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REPORT
हाउ कैन पंजाब इंक्रीज द अडॉप्शन ऑफ क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट मेथड्स?
सर्वे इंसाइट्स फ्रॉम 11 डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ द स्टेट
02 July, 2024 | Clean Air
कुरिंजी केमंथ, रमणदीप सिंह और स्नेहा मारिया इग्नाशियस

प्रस्तावित उद्धरण: केमंथ, कुरिंजी, रमणदीप सिंह और स्नेहा मारिया इग्नाशियस। 2024। हाउ कैन पंजाब इंक्रीज द एडॉप्शन ऑफ क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट मेथड्स? सर्वे इंसाइट्स फ्रॉम 11 डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ द स्टेट। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर।

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

पंजाब ने 2024 में अपने धान के शत-प्रतिशत फसल अवशेषों (लगभग 2 करोड़ मीट्रिक टन) का प्रबंधन करने का लक्ष्य रखा है। पंजाब अपने राज्य में इन-सीटू (खेत में) और एक्स-सीटू (खेत के बाहर) फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) गतिविधियों को बढ़ाकर यह लक्ष्य पाना चाहता है। पिछले साल राज्य ने खरीफ की खेती से जुड़े आग की 35,000 से अधिक घटनाएं दर्ज की थीं। हालांकि, यह कोविड से पहले के समय में दर्ज किए गए मामलों की तुलना में कम है, फिर भी यह भारत की स्वच्छ वायु और जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए समस्या पैदा कर रहा है। आग जलाने की घटनाओं को शून्य करने के लिए सीआरएम उपायों की दिशा में बाधारहित परिवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए, विभिन्न जिलों में मौजूद अनुभवों, चुनौतियों और अच्छी कार्यपद्धतियों से सीखना जरूरी है।

