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REPORT
इंडियाज पार्टिसिपेटरी ग्राउंड वॉटर मैनेजमेंट प्रोग्राम
लर्निंग फ्रॉम द अटल भूजल योजना इंप्लीमेंटेशन इन राजस्थान
09 December, 2023 | Sustainable Water
एकांशा खंडूजा, कार्तिकेय चतुर्वेदी, आदित्य विक्रम जैन और नितिन बस्सी

प्रस्तावित उद्धरण: खंडूजा, एकांशा, कार्तिकेय चतुर्वेदी, आदित्य विक्रम जैन और नितिन बस्सी. 2023. इंडियाज पार्टिसिपेटरी ग्राउंड वॉटर मैनेजमेंट प्रोग्राम: लर्निंग फ्रॉम द अटल भूजल योजना इंप्लीमेंटेशन इन राजस्थान। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एन्वायरमेंट एंड वॉटर

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

यह अध्ययन, भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय के साथ साझेदारी में, केंद्र सरकार की एक प्रमुख योजना, अटल भूजल योजना का राजस्थान के लिए मूल्यांकन करता है, जो उन सात भारतीय राज्यों में से एक है, जहां पर यह योजना लागू की जा रही है। 2019 में शुरू हुई अटल भूजल योजना का उद्देश्य भूजल प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी और अंतर-मंत्रालयी सामंजस्य (inter-ministerial convergence) को मुख्यधारा में लाना है।

भारत अपनी पेयजल और कृषि उत्पादन की जरूरतों के लिए मुख्य रूप से भूजल पर निर्भर है, जिसके कारण यह पूरे विश्व में सबसे बड़ा भूजल दोहनकर्ता बन गया है। हालांकि, सततशीलता (sustainability) जोखिम में है। भूजल की अदृश्य और गतिशील प्रकृति, नृशास्त्रीय और प्राकृतिक खतरों के साथ मिलकर, इस संसाधन के प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी की जरूरत को अति-महत्वपूर्ण बना दिया है।

डेस्क रिव्यू और राजस्थान में योजना के कार्यान्वयन में शामिल 16 जिलों में से 8 जिलों में फील्डवर्क के आधार पर, अध्ययन ने भूजल विभाग, लाइन विभागों और सिविल सोसाइटी और लाभार्थियों के भीतर राज्य, जिला और पंचायत स्तर पर कार्यान्वयन करने वालों को दृष्टिकोण को शामिल किया है। इसका उद्देश्य योजना और इसके विभिन्न घटकों और योजना को लागू करने/पहुंच में सक्षम और बाधा डालने वाले कारकों के बारे में विभिन्न उत्तरदाताओं के ज्ञान में जानकारियां एकत्र करना है। फिर इन जानकारियों को योजना की ताकत, कमजोरी, अवसर और खतरे का विश्लेषण करने के लिए आत्मसात किया जाता है; और मजबूत कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें की जाती हैं। इसका उद्देश्य योजना और इसके विभिन्न घटकों के बारे में विभिन्न उत्तरदाताओं के ज्ञान के साथ-साथ योजना के कार्यान्वयन/पहुंच को सक्षम बनाने और बाधा डालने वाले कारकों की जानकारी एकत्रित करना है। इसके बाद इन जानकारियों को योजना की शक्ति, कमी, अवसर और चुनौती विश्लेषण (strength, weakness, opportunity, and threat analysis) के लिए मिलाया गया है; और इसके आधार पर कार्यान्वयन को सशक्त बनाने के लिए सुझाव दिए गए हैं।

