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REPORT
स्ट्रेंथनिंग इंडियाज डिजास्टर प्रीपेयर्डिनस विद टेक्नोलॉजी
ए केस फॉर इफेक्टिव अर्ली वॉर्निंग सिस्टम्स
13 July, 2023 | Climate Resilience
श्रेया वधावन

प्रस्तावित उद्धरणः वधावन श्रेया, 2023. स्ट्रेंगथनिंग इंडियाज डिजास्टर प्रिपेयर्डिनस विद टेक्नोलॉजीः अ केस फॉर इफेक्टिव अर्ली वर्निंग सिस्टम्स. न्यू दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर.

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early warning systems) त्वरित कार्रवाइयों के लिए सूचनाएं देकर जलवायु से जुड़े जोखिमों के प्रति लचीलापन यानी उसका सामना करने की क्षमता बढ़ा सकती है। हालांकि, पूर्व चेतावनी प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए लचीली प्रणालियों के विभिन्न पहलुओं को शामिल करना चाहिए। यह अध्ययन भारत में बाढ़ और चक्रवातों पर ध्यान केंद्रित करते हुए जल-मौसम (हाइड्रो-मेटोरोलॉजिकल) जोखिमों के प्रभावों का शमन करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संचालित पूर्व-चेतावनी प्रणाली और बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली (multi-hazard early warning systems) की प्रभावशीलता का आकलन करने का प्रयास करता है। भारत में पूर्व चेतावनी प्रणाली की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए, यह अध्ययन एक नए ‘सुभेद्यता से लचीलापन’ (vulnerability to resilience) मॉडल का प्रस्ताव देता है। इस प्रस्तावित मॉडल में दो चर हैं: पहला, सुभेद्यता, जो सीईईडब्ल्यू की पिछली रिपोर्ट, मैपिंग इंडियाज क्लाइमेट वल्नरेबिलिटीः ए डिस्ट्रिक्ट-लेवल असेसमेंट (2021) में स्थापित एकीकृत सुभेद्यता आकलन रूपरेखा (Integrated vulnerability assessment framework) पर आधारित है, और दूसरा, लचीलापन, जो ए2ई रूपरेखा (A2E framework), यानी पूर्व चेतावनी प्रणाली और बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की उपलब्धता, पहुंच और प्रभावशीलता पर आधारित है।

मुख्य बिन्दु

  • भारत में लगभग 66 प्रतिशत लोग भीषण बाढ़ से प्रभावित होते हैं; लेकिन सिर्फ 33 प्रतिशत लोग बाढ़ संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली के विस्तार क्षेत्र में आते हैं। इसी समय भारत में 25 प्रतिशत लोगों को चक्रवातों और उनके प्रभावों का सामना करना पड़ता है, लेकिन चक्रवात की चेतावनी शत-प्रतिशत जनसंख्या के लिए उपलब्ध होती है।
  • बाढ़ से प्रभावित होने की आशंका वाले 88 प्रतिशत से अधिक भारतीय राज्यों और चरम चक्रवाती घटनाओं से प्रभावित होने की आशंका वाले शत-प्रतिशत राज्यों में उच्च दूरसंचार घनत्व अनुपात (high teledensity ratio) है (यानी दूरसंचार के माध्यम से पूर्व चेतावनी प्रणाली तक पहुंच है)।
  • भीषण बाढ़ से प्रभावित होने की उच्च आशंका (exposure) वाले 9 राज्यों में बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली काफी प्रभावी है। भीषण चक्रवाती घटनाओं से प्रभावित होने की उच्च आशंका वाले 10 राज्यों में चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणाली भी उच्च से मध्यम स्तर तक प्रभावी है।
  • बाढ़ से प्रभावित होने की आशंका वाले 32 राज्यों में से 14 और चक्रवात से प्रभावित होने की आशंका वाले 17 राज्यों में से 9 राज्यों में पूर्व चेतावनी प्रणाली अपनी उपलब्धता, पहुंच और प्रभावशीलता के कारण बहुत अधिक मजबूत है।

