
प्रस्तावित उद्धरण: केमंथ, कुरिंजी, रमणदीप सिंह और स्नेहा मारिया इग्नाशियस। 2024। हाउ कैन पंजाब इंक्रीज द एडॉप्शन ऑफ क्रॉप रेसिड्यू मैनेजमेंट मेथड्स? सर्वे इंसाइट्स फ्रॉम 11 डिस्ट्रिक्ट्स ऑफ द स्टेट। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर।
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
पंजाब ने 2024 में अपने धान के शत-प्रतिशत फसल अवशेषों (लगभग 2 करोड़ मीट्रिक टन) का प्रबंधन करने का लक्ष्य रखा है। पंजाब अपने राज्य में इन-सीटू (खेत में) और एक्स-सीटू (खेत के बाहर) फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) गतिविधियों को बढ़ाकर यह लक्ष्य पाना चाहता है। पिछले साल राज्य ने खरीफ की खेती से जुड़े आग की 35,000 से अधिक घटनाएं दर्ज की थीं। हालांकि, यह कोविड से पहले के समय में दर्ज किए गए मामलों की तुलना में कम है, फिर भी यह भारत की स्वच्छ वायु और जलवायु प्रतिबद्धताओं के लिए समस्या पैदा कर रहा है। आग जलाने की घटनाओं को शून्य करने के लिए सीआरएम उपायों की दिशा में बाधारहित परिवर्तन को सुनिश्चित करने के लिए, विभिन्न जिलों में मौजूद अनुभवों, चुनौतियों और अच्छी कार्यपद्धतियों से सीखना जरूरी है।
इस अध्ययन ने पंजाब के 11 जिलों से लगभग 1500 किसानों को शामिल करके एक राज्यस्तरीय प्राथमिक सर्वेक्षण किया है। यह मूल्यांकन पंजाब में सीआरएम की स्थिति का बहुआयामी मूल्यांकन उपलब्ध कराता है, जो सीआरएम उपायों की उपलब्धता, लागत, खर्च और निरंतर स्वीकार्यता से जुड़ी क्षेत्र-स्तरीय सूक्ष्म जानकारियों को सामने लाता है। इस रिपोर्ट के माध्यम से, हम पंजाब में आग जलाने के मामलों को शून्य करने के लक्ष्य की दिशा में लगातार आने वाली बाधाओं के बारे में केंद्र और पंजाब सरकारों को जानकारी देना चाहते हैं और धान की किस्मों में विविधीकरण, फसल अवशेष-आधारित उत्पादों के लिए बाजार का विकास और सीआरएम मशीनों की वर्तमान क्षमता का अधिकतम उपयोग के लिए तुरंत लागू करने योग्य उपायों के बारे में सुझाव भी देते हैं।
भारत का खाद्यान्न उत्पादन 1960-61 में 115.6 मिलियन टन (एमटी) से लगभग तीन गुना बढ़कर 2022-23 में 329.6 मिलियन टन हो गया है। ऐसा हरित क्रांति के कारण आधुनिक कृषि तकनीकों की बेहतर पहुंच की वजह से संभव हो पाया है (देशपांडे व अन्य 2023)। हालांकि, इस उत्पादन वृद्धि के कारण फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) के लिए गैर-सतत रणनीतियों को अपनाया गया, जिसमें पराली को जलाना शामिल है (खुन्द्रकपम व सरमाह 2023)। प्रतिवर्ष उत्पादित 754 मिलियन टन फसल बायोमास में से छत बनाने और पशुओं की बैठने की जगहों पर इस्तेमाल करने जैसे कामों के लिए उपयोग होने के बाद भी लगभग 228 मिलियन टन फसल अवशेष बचा रह जाता है; इसका अधिकांश हिस्सा जला दिया जाता है (सरदार स्वर्ण सिंह नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायो- एनर्जी एन.डी.)। धान-गेहूं की खेती की प्रमुखता वाले पंजाब जैसे उत्तरी राज्यों में पराली जलाने का चलन अधिक है। इस पुरानी प्रथा को जारी रखने में सहायक कारकों में धान-गेहूं का फसल तंत्र, लंबी अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्में, खेत फसल अवशेष को छोड़कर कटाई करने वाली मशीनें, मजदूरों की कमी और फसल अवशेषों के लिए व्यवहार्य बाजार का अभाव शामिल है (कुंरिंजी व प्रकाश 2021)।