प्रमुख बिंदु

  • इस योजना में 13 सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) और उनके तहत 30 लक्ष्यों को पाने की क्षमता है।
  • कार्यक्रम की निगरानी और मार्गदर्शन करने के लिए एक राष्ट्रीय अंतर-विभागीय संचालन समिति (एनआईएससी) और राज्य स्तर पर भी समान संस्था बनाई गई है, और इसमें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, विद्युत मंत्रालय, और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है।
  • डिस्बर्समेंट-लिंक्ड इंडिकेटर्स (डीएलआई) के माध्यम से योजना के वित्तीय ढांचे में संबंधित लाइन विभागों और सामुदायिक भागीदारी के बीच सामंजस्य लाया गया है।
  • संस्थागत मजबूती और क्षमता निर्माण: 100 प्रतिशत ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियां (वीडब्ल्यूएससी) योजना के उद्देश्यों से परिचित थीं।
  • डीएलआई 1 – भूजल डेटा/सूचना और रिपोर्ट को सार्वजनिक करना: 50 प्रतिशत से अधिक लाइन विभागों का मानना ​​है कि अतिरिक्त आंकड़ों को उनकी संबंधित वार्षिक कार्य योजनाओं (एडब्ल्यूपी) की बेहतर योजना बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  • डीएलआई 2 – समुदाय के नेतृत्व वाली जल सुरक्षा योजनाओं (डब्ल्यूएसपी) की तैयारी: अध्ययन के लिए चयनित सभी 17 ग्राम-पंचायतों के पास वित्त वर्ष 2021-22 और 2022-23 के लिए जल सुरक्षा योजनाएं (डब्ल्यूएसपी) थीं और 2023-24 के लिए उन्हें अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही थी।
  • डीएलआई 3 - चालू/नई योजनाओं के माध्यम से स्वीकृत डब्ल्यूएसपी का सार्वजनिक वित्तपोषण: राजस्थान ने 725 ग्राम पंचायतों के लिए लगभग 10,270 लाख रुपये या 12.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर का दावा किया, और उन्हें 2022-23 में 7,342 लाख रुपये या 8.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर (मांग का 71.5 प्रतिशत) मिला। (26/09/2023 तक 1 अमेरिकी डॉलर = 83.22 भारतीय रुपये)
  • डीएलआई 4 - कुशल जल उपयोग के लिए सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाना: मार्च 2023 में पांच जिलों (जैसलमेर को छोड़कर) में सर्वेक्षण में शामिल रहे ग्राम पंचायतों के लिए प्रस्तुत जल सुरक्षा योजनाओं (WSP) में वित्तीय वर्ष 2024-25 तक 24,481 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को कुशल जल उपयोग के तहत लाने का प्रस्ताव है।
  • डीएलआई 5 - भूजल स्तर की गिरावट दर में सुधार: डीएलआई 5 से संबंधित परिणाम सामने आने में कुछ समय लगेगा। हालांकि, चित्तौड़गढ़ जिले में दोहन दर में वृद्धि के बावजूद, मानसून से पहले भूजल स्तर में गिरावट का रुझान उलट गया है, जो दर्शाता है कि कम से कम चित्तौड़गढ़ में अटल भूजल योजना (एबीवाई) भूजल की स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव डाल रही है।

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प्रोग्राम एसोसिएट
"भूजल के सतत प्रबंधन के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि संसाधन को मंत्रालयीय दायरों से बाहर करने देखा जाए और सामुदायिक भागीदारी को मुख्यधारा में लाया जाए। अटल भूजल योजना इन दोनों दिशाओं में एक सुनियोजित कदम है।"

कार्यकारी सारांश

भूजल सरलता से सुलभ मीठे पानी का लगभग 99 प्रतिशत हिस्से का स्रोत है (संयुक्त राष्ट्र 2022)। यह अमूल्य संसाधन पूरे विश्व, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों, औद्योगिक और सिंचाई क्षेत्रों के अरबों हितधारकों की पानी की मांग को पूरा करने में अति-महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चूंकि अधिक सरलता से सुलभ होने के कारण सतही जल (surface water) संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है और जलवायु परिवर्तन के कारण उनकी उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, इसलिए भूजल पर निर्भरता काफी बढ़ गई है।