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प्रोग्राम एसोसिएट
“पिछले दो दशकों में भारत ने बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी चरम जलवायु घटनाओं का सामना करने के लिए अपना लचीलापन बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण उपाय लागू किए हैं। हालांकि, मौजूदा प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर तत्काल एक जन-केंद्रित और व्यापक बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणाली (एमएचईडब्ल्यूएस) को लागू करने की जरूरत है। भारत नई तकनीकों का लाभ उठाकर, स्थानीय समुदायों को पूर्व चेतावनी प्रसार प्रक्रिया में शामिल करके, क्षेत्रीय वास्तविक समय बाढ़ निगरानी माइक्रो-सेंसर में निवेश करके, सार्वजनिक-निजी भागीदारी स्थापित करके और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियों से सीखकर मौजूदा पूर्व चेतावनी प्रणाली (EWS) तंत्र से बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणाली (MHEWS) की ओर तेजी से बढ़ सकता है।”

कार्यकारी सारांश

भारत बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी जलवायु की चरम घटनाओं के प्रति बहुत अधिक सुभेद्य (vulnerable) है। कांउसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) द्वारा 2021 में जारी एक अध्ययन में पाया गया था कि भारत के 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) में से 27 अब जल-मौसम संबंधी चरम आपदाओं और उनके जटिल प्रभावों के लिए सुभेद्य हैं (मोहंती और वधावन 2021)। इन सुभेद्य क्षेत्रों में भारत की 80 प्रतिशत आबादी रहती है। हालांकि, भारत अपनी तैयारियों को बढ़ाते और पूर्व-चेतावनी प्रणालियों में निवेश करते हुए इन चरम घटनाओं के प्रभावों के प्रति लचीलपन विकसित करने के लिए कदम उठा रहा है। इन प्रणालियों को आपदा जोखिम को घटाने (disaster risk reduction) के लिए आवश्यक उपकरण के रूप में पूरे विश्व में लगाया जा रहा है। लेकिन, इनमें, विशेष रूप से ‘अंतिम सिरे’ जैसे सामुदायिक स्तर पर, सबसे अलग-थलग और कमजोर समूहों के लिए समझने और कदम उठाने योग्य चेतावनियों को समय पर जारी करने में काफी अंतर मौजूद है। इन कमियों को दूर करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र महासभा के कई प्रस्तावों ने सुभेद्यता (vulnerabilities) को घटाने और सुदृढ़ता को बढ़ाने के लिए प्रभाव-आधारित, जन-केंद्रित, व्यापक बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणालियों (एमएचपूर्व चेतावनी प्रणाली) की जरूरत पर जोर दिया है (ब्रिसेनो 2007)।

कॉप 27 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने सभी तक पूर्व चेतावनी उपलब्ध कराने के लिए एक कार्यकारी कार्ययोजना पेश की थी, जिसमें कहा गया था कि “वैश्विक स्तर पर, मुख्य रूप से छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (एसआईडीएस) और सबसे कम विकसित देशों (एलडीसी) में, तीन में से एक व्यक्ति तक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियां उपलब्ध नहीं है” (बेकर, व अन्य 2022)। इस योजना को पूरे विश्व में सभी तक पूर्व चेतावनी प्रणाली पहुंचाने के लिए 2023 से 2027 (डब्ल्यूएमओ 2021) तक 3.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश की जरूरत है। पूर्व चेतावनी प्रणाली को संभावित जोखिमों या आपदाओं का पता लगाने और जोखिम के समय व्यक्तियों या संगठनों को अग्रिम सूचना या चेतावनी देने के लिए बनाया गया है। इस कार्य योजना की शुरुआत एक स्वागतयोग्य घोषणा है, क्योंकि 2022 में दस सबसे मंहगी जलवायु आपदाओं से दुनिया को बीमाकृत क्षति के रूप में लगभग 170 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान हुआ (क्रिश्चियन एड 2021)। इस बीच ग्लोबल कमीशन ऑन एडेप्टेशन की एक रिपोर्ट में पाया गया कि विकासशील देशों में पूर्व चेतावनी प्रणाली पर सिर्फ 800 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने पर प्रति वर्ष 3-16 बिलियन अमेरिकी डॉलर के नुकसान को रोकने में मदद मिल सकती है (यूएन 2022)।

इस अध्ययन का उद्देश्य भारत में बाढ़ और चक्रवातों पर केंद्रित जल-मौसम संबंधी खतरों के शमन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संचालित ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस की प्रभावशीलता का आकलन करना है। भारतीय राज्यों के लचीलेपन (जलवायु आपदाओं का सामना करने की क्षमता) में ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस के योगदानों का आकलन करने के लिए एक नए मॉडल ‘सुभेद्यता से लचीलापन’ को पेश किया गया है। ईडब्ल्यूएस के भीतर लचीलापन का कार्य है:

  • उपलब्धता: ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस स्टेशनों का उपलब्ध होना या न होना;
  • सुलभता: तत्काल कदम उठाने के लिए सूचना तक पहुंच रखने वाले लोगों की हिस्सेदारी;
  • प्रभावशीलता: ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस को लगाने और संचालन के लिए स्थापित प्रशासन और वित्तीय रूपरेखा की मौजूदगी (ईआरआरसी 2014)।

विभिन्न उपलब्ध अध्ययनों व अन्य सामग्रियों (ग्रे लिटरेचर) की समीक्षा और विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा प्रकाशित रिपोर्टों के गहन विश्लेषण के आधार पर, जलवायु घटनाओं की अधिकता वाले (हॉटस्पॉट) जिलों में ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस की उपलब्धता का आकलन किया गया।

ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस की सुलभता का आकलन करने के लिए, टेलीडेंसिटी के विस्तार का उपयोग करके पूर्व चेतावनी प्रसार प्रणालियों के माध्यमों के दायरे में आने वालों संख्या का आकलन किया गया है। टेलीकॉम सब्सक्रिप्शन रिपोर्ट- ट्राई सब्सक्राइबर्स डेटाबेस का उपयोग करके सभी टेलीकॉम कंपनियों के वायरलाइन और वायरलेस दोनों सब्सक्राइबर्स के आधार पर टेलीघनत्व विस्तार को आंका गया है (ट्राई 2021)।

ईडब्ल्यूएस (EWS) की प्रभावशीलता का मूल्यांकन, राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरों पर ईडब्ल्यूएस के संचालन को समझने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया का उपयोग करके, किया गया।

मुख्य बिन्दु

भारत में पूर्व चेतावनी प्रणाली की उपलब्धता

  • भारत में लगभग 66 प्रतिशत व्यक्तियों के सामने भीषण बाढ़ की चपेट में आने का जोखिम हैं; लेकिन इनमें से सिर्फ 33 प्रतिशत व्यक्ति ही बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली के दायरे में आते हैं।
  • इस बीच, भारत में 25 प्रतिशत लोगों के सामने चक्रवातों और उनके प्रभावों की चपेट में आने का जोखिम है, लेकिन चक्रवात की चेतावनी प्रणाली शत-प्रतिशत आबादी तक उपलब्ध है।

चित्र ईएस 1 भीषण बाढ़ की चपेट में आने वाले अधिकांश लोगों के पास बाढ़ संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली की उपलब्धता सीमित है

disaster early warning systems india
स्रोत: लेखक का विश्लेषण

भारत में पूर्व चेतावनी प्रणाली तक पहुंच

  • भारत में जोखिम के दायरे में आने वाली अधिकांश आबादी मोबाइल या टेलीफोन के जरिए पूर्व चेतावनी तक पहुंच सकती है।
  • बाढ़ से प्रभावित होने के जोखिम वाले 88 प्रतिशत से अधिक भारतीय राज्यों और भीषण चक्रवात से प्रभावित होने के जोखिम वाले शत-प्रतिशत राज्यों में उच्च टेलीघनत्व अनुपात मौजूद है।

चित्र ईएस2 भारत में अधिकांश लोगों के पास बाढ़ और चक्रवात संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली तक पहुंच के कई साधन हैं


स्रोत: लेखक का विश्लेषण

भारत में पूर्व चेतावनी प्रणाली की प्रभावशीलता

  • भीषण बाढ़ की घटनाओं से प्रभावित होने के उच्च जोखिम वाले नौ राज्यों में उच्च प्रभावी बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली (Highly effective flood EWS) उपलब्ध है।
  • चक्रवात की चरम घटनाओं के उच्च जोखिम वाले दस राज्यों में उच्च से मध्यम स्तर तक प्रभावी (high to moderately effective) चक्रवात संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली भी है।

भारत में ईडब्ल्यू के माध्यम से लचीलापन

  • कुल मिलाकर ईडब्ल्यूएस और एमएचईडब्ल्यूएस की उपलब्धता, पहुंच और प्रभावशीलता के कारण बाढ़ से प्रभावित होने के जोखिम वाले 32 राज्यों में से 14 राज्यों और चक्रवात प्रभावित होने के जोखिम वाले 17 राज्यों में से 9 राज्यों का लचीलापन (कम से कम नुकसान के साथ जोखिम का सामना करने में क्षमता) अधिक है।
  • इसके अलावा, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, गोवा, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य चक्रवात संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के साथ लचीलापन हासिल करने में सबसे आगे हैं।