इस अध्ययन ने पंजाब के 11 जिलों से लगभग 1500 किसानों को शामिल करके एक राज्यस्तरीय प्राथमिक सर्वेक्षण किया है। यह मूल्यांकन पंजाब में सीआरएम की स्थिति का बहुआयामी मूल्यांकन उपलब्ध कराता है, जो सीआरएम उपायों की उपलब्धता, लागत, खर्च और निरंतर स्वीकार्यता से जुड़ी क्षेत्र-स्तरीय सूक्ष्म जानकारियों को सामने लाता है। इस रिपोर्ट के माध्यम से, हम पंजाब में आग जलाने के मामलों को शून्य करने के लक्ष्य की दिशा में लगातार आने वाली बाधाओं के बारे में केंद्र और पंजाब सरकारों को जानकारी देना चाहते हैं और धान की किस्मों में विविधीकरण, फसल अवशेष-आधारित उत्पादों के लिए बाजार का विकास और सीआरएम मशीनों की वर्तमान क्षमता का अधिकतम उपयोग के लिए तुरंत लागू करने योग्य उपायों के बारे में सुझाव भी देते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • पर्यावरणीय रूप से लाभकारी कम अवधि में उगने वाली धान की किस्मों की मांग बढ़ी है। 2022 में सर्वेक्षण में शामिल तकरीबन 66 प्रतिशत किसानों ने कम अवधि वाली धान की परमल (पीआर) किस्मों को उगाया था। हालांकि लंबी अवधि और अतिरिक्त भूसे पैदा करने वाली पूसा 44 किस्म की बुवाई भी संगरूर और लुधियाना जैसे आग जलाने के उच्च और मध्यम स्तर वाले जिलों में अभी भी जारी है।
  • सर्वेक्षण में शामिल लगभग 13 प्रतिशत किसानों ने खरीफ 2022 में धान की पूरी पराली को जलाया था। छोटे और सीमांत किसानों की तुलना में पराली जलाने का चलन मध्यम और बड़े किसानों के बीच अधिक पाया गया, क्योंकि छोटे-सीमांत किसानों को आर्थिक दंड और राजस्व रिकॉर्ड में लाल प्रविष्टियां मिलने का भय था। नियमों को न मानने के नतीजे कोविड के बाद के वर्षों में पहले से अधिक सख्त हो गए हैं।
  • सुपर सीडर और रोटावेटर पंजाब में सर्वाधिक इस्तेमाल की जाने वाली पराली प्रबंधन मशीनें हैं। सर्वेक्षण में शामिल 58% से ज़्यादा किसानों ने खरीफ 2022 में धान की पराली के प्रबंधन के लिए इन-सीटू सीआरएम मशीनों का उपयोग किया। हालांकि, इनमें से लगभग आधे लोगों ने सीआरएम मशीनों के इस्तेमाल से पहले खुले भूसे को जला दिया था। उनका मानना है कि पराली को आंशिक रूप से जलाने से लागत कम आएगी और कीटों पर नियंत्रण भी होगा।
  • इन-सीटू सीआरएम मशीनों का उपयोग करने वाले 63 प्रतिशत से अधिक किसानों ने उन्हें किराए पर लिया था, यह छोटे और सीमांत किसानों के बीच काफी अधिक प्रचलित है। सीआरएम मशीनों को किराए पर लेने वाले किसानों ने मुख्य रूप से इसे दूसरे किसानों (किराए पर लेकर उपयोग करने वाले 82 प्रतिशत सीआरएम उपयोगकर्ता) से किराए पर लिया था, जो उनके मित्र या रिश्तेदार थे। यहां तक कि जिन लोगों ने सहकारी समितियों (12 प्रतिशत) या अन्य स्रोतों जैसे कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) (तीन प्रतिशत) से सीआरएम मशीनें ली थीं, वे भी मशीनरी पाने के लिए निजी संबंधों पर निर्भर थे।
  • सर्वेक्षण में शामिल लगभग 33 प्रतिशत किसानों ने एक्स-सीटू उपायों, जैसे कि बायोमास अवशेषों को बायोमास एग्रीगेटर्स को, पशुपालक समुदायों को चारे के लिए देने जैसे विकल्प चुने और इनमें से 66 प्रतिशत किसानों ने पहले पराली प्रबंधन के लिए इन-सीटू उपायों का इस्तेमाल किया था। यह इन-सीटू उपायों की तुलना में एक्स-सीटू उपायों की स्पष्ट प्राथमिकता दिखाता है, क्योंकि इन-सीटू उपायों से जुड़ी लागत का किसानों पर बोझ रहता है।
  • एक्स-सीटू उपायों को अपनाने वाले किसान पूरी तरह से संतुष्ट नहीं मिले। धान का भूसा बेचने पर सिर्फ तीन प्रतिशत किसानों को लगभग ₹1,200 (14 अमेरिकी डॉलर) प्रति एकड़ का भुगतान मिला। इसके अलावा, लगभग 28 प्रतिशत किसानों को पराली हटाने के लिए इसके खरीदार को भगुतान करना पड़ा, जबकि 69 प्रतिशत किसानों ने पराली को बिना पैसे के दे दिया।

क्या आपके कोई सवाल हैं?

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प्रोग्राम एसोसिएट
“पंजाब पराली जलाने के खिलाफ दशकों से चली आ रही अपनी लड़ाई में काफी आगे बढ़ चुका है, और अब हम स्पष्ट रूप से खेतों में आग जलाने के मामलों में कमी देख रहे हैं। हालांकि, राज्य को पराली को आंशिक रूप से जलाने, मशीनरी के अपर्याप्त उपयोग, कस्टम हायरिंग सेंटर के असंतोषजनक प्रदर्शन और किसानों में मौजूद व्यवहारिक व मनोवैज्ञानिक पूर्वाग्रहों जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। यह अध्ययन एक सतर्क करने वाली रिपोर्ट के रूप में काम करेगा, जो पंजाब के पराली प्रबंधन यात्रा की वास्तविकताओं को दर्ज करता है, जिसमें भविष्य को ध्यान में रखकर लाए जाने वाले समाधान शामिल हैं।”

