसील स्तर पर जलवायु से जुड़ी जानकारियों की उपलब्धता सामने आती है। हम जिला-स्तर पर जलवायु संबंधी कार्य योजनाएं बनाने का सुझाव देते हैं, जिसमें कृषि, जल और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विस्तृत जलवायु जोखिमों का आकलन के लिए इस जानकारी को सामाजिक-आर्थिक और क्षेत्र-विशिष्ट आंकड़ों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। अनुकूलन संबंधी वैश्विक लक्ष्य के लिए वर्ष 2030 तक के अद्यतन जलवायु जोखिम आकलनों की आवश्यकता है। हालांकि, मौजूदा एसएपीसीसी अगले दशक की अनुकूलन रणनीतियों के लिए 2050 और 2100 तक के दीर्घकालिक जलवायु पूर्वानुमानों पर निर्भर है। इसलिए, विशेष रूप से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के वायुमंडल एवं जलवायु शोध-मॉडलिंग प्रेक्षण प्रणाली व सेवा (ACROSS) योजना में रेखांकित 12-किलोमीटर रिजॉल्यूशन पर उन्नत वैश्विक मौसम पूर्वानुमान मॉडल के साथ, अल्पकालिक अनुमानों को प्राथमिकता देना बहुत आवश्यक है। इसके अलावा, जलवायु कार्य योजनाओं को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाने के कैलिफोर्निया के कैल-एडेप्ट प्लेटफॉर्म जैसी वैश्विक सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों से प्रेरणा लेते हुए, विभिन्न हितधारकों तक जलवायु से जुड़ी इन जानकारियों को अधिक सुलभ बनाने के लिए शोध संस्थानों, मौसम विज्ञान एजेंसियों और नागरिक समाज के बीच साझेदारी होना बहुत महत्वपूर्ण है।
  • अति-स्थानीय स्तर पर बारिश में आ रहे बदलावों को दर्ज करने के लिए स्वचालित मौसम केंद्रों और समुदाय-आधारित रिकॉर्डिंग में निवेश करना: हमारा विश्लेषण तहसील स्तर पर विविधतापूर्ण मानसून पैटर्न को रेखांकित करता है, अति-स्थानीय जलवायु अनुकूलन रणनीतियों की जरूरत बताता है। वर्तमान में 25 किमी के स्थानिक रिजोल्यूशन पर उपलब्ध सबसे परिष्कृत दीर्घकालिक प्रेक्षणीय वर्षा आंकड़ों (most-refined long-term observational rainfall data) में सटीक जलवायु मॉडल और स्थानीय कार्य योजनाएं बनाने के लिए आवश्यक सूक्ष्मता की कमी है। अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (एडब्ल्यूएस) और सिटीजन साइंस ऑब्जर्वेशन सेंटर्स जैसे वैकल्पिक स्रोत नेटवर्क को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। नेशनल वेदर इंफॉर्मेशन नेटवर्क एंड डेटा सिस्टम (विंड्स) जैसी पहल और केरल में स्कूली छात्रों द्वारा सूक्ष्म-मौसमी आंकड़े एकत्रित करने जैसे सामुदायिक प्रयास, सूक्ष्म-जलवायु बारिश की परिवर्तनशील का आकलन बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर प्रभावी रणनीतियों की जानकारी देने के आशाजनक विकल्प देते हैं।

डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

  • भारत में मानसून का मौसम कब आता है? भारत में ज्यादातर कौन-सा मानसून देखा जाता है?

    दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत को प्रभावित करने वाला प्रमुख मानसून है, जो जून से सितंबर तक रहता है। जून के आस-पास, मानसून दक्षिण-पश्चिमी तट पर केरल से होकर धीरे-धीरे पूरे देश में आगे बढ़ता है। इस मानसून के आने का बेसब्री से इंतजार होता है, क्योंकि यह चिलचिलाती गर्मी से राहत देता है और भारत के विविधतापूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और अर्थव्यवस्था, खासकर खरीफ फसलों की खेती में महत्वपूर्ण योगदान देता है। भारत, उत्तर-पूर्व मानसून से भी प्रभावित होता है, जिसे शीतकालीन मानसून या लौटता हुआ मानसून भी कहा जाता है, जो प्रायद्वीपीय भारत को प्रभावित करता है और अक्टूबर से दिसंबर तक चलता है। यह मानसून दक्षिण-पश्चिमी मानसून की तुलना में कम तीव्र होता है, लेकिन रबी (सर्दियों) फसलों की खेती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और भूजल रिचार्ज में मदद करता है।

  • भारत में मानसून का स्वरूप (पैटर्न) किस प्रकार बदला है?

