
प्रस्तावित उद्धरण: जैन, अभिषेक, गुंजन झुनझुनवाला, इत्यादि। 2025। हाउ अ ग्रीन इकोनॉमी कैन डिलीवर जॉब्स, ग्रोथ एंड सस्टेनेबिलिटी इन ओडिशा। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर।
रिपोर्ट लीड्स:
अभिषेक जैन और गुंजन झुंझुनवाला
मुख्य टीम:
वासे खालिद, आदित्य मल्होत्रा और उरवा तुल वुस्का
रिसर्च टीम:
निकोल अल्मेडा, परिणीत कौर चौधरी, निखिता जगदीश, ऐश्वर्या जैन, ऐश्वर्या जोशी, अपूर्व खंडेलवाल, नीरज कुलदीप, श्रुति नांबियार, श्रुति प्रकाश, थेरेस थॉमस, आकांक्षा त्यागी
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
भारत एक महत्वपूर्ण मुहाने पर खड़ा है, जहां पर ग्रीन इकोनॉमी की जरूरत न केवल एक पर्यावरणीय अनिवार्यता है, बल्कि एक आर्थिक अवसर भी है। कम कार्बन उत्सर्जन वाली विकास रणनीति (low-carbon growth pathway) की दिशा में परिवर्तन हमारी विकास महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करता है, साथ में, यह भी सुनिश्चित करता है कि हम अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं, विशेष रूप से 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य को पाने, पर कायम रहें। एक ग्रीन इकोनॉमी जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाली प्रमुख आर्थिक चुनौतियों के लिए नवाचारयुक्त समाधानों को उपलब्ध कराती है, जो हमें अपनी विशाल क्षमता का उपयोग करने का अवसर देता है।
जैसे भारत एक ग्रीन इकोनॉमी पैराडाइम (प्रतिमान) की दिशा में आगे बढ़ रहा है, इसकी सफलता काफी हद तक क्षेत्रीय - इसके राज्यों के भीतर- कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी। यह अध्ययन ओडिशा पर केंद्रित है, जो क्लाइमेट एक्शन में एक अग्रणी राज्य बन उभरा है, और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान के लिए नवाचारयुक्त प्रयास कर रहा है।ओडिशा एक मजबूत खनन अर्थव्यवस्था के साथ जीवाश्म ईंधन संपन्न राज्य भी है। ओडिशा की ग्रीन इकोनॉमी संभावनाओं की जांच करते हुए, इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि कैसे राज्य-स्तरीय रणनीतियां आर्थिक विकास को सततशीलता लक्ष्यों के अनुरूप बना सकती हैं।
हमारे शोध संकेत देते हैं कि यदि ओडिशा सक्रिय रूप से ग्रीन वैल्यू चेन्स (green value chains) को अपनाता और बढ़ाता है, तो यह 2030 तक लगभग 10 लाख पूर्णकालिक समकक्ष (FTE) नौकरियां पैदा कर सकता है, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अनुमानित 2 लाख करोड़ रुपये (23.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का योगदान कर सकता है, और कुल 3.5 लाख करोड़ रुपये (41.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के बराबर निवेश आकर्षित कर सकता है। यह राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में उल्लेखनीय रूप से 23 प्रतिशत की वृद्धि और निवेश में 20 प्रतिशत की वृद्धि में बदल सकता है। नौकरी और आर्थिक समृद्धि का दृष्टिकोण, हरित आर्थिक परिवर्तन (green economic transition) को जनकेंद्रित और इसलिए राजनीतिक व नीतिगत रूप से प्रासंगिक बनाता है।