मुख्य सिफारिशें

  • राज्यों को समावेशी, प्रभावी और समुदाय की अगुवाई की प्रमुखता देने वाली एमएएचईडब्ल्यूएस को मुख्यधारा में लाना चाहिए। राज्य स्थानीय समुदायों के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और युवा स्वयंसेवकों का लाभ उठाते हुए अंतिम छोर तक संपर्क और समग्रता के साथ प्रभावी सूचना प्रसार हासिल करने में सक्षम बन सकते हैं।
  • राज्यों को इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी), क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों का लाभ उठाकर पूर्व चेतावनी प्रसार प्रणाली (ईडब्ल्यूडीएस) को मजबूत करना चाहिए, जो कि पर्यावरण से जुड़े आंकड़ों को समझने, उन्हें स्पष्ट करने, प्रोसेस और विश्लेषण करने के टूल्स उपलब्ध कराते हुए पूर्व चेतावनी प्रणाली की निगरानी, पूर्वानुमान और चेतावनी देने जैसे पक्षों पर सहायता कर सकें।
  • केंद्र और राज्य सरकारों को क्षेत्रीय स्तर पर वास्तविक समय में बाढ़ की निगरानी करने वाले माइक्रोसेंसर्स में निवेश करना चाहिए। यह सटीक और वास्तविक समय में आंकड़ों का एकत्रण संभव बनाएगा, जिसे बाद में केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के साथ साझा किया जा सकता है और बाढ़ निगरानी के आंकड़ों के साथ मिलाकर बाढ़ पूर्वानुमान को और अधिक लक्षित व सटीक बनाया जा सकता है।
  • राज्य और केंद्र सरकारों को एमएचईडब्ल्यूएस की दक्षता में सुधार लाने के लिए, विशेष रूप से प्रौद्योगिकी के उपयोग को लेकर, निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी को बढ़ावा देना चाहिए।


भारत के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने अखिल भारतीय स्तर पर सीएपी-आधारित एकीकृत चेतावनी प्रणाली की परिकल्पना की है। इस परियोजना में जियो-इंटेलिजेंस (एनडीएमए 2023) का उपयोग करके विभिन्न तकनीकों के माध्यम से वास्तविक समय में पूर्व चेतावनी का प्रसारण शामिल है।

सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ाने से आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर) के लिए नवाचार और तकनीकी समाधानों का दायरा बढ़ेगा। निजी कंपनियों को शामिल करने से वित्त जुटाने में भी मदद मिल सकती है, जिससे पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए वित्त पोषण का प्रवाह अधिक पारदर्शी बनेगा और जवाबदेही आएगी।

अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के माध्यम से नॉलेज ट्रांसफर (knowledge transfer) का लाभ लेना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को संभव बनाने से एक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली के लिए आंकड़े जुटाने, जोखिम संबंधी आकलन करने, सूचनाओं के प्रसारण, और सामुदायिक सहभागिता लाने जैसे प्रमुख घटकों के बारे में समझ बढ़ती है। ज्ञान का आदान-प्रदान, भारत और अन्य देशों में पूर्वानुमान, बचाव करने के कदम उठाने, और प्रभावों को घटाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाने की सुविधा देता है।

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डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

  • पूर्व चेतावनी प्रणाली और बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणाली के क्या कार्य हैं?

    पूर्व चेतावनी प्रणाली (ईडब्ल्यूएस), जोखिम प्रबंधन और आपदा संबंधी तैयारियों से जुड़ा एक आवश्यक उपकरण है, जो जीवन को बचाने और आपदाओं के संभावित प्रभावों को घटाने में सहायता करती है। पूर्व चेतावनी प्रणाली, संभावित खतरों या संकटों के बारे में जानकारी को जुटाने और प्रभावित होने वाले व्यक्तियों या संगठनों को अग्रिम रूप से जानकारी या चेतावनी को पहुंचाने के लिए सेंसर, आंकड़ों के विश्लेषण और संचार माध्यमों जैसे विभिन्न उपकरणों और तरीकों का उपयोग करते हुए अपने काम को पूरा करती है। बहु-खतरा पूर्व चेतावनी प्रणाली (एमएचईडब्ल्यूएस), उन समान या अलग-अलग संदर्भों में विभिन्न आपदाओं/या प्रभावों का समाधान उपलब्ध कराती है, जहां पर चरम घटनाएं अकेले, एक-दूसरे के साथ, एक-दूसरे के क्रम में, समय के साथ संयुक्त रूप से घटित हो सकती हैं। यह चरम घटनाओं के संभावित अंतर-प्रभावों को भी ध्यान में रखती हैं। एक या एक से अधिक खतरों के बारे में चेतावनी देने की क्षमता के साथ, एमएचईडब्ल्यूएस, समन्वित व उपयुक्त तंत्रों और क्षमताओं के माध्यम से, विभिन्न जोखिम के लिए अद्यतन और सटीक आपदा चिन्हीकरण (hazard identification) के लिए विविध विषयों को शामिल करके, चेतावनियों की दक्षता और निरंतरता को बढ़ाती है।