    हमारे अध्ययन में यह पता चला है कि भारतीय मानसून की स्वभावगत परिवर्तनशीलता जलवायु परिवर्तन के कारण और अधिक प्रभावित हुई है। पारंपरिक रूप से मानसूनी बारिश के मामले में समृद्ध क्षेत्रों जैसे पूर्वोत्तर भारत, सिंधु-गंगा के मैदान और भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में पिछले एक दशक में मानसूनी बारिश में कमी देखी गई है। इसके विपरीत राजस्थान, गुजरात, मध्य महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित पारंपरिक रूप से शुष्क क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान बारिश में वृद्धि देखी गई। तमिलनाडु में उत्तर-पूर्व मानसून सघन हुआ है और पूर्वी तट पर ओडिशा व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के साथ पश्चिमी तट पर महाराष्ट्र और गोवा में अक्टूबर से दिसंबर तक बारिश में वृद्धि देखी गई है।

  • भारत में मानसून को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन से हैं?

    भारत में मानसून पैटर्न को कई कारक प्रभावित करते हैं। मुख्य कारक भूमि और समुद्र का अलग-अलग स्तर पर गर्म होना है। गर्मियों के दौरान, भारतीय उपमहाद्वीप गर्म हो जाता है, जिससे कम दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं। इस बीच आस-पास के महासागर अपेक्षाकृत कम तापमान बनाए रखते हैं, जिससे उच्च दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं, जिसकी वजह से दबाव प्रवणता (pressure gradient) दक्षिण-पश्चिम मानसून को सक्रिय करती है, हिंद महासागर से नम हवा को खींचती है। अन्य कारकों में अल नीनो-दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation) शामिल है, जिसमें अल नीनो शुष्क परिस्थितियां पैदा करता है और ला-नीना मानसून को बढ़ाता है। हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) भी भूमिका निभाता है, जो समुद्र की सतह के तापमान को प्रभावित करता है। इसके अलावा तिब्बती पठार, पश्चिमी घाट और हिमालय पर्वत जैसी विशेषताएं हवा के पैटर्न पर असर डालती हैं, जिससे सभी क्षेत्रों में बारिश का वितरण (rainfall distribution) प्रभावित होता है।

  • भविष्य में भारतीय मानसून किस तरह से बदलेगा?

    जैसे-जैसे वैश्विक स्तर पर पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ेगा, वैज्ञानिक समझ है कि वाष्पीकरण में बढ़ोतरी के कारण संपूर्ण बारिश में वृद्धि होगी। इस घटना के परिणामस्वरूप गर्म होती जलवायु के कारण वैश्विक स्तर पर विभिन्न क्षेत्रों में बारिश बढ़ने का अनुमान है। भारत से जुड़ा अनुमान इस रुझान के अनुरूप है और देश में दक्षिण-पश्चिम व उत्तर-पूर्व दोनों ही मानसूनों में भारी बारिश वाले दिनों के साथ-साथ बारिश बढ़ने का अनुमान है। भारत के लिए जलवायु परिवर्तन के पूर्वानुमान इक्कीसवीं सदी के अंत तक दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में 10-14 प्रतिशत की महत्वपूर्ण वृद्धि के संकेत देते हैं।

  • भारत बदलते मानसून पैटर्न के साथ कैसे अनुकूलन कर सकता है?

    बदलते मानसून पैटर्न से अनुकूलन लाने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ नीति, अनुसंधान और नागरिक विज्ञान को जोड़ने की जरूरत है। शुरुआत में, अति-स्थानीय स्तर पर नीति-निर्धारण को बढ़ावा देना जरूरी है, जिसमें जिला और शहर के स्तर पर जलवायु कार्य योजनाएं बनाने पर जोर देना चाहिए। इन योजनाओं में कृषि, जल और ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के लिए जलवायु संबंधी जोखिमों का आकलन शामिल होना चाहिए। दूसरा, प्रमुख क्षेत्रों को बदलते पैटर्न के अनुरूप अपने दृष्टिकोणों का रणनीतिक रूप से पुनर्मूल्यांकन और समायोजन करना चाहिए। इसके लिए फसल चक्रों और आपदा प्रबंधन कैलेंडर को नए सिरे से बनाना होगा, ताकि बदलते मानसून की परिवर्तनशील प्रकृति के साथ तालमेल बैठाया जा सके।

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