इस रिपोर्ट के साथ हमारा लक्ष्य ऊर्जा संक्रमण क्षेत्र को शामिल करने के लिए भारत में ग्रीन इकोनॉमी के विचार को विस्तार, लेकिन उससे आगे भी जाना, है। किसी ग्रीन इकोनॉमी में निश्चित तौर पर सर्कुलर इकोनॉमी (circular economy), प्रकृति-आधारित समाधान ( nature-based solutions) और बायो-इकोनॉमी (Bio-economy) शामिल होनी चाहिए, जिसमें कम कार्बन वाले दूसरे आर्थिक क्षेत्रों में विस्तार देने की संभावना हो। हमने इन सभी क्षेत्रों में 28 वैल्यू चेन्स को चिन्हित किया और उनमें से प्रत्येक के लिए नौकरियों, बाजार और निवेश के अवसरों के आकार का अनुमान लगाने के लिए अपनी गणनापद्धति की जानकारी दी है। यह अध्ययन ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (Green Odisha Initiative) नाम से एक कार्यान्वयन योजना पेश करता है, जो सरकार के संपूर्ण-सरकार, संपूर्ण-अर्थव्यवस्था और संपूर्ण-प्रदेश के दृष्टिकोण को अपनाएगा। यह एक बहु-विभागीय संस्थागत तंत्र, एक सामान्य परिणाम ढांचा (Common Results Framework), और ओडिशा में ग्रीन इकोनॉमी की क्षमता को सामने लाने के लिए निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को सामने रखता है।
भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है औरविश्व की सबसे बड़ी आबादी का घर है। उचित मात्रा में युवा जनसांख्यिकी के साथ, भारत को केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि नौकरियों की गहनता वाले आर्थिक विकास (Jobs-intensive economic growth) की जरूरत है। इसके साथ-साथ, भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अपनी अर्थव्यवस्था को लचीला बनाते हुए 2070 तक नेट-जीरो होने के लिए एक महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्य को प्राप्त करने की जरूरत है। भारत की आर्थिक विकास रणनीति को नौकरियों, विकास, सततशीलता और लचीलापन पर एक साथ ध्यान देने की जरूरत है। एक ग्रीन इकोनॉमी पैराडाइम (प्रतिमान) को अपनाने से भारत को इन चार रणनीतिक परिणामों को हासिल करने में मदद मिल सकती है, जो लाखों नौकरियां के लिए दरवाजे खोल सकती है, और एक कम कार्बन उत्सर्जन और लचीलापन रखने वाली अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा सकती है।
जैसे-जैसे भारत एक ग्रीन इकोनॉमी प्रतिमान को अपना रहा है, इसका वास्तविक कार्यान्वयन इसके राज्यों में होगा। राज्य स्तर पर एक ग्रीन इकोनॉमी की प्रासंगिकता को समझने के लिए, हमने ओडिशा पर ध्यान केंद्रित किया है, एक ऐसा राज्य जिसने कई सकारात्मक जलवायु कार्रवाई से जुड़ी पहलों की शुरुआत की है। ओडिशा जलवायु परिवर्तन राज्य कार्य योजना (state action plan on climate change) का मसौदा बनाने, जलवायु बजटिंग पहल को अपनाने और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को संस्थागत बनाने वाला पहला राज्य था। राज्य के पास पारिस्थितिकीय विविधता, जिसमें घने जंगलों से लेकर लंबी तटरेखा तक शामिल है, एक संपन्न औद्योगिक आधार और खनन आधारित पारंपरिक आर्थिक क्षेत्रों पर महत्वपूर्ण रूप से निर्भरता भी है। राज्य को आर्थिक विविधीकरण की भी आवश्यकता है, क्योंकि इसके वर्तमान आर्थिक क्षेत्र कम कार्बन वाले बदलाव और उभरते जलवायु प्रभावों के प्रति सुभेद्य हैं।
ओडिशा एक ग्रीन इकोनॉमी प्रतिमान को अपनाने की स्थिति में, हमने नौकरियों, बाजार और निवेश (J-M-I) के अवसरों का आकलन किया है। रिपोर्ट में यह भी व्याख्या करती है कि ओडिशा को ऐसे आर्थिक प्रतिमान को अपनाने और लागू करने के लिए क्या करना होगा।
मूल्यांकन के लिए, हमने अर्थव्यवस्था के विभिन्न उभरते हरित क्षेत्रों पर विचार किया, जिनमें ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन (Green Energy Transition - ET), सर्कुलर इकोनॉमी (CE), और बायो-इकोनॉमी और प्रकृति-आधारित समाधान (BE और NbS) शामिल हैं। इन हरित आर्थिक क्षेत्रों को निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए चयन किया गया:
इन सभी क्षेत्रों में, हमने (i) ओडिशा की भौगोलिक और प्राकृतिक संसाधन में उनकी उपयुक्तता; (ii) राज्य के अधिकारियों से मिले सुझाव; और (iii) उनकी वाणिज्यिक परिपक्वता (ओडिशा के भीतर या बाहर) के आधार पर 28 मूल्य श्रृंखलाओं (value chains) को पहचाना और चुनाव किया है। इन मूल्य श्रृंखलाओं में बैटरी निर्माण से लेकर सतत पैकेजिंग से लेकर इकोलॉजिकल मैंग्रोव रेस्ट्रोरेशन (EMR) तक शामिल है। एक विस्तृत सूची नीचे चित्र में दी गई है।
यह उल्लेखनीय है कि तीन ग्रीन इकोनॉमी सेक्टर्स (green economic sectors) और उनकी मूल्य श्रृंखलाएं (value chains) एक विस्तृत सूची नहीं हैं, आने वाले समय में कई और हरित आर्थिक अवसरों के उभरने की संभावना है। हमने ग्रीन इकोनॉमी और भारत में इसकी आर्थिक क्षमता के बारे में आम चर्चा को व्यापक बनाने के लिए इन विभिन्न मूल्य श्रृंखलाओं और क्षेत्रों का चयन किया है। वर्तमान में, इनमें से कई उभरते हुए हरित अवसर नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों, उद्योगपतियों, फाइनेंसर्स और नागरिक समाज के नेतृत्वकर्ताओं के ध्यान में नहीं है। यह अपनी तरह की पहली रिपोर्ट है, जो ग्रीन इकोनॉमी प्रतिमान से सामने आ सकने वाली संभावनाओं की कल्पना और समझ को व्यापक बनाने में मदद करेगी।
ग्रीन इकोनॉमी मूल्य श्रृंखलाएं अपनी प्रकृति में विविधतापूर्ण हैं और अक्षय ऊर्जा से आगे तक फैली हुई हैं
एक ग्रीन इकोनॉमी प्रतिमान ओडिशा में नौकरियों और आर्थिक विविधीकरण के लिए विस्तृत अवसर प्रदान कर सकता है
नौकरियों, बाजार और निवेश (J-M-I) आकलन इन मूल्य श्रृंखलाओं को विस्तार देने के लिए आधार का निर्माण करते हैं, लेकिन अगला बड़ा प्रश्र यह है कि इस क्षमता को साकार करने के लिए क्या दृष्टिकोण होना चाहिए? हम इस प्रश्न का दो मूलभूत स्तरों पर समाधान किया है: (i) प्रत्येक मूल्य श्रृंखला को लागू करने और बढ़ाने के प्रयास और (ii) आर्थिक प्रतिमान के स्तर पर सभी मूल्य श्रृंखलाओं में प्रयास।
मूल्य श्रृंखला के स्तर पर, इन मूल्य श्रृंखलाओं के समर्थन में आगे बढ़ने के लिए, हमने महत्वपूर्ण प्रश्नों की एक श्रृंखला का जवाब दिया है:
अर्थव्यवस्था के स्तर पर, ओडिशा में एक ग्रीन इकोनॉमी की अपार क्षमता को साकार करने के लिए, हम ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) नाम की एक कार्यान्वयन योजना का प्रस्ताव करते हैं। यह ग्रीन वैल्यू चेन्स को विकसित करने के लिए राज्य में संचालित अलग-थलग प्रयासों को आपस में जोड़ता और उस पर निर्माण करता है और एक राज्य-व्यापी और अर्थव्यवस्था-व्यापी सुसंगत दृष्टिकोण प्रदान करता है।
ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) राज्य सरकार की एक व्यापक पहल के रूप में कार्य करेगा, जो सीधे मुख्यमंत्री के नेतृत्व में संचालित होगी। प्लानिंग और कनर्वजेंस डिपार्टमेंट (P&CD) में इसका सचिवालय होगा, जो अंतर-विभागीय योजना और समन्वय को देखता है।
विभिन्न विभागों में संचालित योजनाओं और कार्यक्रमों में एकीकरण को सुनिश्चित करने, ग्रीन इकोनॉमी को बढ़ावा देने में उनका लाभ लेने के लिए, एक कॉमन रिसोर्स फ्रेमवर्क (Common Results Framework)3 तैयार किया जाना है। यह कदम बजटीय आवंटन और प्रयास में प्रगति की नियमित निगरानी के लिए जरूरी है। सीआरएफ विभाग-स्तरीय लक्ष्यों और उद्देश्यों को भी सामने रखेगा।
पहल के निर्माण और कार्यान्वयन की देखभाल करने के लिए, चुनिंदा विभागीय सचिवों की एक समिति का, मुख्य सचिव की अध्यक्षता में, गठन किया जाएगा।