भारत में, भूजल ने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने, पर्यावरण को संरक्षित करने और जीवन स्तर को बेहतर बनाए रखने में एक प्रमुख भूमिका निभाई है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों के दौरान भूजल दोहन में वृद्धि देखी गई है, कुछ क्षेत्रों में वार्षिक भूजल रिचार्ज की दर से कहीं अधिक भूजल दोहन हुआ है। इसके अलावा, भूजल दोहन यह तेज बढ़ोतरी काफी हद तक अनियोजित और अप्रबंधित रही है। हालांकि, पहले भूजल संसाधनों के सतत प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए कुछ प्रयास हुए थे, लेकिन राष्ट्रीय और राज्यों के स्तर पर कृषि क्षेत्र में भूजल उपयोग को विनियमित (रेगुलेट) करने के लिए उचित वैधानिक समर्थन के अभाव में, इसका प्रशासन एक चुनौती बना हुआ है।

इस संदर्भ में, 2019-20 में, भारत सरकार ने भूजल स्तर में गिरावट रोकने और प्रभावी सामुदायिक भागीदारी के जरिए भूजल संसाधन के प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए, विशेष रूप से उन इकाइयों (आम तौर पर ब्लॉक) में, जो अत्यधिक दोहन (भूजल विकास का चरण 100 प्रतिशत से अधिक) की शिकार हैं, केंद्रीय क्षेत्र की योजना के रूप में अटल भूजल योजना (एबीवाई) को शुरू किया। इस योजना का परिव्यय 6,000 करोड़ रुपये (840 मिलियन अमेरिकी डॉलर) है (DoWR,RD&GR 2023a), जिसमें से 50 प्रतिशत राशि विश्व बैंक से ऋण के रुप में मिलती है और शेष राशि भारत सरकार से इसे लागू करने वाले राज्यों को अनुदान सहायता के रूप में दी जाती है। 2020-21 से 2024-25 तक की अवधि के लिए, यह योजना सात राज्यों - गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश - में चयनित जल-संकट ग्रस्त क्षेत्रों में लागू की जा रही है। इस योजना में 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 12, 13, 15, 16 और 17 सहित विभिन्न सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने की क्षमता है (चित्र ES1 देखें)।

इस रिपोर्ट में, हमने डेस्क रिव्यू और फील्ड विजिट के माध्यम से योजना का मूल्यांकन पेश किया है। हम इसे लागू करने की स्थिति, सफलता के प्रमुख कारक (ताकत), कार्यान्वयन की चुनौतियां (कमजोरियां), सुधार के अवसर और योजना की स्थिरता को प्रभावित करने वाले बाहरी खतरों की जांच की है। इसके अलावा, राजस्थान के चयनित जिलों में संचालित त्वरित, लेकिन व्यापक फील्ड रिसर्च के आधार पर, हमने अगले चरण में प्रशासन और कार्यान्वयन में सुधार के लिए लागू करने योग्य सुझाव दिए हैं। हमने समुदाय-आधारित भागीदारीपूर्ण भूजल प्रबंधन को सक्षम बनाने के लिए अन्य देशों के लिए सीख (लर्निंग) भी प्रस्तुत किया है। यह अध्ययन जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में अटल भूजजल योजना की राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रबंधन इकाई (एनपीएमयू) के निर्देश पर किया गया था।

चित्र ES1 संभावित सतत विकास लक्ष्य और उद्देश्य जिन्हें अटल भूजल योजना के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है।


सोर्सः लेखकों का विश्लेषण

अध्ययन पद्धति (Methodology)

हमने एक उदार पद्धतिगत दृष्टिकोण (eclectic methodological approach) और गुणात्मक (qualitative) व मात्रात्मक (quantitative) उपकरणों का इस्तेमाल करके यह अध्ययन किया है। इसमें दो चरण शामिल थे (चित्र 3)। चरण-1 में जयपुर (जहां राज्य कार्यक्रम प्रबंधन इकाई (SPMU) का कार्यालय स्थित है) और पड़ोसी जिले (दौसा) का दौरा शामिल है, ताकि जमीनी स्थिति को समझा जा सके। योजना के कार्यान्वयन के बारे में हितधारकों की प्रतिक्रियाओं की जानकारी जुटाने के लिए प्रश्नावली के अलग-अलग सेट बनाने में चरण-1 से मिली जानकारियों (learnings) का उपयोग किया गया। इन प्रश्नावलियों को चरण-II के लिए चुने गए जिलों, यानी अजमेर, हनुमानगढ़, करौली, जैसलमेर, कोटा और चित्तौड़गढ़ में लागू किया गया।