कार्यकारी सारांश

भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1960-61 में 115.6 मिलियन टन (एमटी) से लगभग तीन गुना बढ़कर 2022-23 में 329.6 मिलियन टन हो गया है। ऐसा हरित क्रांति के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों की बेहतर पहुंच की वजह से संभव हो पाया है (देशपांडे व अन्य 2023)। हालांकि, इस उत्पादन वृद्धि के कारण फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) के लिए गैर-सतत रणनीतियों को अपनाया गया, जिसमें पराली को जलाना शामिल है (खुन्द्रकपम व सरमाह 2023)। प्रतिवर्ष उत्पादित 754 मिलियन टन फसल बायोमास में से छत बनाने और पशुओं की बैठने की जगहों पर इस्तेमाल करने जैसे कामों के लिए उपयोग होने के बाद भी लगभग 228 मिलियन टन फसल अवशेष बचा रह जाता है; इसका अधिकांश हिस्सा जला दिया जाता है (सरदार स्वर्ण सिंह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायो- एनर्जी एन.डी.)। धान-गेहूं की खेती की प्रमुखता वाले पंजाब जैसे उत्तरी राज्यों में पराली जलाने का चलन अधिक है। इस पुरानी प्रथा को जारी रखने में सहायक कारकों में धान-गेहूं का फसल तंत्र, लंबी अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्में, खेत फसल अवशेष को छोड़कर कटाई करने वाली मशीनें, मजदूरों की कमी और फसल अवशेषों के लिए व्यवहार्य बाजार का अभाव शामिल है (कुंरिंजी व प्रकाश 2021)।

बहुत अधिक मात्रा में पराली जलाने से संपर्क होने पर श्वसन तंत्र से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा तीन गुना बढ़ जाता है (चक्रवर्ती व अन्य 2019)। एटमॉस्फेयरिक मॉडलिंग अध्ययनों का आकलन है कि पराली जलाने की घटनाएं जब अपने चरम पर होती हैं, तब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में फसल कटाई के बाद के पीएम 2.5 के स्तर में पराली जलने का योगदान 30 प्रतिशत होता है (खान व अन्य 2022; कुरिंजी, खान और गांगुली 2021)। पराली जलाने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को देखते हुए पंजाब जैसे राज्यों ने कई उपाय किए हैं, जिनमें पराली प्रबंधन की अवधि को बढ़ाने के लिए कम समय पकने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देना, सीआरएम मशीनों पर सब्सिडी देना और बायोमास के लिए बाजार तैयार करने के लिए उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराना शामिल है (पीआईबी 2023)। दो सबसे प्रमुख सीआरएम मशीनों के वर्तमान भंडार - सुपर सीडर (43,452 यूनिट) और हैप्पी सीडर (13,560 यूनिट) – को अगर अधिकतम क्षमता के साथ इस्तेमाल किया जाए तो यह पंजाब में धान के शत-प्रतिशत खेतों के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि, समय से सीआरएम मशीनें मिलने की बाधाओं और उच्च संचालन खर्च के साथ-साथ इन-सीटू सीआरएम मशीनों से बुआई किए जाने वाले गेहूं की उपज कम रहने और उनके कीट के हमलों का शिकार होने की गलत धारणाओं के कारण जीरो-बर्न अवशेष प्रबंधन की स्वीकार्यता दर कम रही है (कुरिंजी और प्रकाश 2021; प्रकाश और सिंह 2022)।

फसल अवशेषों को जलाने का चलन रोककर पंजाब में प्रतिवर्ष 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान रोका जा सकता है (चक्रवर्ती व अन्य 2019)। इसके लिए जरूरी है कि सीआरएम उपायों को समय पर लागू करने और व्यापक रूप से अपनाने में तेजी लाई जाए। धान की पसंदीदा किस्मों और सीआरएम विधियों के बारे में विस्तृत जानकारी लेने के साथ-साथ किसानों द्वारा इनके उपयोग से संबंधित अनुभवों को जानने के लिए हमने मार्च और मई 2023 के बीच पंजाब के 11 जिलों के 1,478 किसानों के बीच सर्वेक्षण किया। चुनिंदा जिलों - अमृतसर, बठिंडा, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का, फिरोजपुर, गुरदासपुर, जालंधर, लुधियाना, पटियाला, संगरूर और एसबीएस नगर – में सामूहिक रूप से 2022 में खरीफ सीजन के दौरान आग जलाने के लगभग 58 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए थे। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य इन तीन मुख्य सवालों के जवाब ढूंढना था:

  • पंजाब में धान की किस्मों में विविधता कैसे लाई जा सकती है?
  • सीआरएम मशीनों में वृद्धि से कृषि फसल अवशेष को खुले में जलाने के मामलों में कितनी कमी आई है, और कौन का कारक इसमें मौजूद अंतर की सही व्याख्या कर सकता है?
  • क्या पंजाब के किसानों के बीच एक्स-सीटू विधियां लोकप्रिय हो सकती हैं?