इन संबंधित विभागों के निदेशक स्तर पर राज्य सरकार के अधिकारियों को मिलाकर, एक उपसमिति का गठन किया जाएगा, जो सचिव-स्तरीय समिति को ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव के कार्यान्वयन में विभागों के बीच सक्रिय सहयोग और समन्वय सुनिश्चित करने में सहायता करेगा।
ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) का उद्देश्य अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों और खंडों - प्राथमिक से तृतीयक, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) से लेकर बड़े उद्योगों तक, और विनिर्माण से लेकर सेवाओं तक - को मौजूदा व्यावसायिक गतिविधियों को हरित बनाकर और नई हरित गतिविधियों व मूल्य श्रृंखलाओं को बढ़ावा देकर उत्प्रेरित करना है।
एक बार संचालित होने के बाद कॉमन रिसोर्स फ्रेमवर्क (CRF) राज्य को यह आकलन करने में सक्षम बनाएगा कि प्रदेश में कितना बजट ग्रीन इकोनॉमी को आगे बढ़ाने के लिए अनुरूप है। तब सरकार समय के साथ बजट के इस हिस्से का विस्तार करने के लिए उत्तरोत्तर बढ़ते लक्ष्य तय कर सकती है।
ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) निजी क्षेत्र के निवेश को ओडिशा के हरित क्षेत्रों के लिए निर्देशित करने के लिए राज्य सरकार से सक्रिय नीतिगत संकेत को बढ़ाएगा। इसमें हरित उद्यमों (Green Enterprises) के लिए अधिक अनुकूल और सहायक नीति का वातावरण बनाना, आवश्यक होने पर उपयुक्त प्रोत्साहन देने और हरित मूल्य श्रृंखलाओं को बढ़ाने के लिए नियमों को लागू करना शामिल है। इसके अलावा, इसमें मूल्य श्रृंखलाओं के आसपास एक पारिस्थितिकी तंत्र विकास दृष्टिकोण के साथ-साथ हरित क्षेत्रों के लिए कौशल विकास जैसे क्षेत्रों के माध्यम से विभिन्न तरह के समर्थन (cross-cutting support) भी शामिल हो सकते हैं।
ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) का जमीन पर कार्यान्वयन संपूर्ण ओडिशा में होना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य के सभी भौगोलिक क्षेत्र भविष्य के लिए अधिक प्रासंगिक आर्थिक क्षेत्रों के साथ अपनी आर्थिक गतिविधियों का विकास और संरेखण शुरू कर दें।
स्थानीय संदर्भ, जैसे जैविक संसाधन और भौगोलिक लाभ, स्वाभाविक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में विकसित की जा सकने वाली हरित मूल्य श्रृंखलाओं के प्रकारों को प्रभावित करेंगे। उदाहरण के लिए, समुद्री शैवाल मूल्य श्रृंखला (Seaweed Value Chain) तटीय जिलों में, जबकि कुछ सर्कुलर इकोनॉमी मूल्य श्रृंखलाएं राज्य के अधिक शहरीकृत हिस्सों में अधिक हावी हो सकती हैं।
निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को प्रौद्योगिकी, नवाचार, निवेश, कौशल विकास, सामुदायिक जुड़ाव, स्थानीय संस्थागत क्षमता निर्माण और अन्य समान उपायों के कार्यान्वयन के माध्यम से ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (GrOI) के संबंध में सरकार के प्रयासों का पूरक होना चाहिए।
एक ग्रीन इकोनॉमी में विशाल आर्थिक और रोजगार अवसरों को सामने लाने की क्षमता है, खासकर जब हम ऊर्जा संक्रमण से आगे की कल्पना को व्यापक बनाते हैं। इनमें से कई उभरते अवसरों को आज सार्वजनिक सहायता और निजी क्षेत्र की ओर से ध्यान दिए जाने की जरूरत है, ताकि कम कार्बन और जलवायु परिवर्तन वाले भविष्य में हमारे युवाओं के लिए नौकरियां और हमारी अर्थव्यवस्था फल-फूल सके और लचीली बन सके। अब ग्रीन इकोनॉमी में निवेश नहीं करने का मतलब हो सकता है कि भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धी परिदृश्य में पीछे रह सकता है, क्योंकि आगामी वर्षों में हरित उत्पादों और सेवाओं की मांग आसमान छूने लगेंगी।