दोनों चरणों के लिए अगस्त और सितंबर 2023 के महीनों के दौरान तीन शोधकर्ताओं की एक टीम द्वारा फील्डवर्क किया गया था। दूसरे चरण में जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाइयों (डीपीएमयू) के 17, जिला कार्यान्वयन सहभागियों (डीआईपी) के 24, और 25 जीपी सदस्यों के साक्षात्कार लिए गए थे। छह जिलों में 17 ग्राम जल और स्वच्छता समितियों (वीडब्ल्यूएससी) के साथ केंद्रित समूह चर्चा (एफजीडी) आयोजित की गई। इसके अलावा, चयनित जिलों के सात लाइन विभागों के 29 उत्तरदाताओं के साक्षात्कार लिए गए। माइक्रोसॉफ्ट एक्सेल का इस्तेमाल करके डेटा का विश्लेषण किया गया। संबंधित डिस्बर्समेंट-लिंक्ड इंडिकेटर्स (डीएलआई) से मिलान करने के लिए प्रत्येक हितधारक की प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण और वर्गीकरण किया गया। विश्लेषण के डीएलआई सत्यापन के लिए क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया (QCI) की पद्धति के साथ तालमेल बैठाया गया था। केवल चरण II में शामिल जिलों के लिए परिणाम और निष्कर्ष बताए गए हैं।