बहुत अधिक मात्रा में पराली जलाने से संपर्क होने पर श्वसन तंत्र से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा तीन गुना बढ़ जाता है (चक्रवर्ती व अन्य 2019)। एटमॉस्फेयरिक मॉडलिंग अध्ययनों का आकलन है कि पराली जलाने की घटनाएं जब अपने चरम पर होती हैं, तब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में फसल कटाई के बाद के पीएम 2.5 के स्तर में पराली जलने का योगदान 30 प्रतिशत होता है (खान व अन्य 2022; कुरिंजी, खान और गांगुली 2021)। पराली जलाने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को देखते हुए पंजाब जैसे राज्यों ने कई उपाय किए हैं, जिनमें पराली प्रबंधन की अवधि को बढ़ाने के लिए कम समय पकने वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देना, सीआरएम मशीनों पर सब्सिडी देना और बायोमास के लिए बाजार तैयार करने के लिए उद्योगों को वित्तीय प्रोत्साहन उपलब्ध कराना शामिल है (पीआईबी 2023)। दो सबसे प्रमुख सीआरएम मशीनों के वर्तमान भंडार - सुपर सीडर (43,452 यूनिट) और हैप्पी सीडर (13,560 यूनिट) – को अगर अधिकतम क्षमता के साथ इस्तेमाल किया जाए तो यह पंजाब में धान के शत-प्रतिशत खेतों के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि, समय से सीआरएम मशीनें मिलने की बाधाओं और उच्च संचालन खर्च के साथ-साथ इन-सीटू सीआरएम मशीनों से बुआई किए जाने वाले गेहूं की उपज कम रहने और उनके कीट के हमलों का शिकार होने की गलत धारणाओं के कारण जीरो-बर्न अवशेष प्रबंधन की स्वीकार्यता दर कम रही है (कुरिंजी और प्रकाश 2021; प्रकाश और सिंह 2022)।
फसल अवशेषों को जलाने का चलन रोककर पंजाब में प्रतिवर्ष 12 करोड़ अमेरिकी डॉलर का आर्थिक नुकसान रोका जा सकता है (चक्रवर्ती व अन्य 2019)। इसके लिए जरूरी है कि सीआरएम उपायों को समय पर लागू करने और व्यापक रूप से अपनाने में तेजी लाई जाए। धान की पसंदीदा किस्मों और सीआरएम विधियों के बारे में विस्तृत जानकारी लेने के साथ-साथ किसानों द्वारा इनके उपयोग से संबंधित अनुभवों को जानने के लिए हमने मार्च और मई 2023 के बीच पंजाब के 11 जिलों के 1,478 किसानों के बीच सर्वेक्षण किया। चुनिंदा जिलों - अमृतसर, बठिंडा, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का, फिरोजपुर, गुरदासपुर, जालंधर, लुधियाना, पटियाला, संगरूर और एसबीएस नगर – में सामूहिक रूप से 2022 में खरीफ सीजन के दौरान आग जलाने के लगभग 58 प्रतिशत मामले दर्ज किए गए थे। इस सर्वेक्षण का उद्देश्य इन तीन मुख्य सवालों के जवाब ढूंढना था:
हमने पंजाब के किसानों की जनसंख्या को दिखाने के लिए कई चरणों में स्तरीकृत नमूना लेने की विधि का इस्तेमाल किया है। निष्कर्षों की संपूर्णता को पाने के लिए, हमने विश्लेषण के चरण में कृषि विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के कर्मचारियों के साथ साक्षात्कार किए हैं। यह सर्वेक्षण पंजाब में सीआरएम की स्थिति पर एक बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करता है और सीआरएम विधियों को लगातार लागू करने के बारे में कई अंतर्दृष्टियों को रेखांकित करता है। 2023 में धुएं से भरी एक और सर्दी की प्रतिक्रिया में नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल ने पंजाब को एक समयबद्ध कार्य योजना बनाने और 1 जनवरी से 1 सितंबर 2024 तक चरणबद्ध तरीके से निवारक उपायों को लागू करने का निर्देश दिया था। इस अध्ययन के जरिए हम केंद्र और पंजाब सरकार को उन चुनौतियों के बारे में जानकारी देना चाहते हैं, जिनका किसान जमीनी स्तर पर सामना कर रहे हैं। इसके साथ, वर्तमान और आगामी मौसमों में पराली जलाने के मामलों को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत उपायों को सामने रखना चाहते हैं।
सरकार की तरफ से प्रोत्साहित की जा रही कम अवधि की धान की किस्मों की मांग बढ़ रही है।
पराली जलाने के अधिक मामले वाले जिले अभी भी पूसा 44 उगा रहे हैं
भले ही पर्याप्त मशीनरी हो, आग जलाने समस्या का पूरी तरह से समाधान नहीं हुआ है
चित्र ईएस1: इन-सीटू सीआरएम मशीन के लगभग आधे उपयोगकर्ताओं ने मशीन का उपयोग करने से पहले सूखा भूसा जलाया था।