भारत में एक राज्य के स्तर पर इन अवसरों को जमीन पर उतारने के लिए, यह पहली रिपोर्ट है, जो अनुमान लगाने, विशेषता बताने और रणनीती को दिखाती है। भले ही ग्रीन इकोनॉमी का दायरा और क्षमता और अधिक हो सकती है, इसे राज्य, बाजार और नागरिक समाज के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होगी, ताकि इस अवसर को जमीन पर लाखों लोगों के लिए एक मूर्त वास्तविकता में बदला जा सके।
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
भारत के लिए ग्रीन इकोनॉमी पैराडाइम इन बातों पर केंद्रित होना चाहिए: (i) अर्थव्यवस्था में उन क्षेत्रों और वैल्यू चेन को शामिल करना, जो रोजगार की अधिकता वाली आर्थिक वृद्धि को बढ़ाए और प्राकृतिक संसाधनों को बचाएं/पुनर्जीवित करें; (ii) उन क्षेत्रों में निवेश करते हुए आर्थिक लचीलापन विकसित करना, जो कम कार्बन और जलवायु परिवर्तन वाली दुनिया में उपयुक्त हो और फल-फूल सके; (iii) सततशीलता उन्मुख क्षेत्रों, जैसे बायो-इकोनॉमी और प्रकृति-आधारित समाधान, ऊर्जा परिवर्तन के अलावा सर्कुलर इकोनॉमी को शामिल करने के लिए, अर्थव्यवस्था के 'हरितकरण' (Greening) को बढ़ाना; और (iv) सक्रियता के साथ खनन आधारित अर्थव्यवस्था से पुनर्जीवित (regenerative) अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए (भविष्य के) कर्मचारियों की क्षमता और कौशल को विकसित करना।
चिन्हित किए गए तीन हरित क्षेत्र हैं: हरित ऊर्जा परिवर्तन (Green Energy Transition - ET), सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy - CE), और बायोइकोनॉमी और प्रकृति-आधारित समाधान (Bioeconomy & Nature-based Solutions - BE और NbS)। इन्हें निम्नलिखित आधार पर चुना गया: (i) सरकार की विकसित होती नीतियां; (ii) भारत में निजी क्षेत्र की बढ़ती रुचि, जिसमें बड़े उद्योगों से लेकर स्टार्ट-अप तक शामिल हैं; (iii) ऊर्जा परिवर्तन के अलावा नौकरी सृजित करने वाले विकास के अवसरों की पहचान करने की आवश्यकता; (iv) अर्थव्यवस्था के सभी स्तरों पर आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता - सूक्ष्म उद्यमों से लेकर बड़े उद्योगों तक, और प्राथमिक से लेकर तृतीयक क्षेत्रों तक।
ऊर्जा परिवर्तन (ET) एक गैर- जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) अर्थव्यवस्था की दिशा में जाने के लिए आवश्यक तकनीकों को अपनाना है। हमने ET के भीतर 14 वैल्यू चेन्स को चिन्हित किया है, जिसमें सौर और पवन ऊर्जा जैसे अक्षय/नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy - RE) स्रोतों का उपयोग, आजीविका के लिए नवीकरणीय ऊर्जा का विकेंद्रीकृत उपयोग, और इन स्रोतों के लिए जरूरी प्रमुख घटकों का निर्माण शामिल है। इसमें डीकार्बोनाइजेशन (decarbonisation) के उद्देश्य से प्रौद्योगिकियां, उत्पाद और सेवाएं भी शामिल हैं, जैसे कि इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और ग्रीन हाइड्रोजन (GH2)। हरित ऊर्जा स्रोतों में परिवर्तन से नौकरी के प्रमुख अवसर पैदा हो सकते हैं और नए बाजार खुल सकते हैं। सर्कुलर इकोनॉमी (CE) एक ऐसी प्रणाली है, जहां कोई सामग्री कभी बर्बाद नहीं होती है और प्राकृतिक संसाधनों को पुनर्सथापित किया जाता है। इस मॉडल में उत्पादों और सामग्रियों को मरम्मत, पुन: उपयोग, नवीनीकरण, पुनर्निर्माण, पुनर्चक्रण