राजस्थान में अटल भूजल योजना के कार्यान्वयन पर परिणाम और निष्कर्ष

  • संस्थागत सशक्तिकरण और क्षमता निर्माण: हमने पाया कि 100 प्रतिशत ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियां  योजना के उद्देश्यों से परिचित थीं; 94 प्रतिशत से अधिक समितियां वर्षामापी के बारे में जानती थी; 88 प्रतिशत से अधिक समितियां जल गुणवत्ता परीक्षण किट (डब्ल्यूक्यूटीके) के बारे में जानती थी; और 64 फीसदी से अधिक जानती थी कि पीज़ोमीटर क्या होता है। हालांकि, मॉनिटरिंग इंस्ट्रूमेंट के इस्तेमाल की उनकी क्षमता कम थी।
  • डीएलआई 1 - भूजल आंकड़े/सूचना और रिपोर्ट को सार्वजनिक करना: यह पाया गया कि 88 प्रतिशत उत्तरदाताओं को जानकारी थी कि वर्षामापी क्या है और वे ग्राम पंचायत में मौजूद थे। हालांकि, कुछ ग्राम पंचायतों में आंकड़ों को जुटाना एक चुनौती है, क्योंकि उनके पास वर्षामापी नहीं है। इसके अलावा, अधिकांश उत्तरदाताओं को पीज़ोमीटर की जानकारी थी, और 50 प्रतिशत से अधिक उत्तरदाताओं को पता था कि वे कहां पर लगाए गए हैं। इसके अलावा, लगभग 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं को डब्ल्यूक्यूटीके और इसके इस्तेमाल के बारे में जानकारी थी। कुछ किसानों ने अपने खेतों के नजदीक के कुओं के भूजल स्तर और इसकी गुणवत्ता निगरानी के लिए मौजूदा जानकारियों का उपयोग किया और इस ज्ञान को अपने साथी किसानों के साथ भी साझा किया। 50 प्रतिशत से अधिक लाइन विभागों को लगता है कि अतिरिक्त आंकड़ों को उनके संबंधित वार्षिक कार्य योजनाओं (एडब्ल्यूपी) की बेहतर प्लानिंग के लिए उपयोग किया जा सकता है।
  • डीएलआई 2 - समुदाय द्वारा संचालित जल सुरक्षा योजनाओं (डब्ल्यूएसपी) की तैयारी: 2022 में क्यूसीआई द्वारा डीएलआई के सत्यापन के दूसरे चरण में राजस्थान से प्राप्त लगभग 82 प्रतिशत डब्ल्यूएसपी को मंजूरी दी गई थी, क्योंकि यदि ग्राम पंचायतों द्वारा सामुदायिक परामर्श से योजनाओं को बनाया गया था, तो उन्हें पर्याप्त माना गया था। इस अध्ययन में चयनित सभी ग्राम पंचायतों के पास वित्त वर्ष 2021-22 और 2022-23 के लिए डब्ल्यूएसपी मौजूद थी, और वे 2023-24 के लिए उन्हें अपडेट करने की प्रक्रिया में थे। जहां अधिकांश हितधारकों को एडब्ल्यूपी, वीडब्ल्यूएससी और डब्ल्यूएसपी की जानकारी थी, लाभार्थी भी धीरे-धीरे डब्ल्यूएसपी के बारे में गहन जानकारी विकसित कर रहे थे। यह सुनिश्चित करने में डीआईपी की भूमिका अति-महत्वपूर्ण है।
  • डीएलआई 3 - चालू/नई योजनाओं के माध्यम से अनुमोदित डब्ल्यूएसपी का सार्वजनिक वित्तपोषण: क्यूसीआई के सत्यापन के छठे दौर के अनुसार, राजस्थान ने 725 ग्राम पंचायतों के लिए लगभग 10,270 लाख रुपये या 12.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर का दावा किया, और उन्हें 2022-23 में 7,342 लाख रुपये या 8.8 मिलियन अमेरिकी डॉलर (मांग का 71.5 प्रतिशत) प्राप्त हुए। (26/09/2023 तक 1 अमेरिकी डॉलर = 83.22 भारतीय रुपये)।
  • डीएलआई 4 – कुशल जल उपयोग के लिए प्रैक्टिस को अपनाना: लगभग 41 प्रतिशत वीडब्ल्यूएससी सदस्यों ने माना कि बेहतर गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता और कृषि जैसे अन्य विभागों के साथ के जरिए एकीकरण से भूजल सिंचित क्षेत्रों में सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के उपयोग जैसे तकनीकी प्रगति के कारण फसल पैटर्न बदल सकते हैं। हालांकि, 2021 और 2023 के बीच, फसल स्थानांतरण के सिरे पर कोई बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन राज्य सूक्ष्म सिंचाई और अन्य जल-बचत पद्धतियों जैसे मांग-पक्ष से जुड़े हस्तक्षेपों को अपनाने के सिरे पर प्रगति कर रहा है। क्यूसीआई के सत्यापन के छठे दौर के आधार पर, लगभग 12,256 हेक्टेयर में क्षेत्र एबीवाई के माध्यम से प्रोत्साहित किए गए कुशल जल उपयोग प्रथाओं को लाया गया; इसका 99 प्रतिशत हिस्सा ड्रिप, स्प्रिंकलर और पाइपलाइन आधारित सिंचाई को अपनाने से हुआ। मार्च 2023 में पांच जिलों (जैसलमेर को छोड़कर) में  सर्वेक्षण में शामिल 15 ग्राम सभाओं द्वारा जमा किए गए डब्ल्यूएसपी में वित्तीय वर्ष 2024-25 तक 24,481 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को कुशल जल उपयोग पद्धतियों के तहत लाने काो प्रस्ताव है।