हमने पंजाब के किसानों की जनसंख्या को दिखाने के लिए कई चरणों में स्तरीकृत नमूना लेने की विधि का इस्तेमाल किया है। निष्कर्षों की संपूर्णता को पाने के लिए, हमने विश्लेषण के चरण में कृषि विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के कर्मचारियों के साथ साक्षात्कार किए हैं। यह सर्वेक्षण पंजाब में सीआरएम की स्थिति पर एक बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करता है और सीआरएम विधियों को लगातार लागू करने के बारे में कई अंतर्दृष्टियों को रेखांकित करता है। 2023 में धुएं से भरी एक और सर्दी की प्रतिक्रिया में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने पंजाब को एक समयबद्ध कार्य योजना बनाने और 1 जनवरी से 1 सितंबर 2024 तक चरणबद्ध तरीके से निवारक उपायों को लागू करने का निर्देश दिया था। इस अध्ययन के जरिए हम केंद्र और पंजाब सरकार को उन चुनौतियों के बारे में जानकारी देना चाहते हैं, जिनका किसान जमीनी स्तर पर सामना कर रहे हैं। इसके साथ, वर्तमान और आगामी मौसमों में पराली जलाने के मामलों को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत उपायों को सामने रखना चाहते हैं।

मुख्य निष्कर्ष

फसलों की पसंद में कैसे बदलाव आया?

सरकार की तरफ से प्रोत्साहित की जा रही कम अवधि की धान की किस्मों की मांग बढ़ रही है।

  • एक महत्वपूर्ण रुझान कम अवधि की धान की किस्मों का क्षेत्रफल बढ़ा है, 2012 में 32.6 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 69.8 प्रतिशत हो गया है (ढिल्लों और गिल 2022)। 2022 में सर्वेक्षण में शामिल लगभग 66 प्रतिशत किसानों ने कम समय में पकने वाली परमल चावल (पीआर) की किस्मों को उगाया था। पीआर 126 सर्वाधिक मांग वाली धान की किस्म है, जिसे 57.7 प्रतिशत पीआर उत्पादकों ने लगाया था, लेकिन इसकी आपूर्ति कम है।

पराली जलाने के अधिक मामले वाले जिले अभी भी पूसा 44 उगा रहे हैं

  • खरीफ 2022 में सर्वेक्षण में शामिल 36 प्रतिशत से अधिक किसानों ने पूसा 443 धान को लगाया, क्यों इसकी पैदावार बहुत अधिक रहती है। पराली जलाने के मामले में उच्च और मध्यम स्थान रखने वाले संगरूर और लुधियाना जैसे जिलों में पूसा उत्पादकों का अनुपात सर्वाधिक है। हालांकि, वर्तमान कृषि सब्सिडी (बिजली और उर्वरक के लिए) उन्हें फसल के कृषि इनपुट उपयोग पर आने वाले असर को अनदेखा करने के लिए प्रेरित करती है (जोशी व अन्य 2018; ढिल्लों और गिल 2022)। पूसा 44 का पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभावों को देखते हुए सरकार ने अक्टूबर 2023 में इस किस्म को हटा दिया। हालांकि, मुख्य रूप से निजी बीज विक्रेताओं के माध्यम से यह किस्म अभी भी प्रचलित है।

क्या पंजाब में इन-सीटू सीआरएम तरीकों को अपनाने में सरकारी प्रयासों का प्रभाव पड़ा है?