सीआरएम मशीनों को किराए पर लेते समय, डिजिटल उपायों की तुलना में व्यक्तिगत संबंधों को अधिक महत्व दिया जाता है
चित्र ईएस2: पंजाब ने 2022 में धान के फसल अवशेषों का प्रबंधन करने के लिए मुख्य रूप से सुपर सीडर और रोटावेटर का इस्तेमाल किया।

कीटों का हमला होने और गेहूं की पैदावार घटने से जुड़े भ्रम मौजूद हैं
इन-सीटू उपायों को अपनाने वाले लगभग 77 प्रतिशत किसानों ने अनुशंसित बदलावों को अपनाए बगैर बुवाई के परंपरागत तरीके को जारी रखा है। इनमें से 20 प्रतिशत से अधिक किसानों को गेहूं की पैदावार में गिरावट आने और कीटों के हमलों का सामना करना पड़ा और उन्होंने इन समस्याओं के लिए इन-सीटू सीआरएम मशीनों के उपयोग को जिम्मेदार ठहराया।सिंचाई, उर्वरक और चूहा नियंत्रण के तरीकों में बताए गए बदलावों को अपनाकर और इन-सीटू मशीनों का इस्तेमाल करके गेहूं की पैदावार में गिरावट और कीटों के हमलों से जुड़ी चिंताओं को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, इन-सीटू मशीनों का इस्तेमाल करने वाले किसानों में से केवल 7 प्रतिशत किसानों को ही सीआरएम मशीनों के इस्तेमाल का प्रशिक्षण मिला था।
एक्स-सीटू सीआरएम लोकप्रिय हो रहा है
अपने निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए, हम पंजाब और उसके बाहर के सभी नीति निर्माताओं को आगामी मौसमों में फसल अवशेष जलाने में कमी लाने के लिए निम्नलिखित उपायों पर ध्यान देने का सुझाव देते हैं:
धान की किस्मों में विविधता लाना
इन-सीटू सीआरएम उपाय
एक्स-सीटू सीआरएम विधियां
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
यह धान, गेहूं आदि फसलों की कटाई के बाद खेत में बचे हुए फसल के अवशेषों को प्रबंधित करने की प्रक्रिया को संदर्भित करता है, जिसमें समावेश, मल्चिंग या बेलिंग जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
किसान अक्सर अपने खेतों को साफ करने और अगले सीजन की फसलें बोने के लिए 15-20 दिनों की सीमित अवधि मिलने के कारण पराली को जलाने का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, फसल अवशेषों के लिए सीमित बाजार और फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों तक पहुंच की कमी भी किसानों को अपनी फसल के अवशेषों को जलाने का कारण देती है।
भारत फसल विविधीकरण (crop diversification) के माध्यम से फसल अवशेष का प्रभावी ढंग से प्रबंधन कर सकता है, जिसमें कम समय में तैयार होने वाली और कम भूसा पैदा करने वाली धान की किस्मों, जैसे सरकार द्वारा प्रचारित PR126, PR128, PR121 इत्यादि, की खेती करना शामिल है। सुपर सीडर (Super Seeder) आदि जैसे सीआरएम (CRM) मशीनों का उचित इस्तेमाल और उद्योगों व कंप्रेस्ड बायोगैस (compressed biogas) संयंत्रों में उपयोग करने जैसे एक्स-सीटू विकल्पों को विस्तार देने से भी बचे हुए फसल अवशेष का प्रभावी उपयोग होता है।
एक टन फसल अवशेष जलाने से 1460 किलो कार्बन डाई ऑक्साइड, 6 किलो कार्बन मोनोऑक्साइड, 3 किलो पार्टिकुलेट मैटर और 2 किलो सल्फर डाई ऑक्साइड निकलता है। वैज्ञानिक आकलन बताते हैं कि फसल अवशेषों को जलाने से भारत के PM2.5 उत्सर्जन में प्रतिवर्ष लगभग 15 प्रतिशत का योगदान होता है। दिल्ली का डिसीजन सपोर्ट सिस्टम का अनुमान है कि उत्तर-पश्चिमी राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली के PM2.5 प्रदूषण में सर्वाधिक आग जलाने की अवधि के दौरान लगभग 20-30 प्रतिशत का योगदान होता है।
फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाली मशीनें सुपर सीडर, रोटावेटर, ज़ीरो-टिल-ड्रिल और हैप्पी सीडर हैं, जो खेत में ही (इन-सीटू) फसल अवशेषों के प्रबंधन में इस्तेमाल होती हैं, वहीं बेलर, रेकर आदि खेत से बाहर (एक्स-सीटू) फसल अवशेष प्रबंधन में इस्तेमाल होती हैं।
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