चित्र ES2 राजस्थान में अटल भूजल योजना के कार्यान्वयन का SWOT विश्लेषण


स्रोत: लेखकों का विश्लेषण

सुझाव
  • डीआईपी को अधिक प्रभावशाली बनाएं: नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चरल और रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) की परामर्श सेवा (नैबकॉन्स) के माध्यम से महत्वपूर्ण डीपीएमयू विशेषज्ञों की भर्ती की तरह या फिर जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत कार्यान्वयन सहायता एजेंसियों को सूचीबद्ध करते हुए डीआईपी निविदा प्रक्रिया को मान्यता प्राप्त थर्ड पार्टी एजेंसियों को आउटसोर्स किया जाना चाहिए। यह बदलाव डीआईपी को प्रोत्साहित करेगा, उनके बने रहने की दरों में सुधार लाएगा, मानव संसाधन (एचआर) प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करेगा, टकरावों के समाधान में तेजी लाएगा, सक्रिय मानव संसाधन नीतियों को बढ़ावा देगा, जिलों में डीआईपी विशेषज्ञों के लिए समान वेतन सुनिश्चित करेगा और इस तरह से योजना का बेहतर कार्यान्वयन हो सकेगा। इसके अतिरिक्त, लॉजिस्टिक और ऑपरेशनल दक्षता को बढ़ाने के लिए डीआईपी के लिए ब्लॉक-स्तर पर कार्यालय बनाए जाने चाहिए। वर्तमान में, डीआईपी (DIP) जिला स्तर पर तैनात किए गए हैं, जो अक्सर उनके संगठनात्मक कार्यालयों से दूर होते हैं, जिसके कारण लॉजिस्टिकल (logistical) दिक्कतें आती हैं।
  • ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में वॉटर बजटिंग को शामिल करें: पंचायतों को हर साल एक जनभागीदारी तरीके से एक ग्राम पंचायत विकास योजना बनाने की जिम्मेदारी है। इसमें संविधान की 11वीं अनुसूची के अनुच्छेद 243जी में शामिल विषयों के लिए 36 लाइन विभागों के अंतर्गत आने वाले कार्य शामिल हैं (पंचायती राज मंत्रालय 2023)। इस अनुसूची के 29 विषयों में से सात विषयों का भूजल सहित जल संसाधनों की स्थिति से सीधा जुड़ाव है। प्रथम ‘ऑल इंडिया एनुअल स्टेट मिनिस्टर्स कॉन्फ्रेंस ऑन वॉटर 2023’ के परिणाम के रूप में जल संसाधनों का बेहतर समन्वय करने के लिए एक अंतर-मंत्रालयी उप-समिति गठित हुई है। इस प्रकार से, जल बजट को जीपीडीपी का हिस्सा बनाने के लिए एक मजबूत सक्षम वातावरण मौजूद है, जो नियोजन के चरण में अन्य लाइन विभागों के साथ बेहतर तालमेल के रूप में सामने आएगा।
  • ग्राम पंचायतों को प्रत्यक्ष प्रोत्साहन देने पर विचार करें: क्षेत्र से मिले वास्तविक साक्ष्य बताते हैं कि ग्राम पंचायतों को सीधे प्रोत्साहन देकर उन्हें एकीकरण के माध्यम से चिन्हित परियोजनाओं को लागू करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है और उनकी सफलता में योगदान कर सकता है। यदि आवश्यकता महसूस हो तो अटल भूजल योजना के दिशा-निर्देश में इसका प्रावधान है। हालांकि, प्रोत्साहन आवंटन मानदंड में भूजल विकास के चरण और ग्राम पंचायत द्वारा सामुदायिक सहभागिता के साथ जल मांग प्रबंधन के लिए आवश्यक कार्य की मात्रा पर विचार किया जाना चाहिए।
  • लाइन विभागों द्वारा समय पर धनराशि को जारी करना और लाभार्थियों को सब्सिडी देना सुनिश्चित करें: विभिन्न हस्तक्षेपों के लिए राज्य के लाइन विभागों द्वारा अपने जिला कार्यालयों को धनराशि आवंटन के मानदंडों की स्पष्टता निम्न है। इस प्रकार से, अटल भूजल योजना के तहत हस्तक्षेपों के कम उपयोग का एक कारण संबंधित लाइन विभागों से सब्सिडी जारी होने में देरी थी। ऐसी देरी किसानों को अटल भूजल योजना का लाभ लेने से हतोत्साहित करती है, क्योंकि अक्सर हस्तक्षेपों की शुरुआती लागत अधिक होती है।
  • वर्षामापी यंत्रों की ‘उचित’ स्थापना की सत्यापन व्यवस्था को मजबूत बनाएं: हमने जिन ग्राम पंचायतों का दौरा किया, उनमें से कुछ में वर्षामापी यंत्र उचित स्थान पर नहीं लगाए गए थे। उदाहरण के लिए, उन्हें ऐसे स्थानों पर लगाया गया था, जहां पर उन तक आसानी से नहीं पहुंचा जा सकता था। इसलिए, निविदा प्रक्रिया में वर्षामापी यंत्रों की स्थापना के सत्यापन और रिपोर्टिंग की मौजूदा प्रणाली को सशक्त बनाया जाना चाहिए।