भले ही पर्याप्त मशीनरी हो, आग जलाने समस्या का पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ है

  • सर्वेक्षण में शामिल लगभग 13 प्रतिशत किसानों ने खरीफ 2022 (चित्र ईएस1) के दौरान अपनी पूरी पराली को जला दिया था। छोटे और सीमांत किसानों की तुलना में पराली जलाने की प्रथा मध्यम और बड़े किसानों के बीच अधिक प्रचलित मिली, क्योंकि छोटे-सीमांत किसान को आर्थिक दंड और राजस्व रिकॉर्ड में लाल प्रविष्टियां दर्ज होने का डर था; कोविड के बाद के वर्षों में नियमों को न मानने के परिणाम अधिक सख्त हो गए थे।
  • सुपर सीडर जैसी विभिन्न इन-सीटू तकनीकों को अपनाने वाले 58 प्रतिशत किसानों में से लगभग आधे किसानों (30 प्रतिशत) ने सीआरएम मशीन के प्रभावी संचालन और कीट नियंत्रण के लिए उनके उपयोग से पहले आंशिक रूप से पराली जलाने का सहारा लिया था (चित्र ईएस2)। पराली को आंशिक रूप से जलाने की प्रथा में सुधार लाने के लिए सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) से लैस कंबाइन हार्वेस्टर का उपयोग करना जरूरी है, जो खेत में भूसे को एक समान रूप से काटने और फैलाने में सक्षम हो। सरकार की तरफ सुपर एसएमएस का उपयोग अनिवार्य किए जाने के बावजूद, 64 प्रतिशत किसानों ने इसका इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि यह उपलब्ध नहीं था और इसकी परिचालन लागत बहुत अधिक थी।

चित्र ईएस1: इन-सीटू सीआरएम मशीन के लगभग आधे उपयोगकर्ताओं ने मशीन का उपयोग करने से पहले सूखा भूसा जलाया था।

सीआरएम मशीनों को किराए पर लेते समय, डिजिटल उपायों की तुलना में व्यक्तिगत संबंधों को अधिक महत्व दिया जाता है

  • सीआरएम मशीनों के 63% से अधिक उपयोगकर्ताओं ने इन मशीनों को किराए पर लिया था, खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों के बीच यह काफी अधिक प्रचलित है। सीआरएम मशीनों को किराए पर लेने वाले किसानों ने मुख्य रूप से अपने साथी किसानों (किराए पर सीआरएम मशीन का उपयोग करने वाले 82 प्रतिशत उपयोगकर्ता) से ही उन्हें किराए पर लिया था, जो उनके दोस्त या रिश्तेदार हैं। यहां तक कि जिन लोगों ने सहकारी समितियों (12 प्रतिशत) या कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) (3 प्रतिशत) जैसे अन्य स्रोतों से मशीनरी ली थी, वे भी मशीनें पाने के लिए व्यक्तिगत संपर्कों पर ही निर्भर थे।
  • महज 1 प्रतिशत किसानों ने पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर के आई-खेत ऐप का उपयोग करके कृषि मशीनों को किराये पर लेने की सेवाओं का लाभ लिया है। इसकी कारण यह है कि आई-खेत ऐप के वर्तमान संस्करण में बहुत सारी निजी जानकारियां मांगी जाती हैं, जिसमें आधार नंबर और भूमि स्वामित्व की जानकारी शामिल है, जिसके कारण किसानों के बीच इसकी स्वीकार्यता सीमित है।

चित्र ईएस2: पंजाब ने 2022 में धान के फसल अवशेषों का प्रबंधन करने के लिए मुख्य रूप से सुपर सीडर और रोटावेटर का इस्तेमाल किया।

कीटों का हमला होने और गेहूं की पैदावार घटने से जुड़े भ्रम मौजूद हैं

इन-सीटू उपायों को अपनाने वाले लगभग 77 प्रतिशत किसानों ने अनुशंसित बदलावों को अपनाए बगैर बुवाई के परंपरागत तरीके को जारी रखा है। इनमें से 20 प्रतिशत से अधिक किसानों को गेहूं की पैदावार में गिरावट आने और कीटों के हमलों का सामना करना पड़ा और उन्होंने इन समस्याओं के लिए इन-सीटू सीआरएम मशीनों के उपयोग को जिम्मेदार ठहराया।सिंचाई, उर्वरक और चूहा नियंत्रण के तरीकों में बताए गए बदलावों को अपनाकर और इन-सीटू मशीनों का इस्तेमाल करके गेहूं की पैदावार में गिरावट और कीटों के हमलों से जुड़ी चिंताओं को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, इन-सीटू मशीनों का इस्तेमाल करने वाले किसानों में से केवल 7 प्रतिशत किसानों को ही सीआरएम मशीनों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण मिला था।