  • आपदा प्रबंधन में पूर्व चेतावनी प्रणालियां कितने प्रकार की होती हैं और उदाहरण क्या हैं?

    ईडब्ल्यूएस (EWS) को वर्गीकृत करने के कई तरीके हैं, जैसे कि खतरे के प्रकार के आधार पर, संचालित करने के स्तर या इसमें एकल या बहु-जोखिमों को शामिल करने के आधार पर (यूएन-स्पाइडर 2021)। वैश्विक स्तर पर उपलब्ध पूर्व चेतावनी प्रणाली के प्रकारों के कुछ उदाहरणों में शामिल हैं: 1. मौसम एवं जलवायु संबंधी ईडब्ल्यूएसः इन प्रणालियों को मौसम की चरम घटनाओं जैसे तूफान, बवंडर और लू (हीटवेव) के साथ सूखे व बाढ़ जैसे दीर्घकालिक जलवायु संबंधी जोखिमों की अग्रिम सूचना देने के लिए बनाया गया है। ये प्रणालियां स्थानीय अधिकारियों और समुदायों को अग्रिम चेतावनी देती हैं, जिससे उन्हें तैयारी करने और आवश्यक सावधानी बरतने के लिए समय मिल जाता है। 2. भूकंप संबंधी ईडब्ल्यूएसः ये प्रणालियां संभावित भूकंपों का पता लगाने और प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को चेतावनी देने के लिए भूकंपमापी (सीस्मोमीटर) का उपयोग करती हैं। इससे लोगों को सह आश्रय खोजने और संभावित नुकसान से बचने का समय मिल सकता है। 3. सुनामी संबंधी ईडब्ल्यूएसः भूकंप संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली की तरह ही सुनामी संबंधी पूर्व चेतावनी प्रणाली समुद्र में भूकंपीय गतिविधि का पता लगाने और संभावित सुनामी के मार्गों के बारे में तटीय समुदायों को सतर्क करने के लिए सेंसर का उपयोग करती है। 4. दावानल (जंगल की आग) से संबंधित ईडब्ल्यूएसः ये प्रणालियां दावानल के जोखिम का अनुमान लगाने और आस-पास के समुदायों को सतर्क करने के लिए मौसम, वनस्पतियों और अन्य कारकों के आंकड़ों का उपयोग करती हैं।

  • प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों के प्रमुख स्तंभ क्या हैं?

    ‘एक सिरे से दूसरे सिरे तक’ प्रभावी और “जन-केंद्रित” पूर्व चेतावनी प्रणालियों में आपस में जुड़े हुए चार प्रमुख तत्व शामिल हो सकते हैं: 1. आंकड़ों का व्यवस्थित संग्रह और आपदा जोखिम के आकलनों पर आधारित आपदा जोखिम की जानकारी। 2. जोखिमों और संभावित नतीजों की तलाश, निगरानी, विश्लेषण और पूर्वानुमान। 3. आधिकारिक स्रोतों की ओर से प्रामाणिक, समयबद्ध, सटीक और लागू करने योग्य चेतावनियों और संभावना व प्रभावों से संबंधित जानकारियों का प्रसारण व संचार। 4. प्राप्त चेतावनियों पर प्रतिक्रिया देने के लिए सभी स्तरों पर तैयारी। इन चार परस्पर संबंधित घटकों के लिए विभिन्न क्षेत्रों और विभिन्न स्तरों पर तालमेल करने की आवश्यकता होती है, ताकि चेतावनी प्रणाली के प्रभावी ढंग से काम कर सके और निरंतर सुधार के लिए एक फीडबैक तंत्र शामिल किया जा सके। किसी एक घटक की विफलता या उनमें तालमेल की कमी पूरी प्रणाली की विफलता का कारण बन सकती है।

  • पूर्व चेतावनियों के प्रसारण के विभिन्न उपाय क्या हैं?