अन्य देशों के लिए सीख

अटल भूजल योजना (ABY) अन्य देशों के लिए समुदाय-आधारित, सहभागी भूजल प्रबंधन को सक्षम बनाने और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सीख देती है। उन्हें तालिका ES1 में प्रस्तुत किया गया है।

तालिका ES1 ग्राम पंचायत (GP) स्तर पर भागीदारी के चरण, उनके स्वरूप, परिणाम और सक्षमकर्ता


स्रोत: लेखकों का विश्लेषण

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

  • अटल भूजल योजना क्या है?

    अटल भूजल योजना भारत सरकार द्वारा 2019 में शुरू की गई एक केंद्रीय योजना है, जिसका उद्देश्य विभिन्न संचालित योजनाओं के बीच सामंजस्य और स्थानीय समुदायों व हितधारकों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से सतत भूजल प्रबंधन में सुधार लाना है। इसे 2020-21 से 2024-25 तक सात राज्यों - गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान के चुनिंदा क्षेत्रों में लागू किया जा रहा है, जिसका कुल वित्तीय परिव्यय 6,000 करोड़ रुपये है।

  • हम भूजल को कैसे सतत (सस्टेनेबल) बना सकते हैं?

    भूजल के बारे में अपने सभी निर्णयों में संसाधनों का अन्य संसाधनों और कारकों के साथ अंतर्संबंधों को समझते और स्वीकार करके भूजल के उपयोग को सस्टेनेबल बनाया जा सकता है। इसमें पेयजल, कृषि, पशुपालन, उद्योग, ऊर्जा, बिजली और अन्य इकोसिस्टम सर्विस के लिए संसाधनों की आवश्यकता; इस पर वर्तमान, निकट भविष्य और भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव; और लोगों की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वास्तविकताओं के अंतर्संबंध शामिल हैं। इसे ध्यान में रखते हुए, हम वर्तमान में संसाधन का इस तरह से उपयोग कर सकते हैं कि वह आगामी पीढ़ियों की जरूरतों के लिए पर्याप्त मात्रा में बचे रहे।

  • भूजल प्रबंधन सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में कैसे मदद कर सकता है?

    यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटीज इंस्टीट्यूट ऑफ वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ के अनुसार, सतत विकास के लिए जल महत्वपूर्ण है। भूजल, जो पृथ्वी पर उपलब्ध मीठे पानी के संसाधन का लगभग 99% है, 13 सतत विकास लक्ष्यों के तहत 53 एसडीजी लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायक साबित हो सकता है।

  • भूजल प्रबंधन में समुदाय को कैसे शामिल किया जा सकता है?

    भूजल प्रबंधन में समुदायों को जोड़ने के बहुत से तरीके हैं, जो समुदाय के हित और उस क्षेत्र में प्रभावी कानूनी और नीतिगत प्रावधानों पर निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए, समुदाय को स्थानीय स्तर पर भूजल आवंटन तय करने, इसकी गुणवत्ता व मात्रा की निगरानी करने, प्रबंधन योजनाओं और मांग घटाने वाले उपायों को तैयार व लागू करने, संसाधन के उपयोग व प्रशासन के संबंध में अन्य हितधारकों के साथ बातचीत करने, संसाधन की सुरक्षा करने और संसाधनों के आवंटन या उपयोग से जुड़े विवादों को सुलझाने या बातचीत करने में शामिल किया जा सकता है।

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