एक्स-सीटू सीआरएम लोकप्रिय हो रहा है

  • अतिरिक्त आय की संभावना के कारण भूसे को चारे या ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल करने जैसे एक्स-सीटू सीआरएम काफी लोकप्रियता हासिल कर रही है। हमारे सर्वेक्षण के अनुसार सर्वे में शामिल लगभग 33 प्रतिशत किसानों ने एक्स-सीटू विधियों को चुना, और इनमें से 66 प्रतिशत किसानों ने पहले अपने फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए इन-सीटू विधियों का उपयोग किया था। यह इन-सीटू विकल्पों की तुलना में एक्स-सीटू उपायों को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दिए जाने का संकेत देता है, क्योंकि इन-सीटू विधियों से जुड़ी लागत किसानों के लिए बोझ बनी हुई है।
  • एक्स-सीटू तरीकों में बायोमास को एकत्रित करने वालों/बेलर्स को फसल-अवशेष देना (60.4 प्रतिशत एक्स-सीटू उपयोगकर्ता), या फिर चरवाहा समुदायों (28.8 प्रतिशत) चारे के लिए देना और आसपास के उद्योगों को भेजना शामिल है।
  • हालांकि, एक्स-सीटू उपायों को अपना रहे किसान पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं। धान के फसल अवशेषों को बेचते समय महज 3 प्रतिशत एक्स-सीटू किसानों को लगभग 1,200 रुपए प्रति एकड़ का भुगतान मिला। इसके अलावा, लगभग 28 प्रतिशत किसानों को खेतों से पराली हटाने के लिए खरीदार को पैसे देने पड़े, जबकि 69 प्रतिशत किसानों को फसल अवशेष मुफ्त में देना पड़ा था।
सीआरएम उपायों को सतत रूप से अपनाए जाने की रणनीतियां

अपने निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए, हम पंजाब और उसके बाहर के सभी नीति निर्माताओं को आगामी मौसमों में फसल अवशेष जलाने में कमी लाने के लिए निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देने का सुझाव देते हैं:

धान की किस्मों में विविधता लाना

  • पंजाब सरकार द्वारा अक्टूबर 2023 में पूसा 44 की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद निजी बीज विक्रेताओं के माध्यम से इसके बीज अभी भी प्रचलन में हैं। राज्य को निजी बीज विक्रेताओं, वितरकों और उत्पादकों की सख्त निगरानी करना चाहिए, ताकि इस किस्म की खेती पर पूरी तरह से रोक सुनिश्चित हो सके।
  • बुवाई के पिछले दो सीजन (2022 और 2023) में पीआर 126 और पीआर 128 जैसे लोकप्रिय किस्मों के बीज भंडार में बहुत अधिक कमी आई। कई किसानों को पीआर 121 जैसी कम लोकप्रिय किस्मों का सहारा लेना पड़ा। इसलिए राज्य के अधिकारियों को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) जैसे मान्यता प्राप्त संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, सरकारी बीज फार्मों, राष्ट्रीय बीज निगम और राज्य बीज एजेंसियों को प्रोत्साहित करना चाहिए, ताकि राज्य में बीज मांग को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और लोकप्रिय पीआर किस्मों का संरक्षण किया जा सके
  • 2022 में मूंग की कटाई करने के बाद उसी खेत में पीआर 126 या बासमती की बुवाई करके उगाई गई ग्रीष्मकालीन मूंग को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने की पहल से किसानों के बीच पीआर 126 के बीच की भारी मांग सामने आई (कमल 2022; डे 2022)। राज्य को धान की पूसा किस्म उगाने वाले किसानों के बीच कम अवधि वाली किस्मों का उपयोग बढ़ाने के लिए ऐसे प्रोत्साहन जारी रखने चाहिए

