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REPORT
ए फीजिबिलिटी स्टडी ऑफ इलेक्ट्रिक बायसिकल्स
केस ऑफ मनिक्कल ग्राम पंचायत, केरल
07 February, 2024 | Sustainable Mobility
नीलांशु घोष, अनन्या झा, हिमानी जैन, अमित सूद, रितु सिंह, चेतना गोगना, सूरज कांत, अक्षिता अरोड़ा, नारायणकुमार श्रीकुमार, प्रियदर्शिनी आलोक

प्रस्तावित उद्धरण: घोष व अन्य 2024। ए फीजिबिलिटी स्टडी ऑफ इलेक्ट्रिक बायसिकल्स: केस ऑफ मनिक्कल ग्राम पंचायत, केरल। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर; कॉनवर्जेंस एनर्जी सर्विसेज लिमिटेड एंड एनर्जी मैनेजमेंट सेंटर, इंडिया।

डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।

अवलोकन

माइक्रोमोबिलिटी प्रौद्योगिकियां, जिसमें मुख्य रूप से ई-साइकिल और कम रफ्तार वाली ई-मोपेड शामिल हैं, संपूर्ण वैश्विक दक्षिण (Global South) में फैल रही हैं। निम्न संचालन लागत, उपयोग और चार्जिंग/स्वैपिंग में आसानी, इन तकनीकों की स्वीकार्यता को बढ़ाने वाले प्राथमिक कारक हैं। आंतरिक दहन इंजनों (internal combustion engines) और मोटर युक्त दोपहिया वाहनों की तुलना में ई-साइकिल और ई-मोपेड एक ऊर्जा-कुशल विकल्प हैं। सीमित सार्वजनिक परिवहन सेवा और महंगे साझा परिवहन माइक्रोमोबिलिटी प्रोद्योगिकियों को ग्रामीण क्षेत्रों में एक आकर्षक विकल्प बनाते हैं।

इस अध्ययन में आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़ी महिलाओं के बीच ई-साइकिल के प्रदर्शन के बाद किए गए एक विस्तृत सर्वेक्षण दिया गया है। इस अध्ययन का उद्देश्य आवागमन के वर्तमान उपायों के विकल्प के रूप में ई-साइकिल की क्षमता का आकलन करना है।

प्रमुख बिंदु

चिन्हित किए गए लाभार्थियों में आशा कार्यकर्ता और हरित कर्मा सेना के सदस्यों ने ई-साइकिल लेने में सबसे ज्यादा रुचि दिखाई। यह रुचि कुछ लोगों के पारंपरिक साइकिल चलाने के सीमित अनुभव के बावजूद आई है।

70–75 प्रतिशत लाभार्थियों का मानना था कि ई-साइकिल थकान घटाएगी और काम की दक्षता बढ़ेगी, जिससे वे अधिक मजदूरी मिल सकेगी। आर्थिक व्यवहार्यता का अनुमान लगाने के लिए, कुल स्वामित्व लागत (टीसीओ) की गणना बताती है कि ई-साइकिल और कम गति वाली ई-मोपेड, आंतरिक दहन इंजन (आईसीई) वाहनों और इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की तुलना में लगभग 56-70 प्रतिशत सस्ती पड़ती हैं। इस अध्ययन में शामिल लक्षित समूहों के उत्तरदाता सालाना लगभग 23,000 रुपये से लेकर 40,000 रुपये तक अपनी आवागमन पर खर्च करते हैं। ई-साइकिल और कम रफ्तार वाली ई-मोपेड जैसे वैकल्पिक साधनों को अपनाने पर ईंधन की कम लागत के कारण यह खर्च घटकर प्रति वर्ष लगभग 6,500 रुपये तक हो सकता है। लक्ष्य समूहों की ई-साइकिल और कम गति वाली ई-मोपेड खरीदने की अनुमानित मासिक भुगतान क्षमता 2-3 साल की अवधि में लगभग 500 रुपये है। हालांकि, ईंधन की कम लागत के कारण होने वाली बचत लगभग 900 रुपये से 2,300 रुपये प्रति माह होगी, जो उनकी भुगतान क्षमता को 500 रुपये की जगह पर बढ़ाकर 1000 - 1500 रुपये कर सकता है