    पूर्व चेतावनी सूचना की सुलभता का सबसे प्रमुख घटक पूर्व चेतावनी प्रसार प्रणालियों (ईडब्ल्यूडीएस) तक पहुंच है। ईडब्ल्यूडीएस की सुलभता यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि जानकारियां राज्य, जिला और प्रखंड स्तर से समुदायों के बीच प्रसारित-प्रचारित हो, ताकि चक्रवात की स्थिति में समुद्र के सबसे नजदीक रहने वाले अंतिम व्यक्ति को चक्रवात या किसी अन्य आपदा के आने की स्थिति में उपयुक्त कदम उठाने के बारे में अच्छी तरह से जानकारी मिल सके। सटीक जानकारी के बगैर लोग अक्सर अस्पष्ट और विरोधाभासी रिपोर्टों के आधार पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए मजबूर होते हैं। इसलिए, व्यक्तिगत स्तर के साथ-साथ प्रतिक्रिया देने वाली संस्थानों के स्तर पर भी तैयारियों को सुनिश्चित करने के लिए, आपदा चेतावनी को अधिकतम संख्या में लोगों तक तेजी से पहुंचाने की तत्काल जरूरत होती है (एनडीएमए 2021)। कॉल, मैसेज, पुश मैसेज और अन्य अलर्ट जैसी दूरसंचार सेवाएं जनता तक पूर्व चेतावनी के प्रसारण का सबसे विश्वसनीय और तात्कालिक उपाय हैं। हालांकि, समुदाय की जरूरतों और बोधगम्यता के स्तर के आधार पर सूचनाओं के प्रसारण के लिए सबसे उपयुक्त तरीकों की पहचान करना आवश्यक है। प्रसारण तकनीकों को आगे और व्यापक एवं लक्षित प्रसार तकनीकों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लेकिन तकनीकों का यह वर्गीकरण इस बात पर भी निर्भर करता है कि उनका उपयोग व अनुप्रयोग कहां पर होना है। जहां सूचना प्रसारित करने के लक्षित तरीके अलग-अलग उपयोगकर्ताओं, परिवारों, व्यक्तियों, पड़ोसियों, पूर्व-निर्धारित समूहों, एजेंसियों इत्यादि को चेतावनी दे सकते हैं, वहीं व्यापक तरीके (सामूहिक प्रसार तकनीक) कम लक्षित होते हैं और मुख्य रूप से टेलीविजन-रेडियो, लाउडस्पीकर, संकेत-सायरन जैसे मुख्यधारा के माध्यम से प्रसारित होते हैं।

  • भारत को पूर्व चेतावनी प्रणालियों में क्यों निवेश करना चाहिए?

    2019 ग्लोबन कमीशन ऑन एडॉप्शंस फ्लैगशिप रिपोर्ट, एडेप्ट नाउ ,ने पाया कि पूर्व चेतावनी प्रणाली में निवेश दस गुना से अधिक फायदा (रिटर्न) देता है। यह रिपोर्ट में शामिल दूसरे अनुकूलन उपायों की तुलना में कहीं अधिक था। इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि आने वाले तूफान या लू से सिर्फ 24 घंटे पहले चेतावनी जारी करने से संभावित नुकसान को 30 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है। इसके अलावा, विकासशील देशों में ऐसी प्रणालियों पर 800 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करने से सालाना 3-16 बिलियन अमेरिकी डॉलर के नुकसान को रोकने में मदद मिलेगी (यूएन 2022)। इसलिए, एक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली को लगाने में किया गया निवेश दीर्घकालिक जलवायु लचीलापन को विकसित करते हुए जनजीवन को बचाने और अर्थव्यवस्थाओं की सुरक्षा देने का दोहरा उद्देश्य पूरा करेगा। एक प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली लचीलापन लाने की दिशा में पहला कदम है, क्योंकि यह नीति-निर्माताओं, सार्वजनिक अधिकारियों, प्रशासकों और समुदायों को भविष्य की योजना बनाने और जीवन व आजीविका को सुरक्षित बनाने में सक्षम बनाती है। इस वर्ष जी-20 की भारत की अध्यक्षता में 1999 के बाद पहली बार आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डीआरआर) से संबंधित एक कार्यसमूह गठित किया गया है। इसके अलावा, जी-20 की भारत की अध्यक्षता के पूरे कार्यकाल के दौरान पूर्व चेतावनी प्रणाली प्रमुख प्राथमिकताओं में से एक रही है। यह डीआरआर से संबंधित प्रधानमंत्री के दस-सूत्री एजेंडे के अनुरूप है।

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