इन-सीटू सीआरएम उपाय

  • राज्य अपनी सीआरएम सब्सिडी योजना के तहत प्रतिवर्ष नई सीआरएम मशीनों (2020 में सुपर सीडर्स, 2022 में स्मार्ट सीडर्स, और 2023 में सरफेस सीडर्स) को ला रहा है। जहां सुपर सीडर आम तौर पर  पसंद किया जाता है, हैप्पी सीडर, स्मार्ट सीडर और सुपर एसएमएस जैसी मशीनों की किसानों के बीच स्वीकार्यता सीमित है। संसाधनों के गलत आवंटन से बचने के लिए, सब्सिडी योजना में शामिल करने से पहले इन मशीनों की प्रभावशीलता और किसानों की पसंद (लागत और उपज के मामले में) का पायलट कार्यक्रमों के जरिए मूल्यांकन करना बहुत जरूरी है। इसके लिए, राज्य को सीआरएम सब्सिडी योजना में सिर्फ उन मशीनों को शामिल करने के लिए एक मूल्यांकन ढांचा तैयार करना होगा, जिनकी सफलता स्थापित हो चुकी है
  • पंजाब सरकार ने अपने आई-खेत ऐप के माध्यम से सीआरएम मशीनों को किराए पर लेने का मॉडल आगे बढ़ाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। लेकिन अपने वर्तमान संस्करण में यह ऐप आधार नंबर और भूमि स्वामित्व की जानकारी समेत कई व्यक्तिगत जानकारियों को एकत्रित करता है, जो इसे किसानों के बीच कम आकर्षक बनाता है। इसका समाधान करने के लिए, पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर (पीआरएससी) को ऐप को अपग्रेड करना चाहिए, ताकि इसमें प्रतिक्रियात्मक संरचना (responsive design) को शामिल किया जा सके और यह किसानों की आवश्यकताओं, पसंद और व्यवहारों के अनुरूप हो। इसके अलावा, इसे सीआरएम विधियों के स्वास्थ्य और लागत लाभ, मिट्टी की सेहत में सुधार और कृषि इनपुट पर होने वाली बचत से संबंधित व्यक्तिगत सूचनाएं भेजने के लिए एक स्वचालित अलर्ट सुविधा को सक्षम बनाना चाहिए।
  • सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है कि कई वर्षों से प्रचार और जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद किसानों के बीच कीटों के हमले और सीआरएम मशीनों से बुवाई किए गए गेहूं की उत्पादकता से जुड़ी कई गलतफहमियां मौजूद हैं। यह इस बात का संकेत है कि इन चुनौतियों को घटाने वाले बदलावों को कृषि पद्धतियों में उचित रूप से शामिल करने के बारे में जानकारी का अभाव है। इसलिए, कृषि और किसान कल्याण विभाग को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) जैसे तकनीकी संस्थानों के सहयोग से एक अभ्यास निर्देशिका तैयार करनी चाहिए, जिसमें सीआरएम विधियों का उपयोग करते समय मानक संचालन प्रक्रियाओं और सर्वोत्तम प्रथाओं की सूची हो
  • कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और कृषि विभागों द्वारा अधिकतर प्रशिक्षण कार्यशालाएं खरीफ सीजन (सितंबर) के अंत में आयोजित की जाती हैं, जब किसान फसलों की कटाई करने और उसे स्थानीय मंडियों में बेचने में व्यस्त हो जाते हैं। इसकी जगह पर राज्य को अच्छी तरह से तैयार की गई जागरूकता-सामग्री के साथ पूरे साल चलने वाली प्रशिक्षण कार्यशालाएं आयोजित करनी चाहिए, जिनमें न केवल जीरो-बर्न सीआरएम विधियां, बल्कि रबी फसलों की खेती के तरीकों में आवश्यक बदलावों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