और कंपोस्टिंग जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से संचालित किया जाता है। हमने सर्कुलर इकोनॉमी के भीतर चार प्रमुख वैल्यू चेन की पहचान की है - निर्माण और विध्वंस (Construction and Demolition - C&D) मलबा, लिथियम-आयन बैटरी (Lithium-ion Battery - LIB) वेस्ट, प्लास्टिक वेस्ट, और बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण वेस्ट (e-waste)। बायो-इकोनॉमी को आर्थिक वस्तुओं के उत्पादन के लिए जैविक संसाधनों में बदलाव लाने और उपयोग करने के एक कुशल तरीके के रूप में वर्णित किया गया है, जो एक सतत अर्थव्यवस्था को साकार करने की दिशा में राजस्व वृद्धि को बढ़ाता है। इसमें बायो-इनपुट, बायोगैस, बायो-फाइबर और बायो-पैकेजिंग सहित वैल्यू चेन्स की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है। जहां बायो-इकोनॉमी उत्पाद-आधारित उद्योग संरचना पर ध्यान केंद्रित करता है, प्रकृति आधारित समाधान प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा, पुनर्स्थापना या सतत प्रबंधन जैसे कार्यों से जुड़ा है, ताकि स्थानीय समुदायों के लिए आय और नौकरी के अवसर पैदा किए जा सकें। इसमें कृषि वानिकी (agroforestry), पारिस्थितिक मैंग्रोव बहाली (ecological mangrove restoration), समुद्री शैवाल की खेती (seaweed cultivation), सतत वन प्रबंधन (sustainable forest management) और स्थायी पर्यटन (sustainable tourism) जैसी वैल्यू चेन्स शामिल हैं। इस संयुक्त क्षेत्र के भीतर, हमने 10 वैल्यू चेन्स को चिन्हित किया है, जो ओडिशा के हरित परिवर्तन (green transition) में योगदान कर सकती हैं।
हमनें प्रत्येक हरित वैल्यू चेन के लिए 2030 तक नौकरी, बाजार और निवेश (Job, Market, and Investment - J-M-I) की संभावना का अनुमान किया है। नौकरियों के लिए, केवल पूर्णकालिक सीधी नौकरियां का आकलन हुआ है, इसके साथ अप्रत्यक्ष और प्रेरित नौकरी के अवसरों का ब्यौरा दिया गया है, लेकिन आकलन नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक वैल्यू चेन के लिए, हम प्रमुख और संबद्ध सरकारी विभागों, कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियों और शमन के संबंधित दृष्टिकोणों, बड़े पैमाने पर पारिस्थितिक जोखिमों और कार्रवाई को तेज करने के लिए सफलता की वास्तविक कहानी को चिन्हित किया है।
यह अध्ययन ग्रीन ओडिशा इनिशिएटिव (Green Odisha Initiative - GrOI) के संचालन के लिए एक सचिव-स्तरीय समिति और अधिकारियों की उप-समितियों के गठन का सुझाव देता है। प्लानिंग और कन्वर्जेंस डिपार्टमेंट (Planning and Convergence Department - P&CD) सचिवालयी सहायता प्रदान करेगा, और एक कॉमन रिजल्ट्स फ्रेमवर्क (Common Results Framework - CRF) योजनाओं में अनुरूपता लाने और प्रगति की निगरानी करने में मदद करेगा।
सीईईडब्ल्यू ने ओडिशा औद्योगिक संवर्धन एवं निवेश निगम लिमिटेड ( Industrial Promotion and Investment Corporation of Odisha Limited) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। आईपीआईसीओएल, राज्य में सभी औद्योगिक निवेशों के लिए एकल संपर्क बिंदु है और ओडिशा के लिए निवेश प्रोत्साहन, सुविधा और देखभाल संबंधी रणनीति तैयार करता है। इस समझौता ज्ञापन के अनुसार, सीईईडब्ल्यू सरकार के लिए नॉलेज पार्टनर के रूप में कार्य करेगा और एक प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट के माध्यम से सहयोग करेगा।
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