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सीनियर प्रोग्राम लीड
"ग्रामीण क्षेत्रों में माइक्रो-मोबिलिटी ऊर्जा-कुशल और किफायती परिवहन का विकल्प खोलती है, जिससे आवागमन के परंपरागत रुझानों में क्रांतिकारी बदलाव आते हैं और आजीविका में सुधार होता है। भले ही हमारा विश्लेषण संकेत देता है कि इन तकनीकों की कुल स्वामित्व लागत (टीसीओ) किफायती है, लेकिन शुरुआती ऊंची लागत एक बाधा बनी हुई है। सरकारी प्रोत्साहन उपरोक्त बाधा को घटाने और मांग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इस बढ़ी हुई मांग आगे नई नवाचारों, तकनीकी प्रगति और अधिक वस्तुओं के अधिक उत्पादन से लागत में गिरावट (economies of scale) को बढ़ाएगी, जिससे लंबे समय में इनकी लागत घटेगी।"

कार्यकारी सारांश

विभिन्न क्षेत्रों, खासकर ग्रामीण इलाकों में, सार्वजनिक परिवहन की उपलब्धता सीमित है, जिससे आवागमन के लिए मोटरयुक्त निजी वाहनों का इस्तेमाल बढ़ा रहा है। जैसे-जैसे आर्थिक स्थिति बेहतर होती है, निजी वाहनों को खरीदने की आकांक्षा बढ़ती जाती है, जो ईंधन की खपत और उत्सर्जन बढ़ाती है। इसलिए, स्वच्छ विकल्पों के माध्यम से आर्थिक विकास को उत्सर्जन से अलग करना बहुत जरूरी हो गया है।

मार्च और जून 2023 के बीच, कॉन्वर्जेंस एनर्जी सर्विसेज लिमिटेड (सीईएसएल) की टीम ने छत्तीसगढ़ के रायपुर और आसपास के जिलों, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, बिहार के नालंदा और केरल के तिरुवनंतपुरम जिलों में फील्ड विजिट की थी। इसका उद्देश्य छोटी दूरी (5-10 किमी) तय करने वाले लोगों द्वारा इलेक्ट्रिक साइकिल जैसी तकनीकों को अपनाने की संभावना का आकलन करना था। टीम ने आवागमन के अधिक सुविधाजनक उपायों का लाभ उठा सकने में सक्षम लक्षित लाभार्थियोंलक्षित लाभार्थियों की पहचान करने के लिए वर्तमान यात्रा अवधियों, ऑन-डिमांड यात्राओं की आवृत्ति और परिवहन खर्च का अध्ययन किया था। शुरुआती फील्ड विजिट ने संकेत दिया कि ई-साइकिलें आवागमन का व्यवहार्य तरीका हैं, जो लोगों की अपनी निजी गाड़ी रखने की चाहत को पूरा करती हैं, साथ में शून्य उत्सर्जन भी सुनिश्चित करती हैं।

शुरुआती चर्चाओं में महिला सरकारी कर्मचारियों, खास तौर पर आंगनवाड़ी, आशा कार्यकर्ताओं और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) से जुड़ी महिलाओं को कामकाजी यात्राओं के लिए ई-साइकिल के संभावित उपयोगकर्ता के रूप में देखा गया। बाद में, सीईएसएल और काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) ने केरल के एनर्जी मैनेजमेंट सेंटर (ईएमसी) के साथ मिलकर एक व्यापक सर्वेक्षण और प्रदर्शन किया, ताकि मनिक्कल ग्राम पंचायत, जो केरल की नेट-जीरो पंचायतों में से एक है, में चिन्हित लाभार्थियों के मौजूदा यात्रा प्रवृत्ति के संभावित विकल्प के रूप में ई-साइकिल की व्यवहार्यता का आकलन किया जा सके।