एक्स-सीटू सीआरएम विधियां

  • यद्यपि पंजाब में एक्स-सीटू सीआरएम का क्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ रहा है, लेकिन हमारे सर्वेक्षण से पता चलता है कि एक्स-सीटू विधियों का इस्तेमाल करने वाले केवल 2.9 प्रतिशत किसानों को ही अपनी पराली बेचते समय लगभग 1,200 रुपए प्रति एकड़ का भुगतान मिला। बाकी किसानों ने या तो पराली मुफ्त में दे दी थी या पराली को खेत से हटाने के लिए लगभग 1,000 रुपये प्रति एकड़ का भुगतान किया था। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (MoAFW) द्वारा जुलाई 2023 में जारी नवीनतम सीआरएम दिशानिर्देशों के अनुसार, एकत्रित बायोमास की लागत किसान समूह/संग्रहकर्ता और उद्योग द्वारा बाजार की स्थिति के आधार पर आपसी सहमति से निर्धारित की जानी है। इसलिए, पंजाब ऊर्जा विकास एजेंसी (PEDA) को कच्चे बायोमास और बायोमास-आधारित उत्पादों के लिए एक न्यूनतम मूल्य तय करना चाहिए, ताकि किसानों को पराली न जलाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें कम से कम एक उचित मूल्य मिल सके।
एंडनोट्स
  • हर साल जोखिम कारक खत्म करके बचाए गए विकलांगता-समायोजित जीवन का आर्थिक मूल्य।
  • छोटी अवधि वाली किस्मों की खेती करते समय, किसानों को वैज्ञानिक तरीके से धान के अवशेष प्रबंधन के लिए अधिक समय मिलता है।
  • पूसा 44 अपनी लंबी फसल अवधि, भूसे के अधिक उत्पादन और खेती के इनपुट (खाद, कीटनाशक और पानी) के ज्यादा इस्तेमाल के लिए कुख्यात है (जे. एम. सिंह व अन्य 2022)।

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

  • फसल अवशेष प्रबंधन क्या है?

    यह धान, गेहूं आदि फसलों की कटाई के बाद खेत में बचे हुए फसल के अवशेषों को प्रबंधित करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है, जिसमें समावेश, मल्चिंग या बेलिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

  • किसान फसल के अवशेष क्यों जलाते हैं?

    किसान अक्सर अपने खेतों को साफ करने और अगले सीजन की फसलें बोने के लिए 15-20 दिनों की सीमित अवधि मिलने के कारण पराली को जलाने का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, फसल अवशेषों के लिए सीमित बाजार और फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों तक पहुंच की कमी भी किसानों को अपनी फसल के अवशेषों को जलाने का कारण देती है।

  • भारत फसल अवशेषों का प्रबंधन कैसे कर सकता है?

    भारत फसल विविधीकरण (crop diversification) के माध्यम से फसल अवशेष का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकता है, जिसमें कम समय में तैयार होने वाली और कम भूसा पैदा करने वाली धान की किस्मों, जैसे सरकार द्वारा प्रचारित PR126, PR128, PR121 इत्यादि, की खेती करना शामिल है। सुपर सीडर (Super Seeder) आदि जैसे सीआरएम (CRM) मशीनों का उचित इस्तेमाल और उद्योगों व कंप्रेस्ड बायोगैस (compressed biogas) संयंत्रों में उपयोग करने जैसे एक्स-सीटू विकल्पों को विस्तार देने से भी बचे हुए फसल अवशेष का प्रभावी उपयोग होता है।

  • बड़े पैमाने पर फसल अवशेषों को जलाने से हवा की गुणवत्ता पर कितना प्रभाव पड़ता है?

    एक टन फसल अवशेष जलाने से 1460 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड, 6 किलो कार्बन मोनोऑक्साइड, 3 किलो पार्टिकुलेट मैटर और 2 किलो सल्फर डाई ऑक्साइड निकलता है। वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि फसल अवशेषों को जलाने से भारत के PM2.5 उत्सर्जन में प्रतिवर्ष लगभग 15 प्रतिशत का योगदान होता है। दिल्ली का डिसीजन सपोर्ट सिस्टम का अनुमान है कि उत्तर-पश्चिमी राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में सर्वाधिक आग जलाने की अवधि के दौरान लगभग 20-30 प्रतिशत का योगदान होता है।

  • फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कौन सी मशीनें उपलब्ध हैं?

    फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाली मशीनें सुपर सीडर, रोटावेटर, ज़ीरो-टिल-ड्रिल और हैप्पी सीडर हैं, जो खेत में ही (इन-सीटू) फसल अवशेषों के प्रबंधन में इस्तेमाल होती हैं, वहीं बेलर, रेकर आदि खेत से बाहर (एक्स-सीटू) फसल अवशेष प्रबंधन में इस्तेमाल होती हैं।

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