जुलाई 2023 में पंचायत कार्यालय में ई-साइकिल के तीन अलग-अलग मॉडल उपलब्ध कराए गए। मनिक्कल ग्राम पंचायत में आयोजित ई-साइकिल प्रदर्शन (demonstration) को काफी उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिली, और चिन्हित लक्षित समूहों ने परीक्षण के तौर पर इन्हें चलाने के बाद विस्तार से अपने अनुभव साझा किए। अधिकांश लाभार्थियों (70-75 प्रतिशत) का मानना था कि ई-साइकिल से थकान को घटाएगी, और कार्यकुशलता सुधारेगी, जिससे अधिक मजदूरी मिल सकेगी।

सर्वेक्षण और प्रदर्शन से सामने आए प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:

  • लक्षित लाभार्थी प्रतिदिन औसतन 5 से 15 किलोमीटर (किमी) की यात्रा करते हैं, जिनमें आशा कार्यकर्ता सबसे अधिक दूरी (लगभग 17 किमी) तय करती हैं। लक्षित लाभार्थियों की मासिक आय 6000 रुपये से लेकर 12,000 रुपये के बीच है, जिनमें आंगनवाड़ी शिक्षिकाओं की आय सबसे अधिक (12,000 रुपये) है। चिन्हित लाभार्थियों में, आशा कार्यकर्ता और हरित कर्मा सेना के सदस्यों की ई-साइकिल को खरीदने में सर्वाधिक रुचि दिखी है। पारंपरिक साइकिल को चलाने के सीमित अनुभव के बावजूद यह दिलचस्पी देखने को मिली है।
  • आंतरिक दहन इंजन (आईसीई) वाले दोपहिया वाहनों, इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों, ई-साइकिल और कम रफ्तार वाली ई-मोपेड के बीच आर्थिक व्यवहार्यता (economic viability) का आकलन करने के लिए कुल स्वामित्व लागत (टीसीओ) का विस्तृत विश्लेषण किया गया। यह देखा गया कि ई-साइकिल और कम गति वाली ई-मोपेड, अपने आईसीई और ईवी समकक्ष वाहनों की तुलना में 56-70 प्रतिशत तक किफायती हैं। ई-साइकिल और धीमी गति वाली ई-मोपेड की संचालन लागत काफी कम होने के बावजूद, इनकी शुरुआती कीमत (upfront cost) (₹25,000 – ₹50,000) लक्षित समूहों के सामने एक बड़ी अड़चन है, जो इसे अपनाने में बाधा बन रहा है।

चित्र 1 विभिन्न तकनीकों के कुल स्वामित्व लागत (टीसीओ) की तुलना


स्रोत: लेखकों का विश्लेषण

उनकी आकांक्षाओं, पुनर्भुगतान करने की क्षमता और विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर नीचे दिए गए ई-साइकिल के मॉडल को अपनाने का सुझाव दिया गया है:

  • हरित कर्मा सेना और कुटुम्बश्री सदस्यों के लिए कार्गो ई-साइकिल सर्वाधिक उपयुक्त है। इससे केरल में लगभग 35,560 ई-साइकिलों की संभावित संचयी मांग हो सकती है।
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और आशा कार्यकर्ताओं के लिए कम रफ्तार वाली ई-मोपेड सर्वाधिक उपयुक्त है। इससे केरल में 41,000 ई-मोपेड की संभावित संचयी मांग हो सकती है।
  • देश भर के विभिन्न सरकारी संस्थानों में लक्षित लाभार्थियों की मौजूदगी और उनकी मासिक आय व परिचालन विशिष्टताओं में समानता को देखते हुए, आशा कार्यकर्ताओं के बीच लगभग 9.4 लाख ई-साइकिल, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच 7.4 लाख ई-साइकिल और स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के सदस्यों के बीच 5-6 करोड़ ई-साइकिल की एक अच्छी संभावित मांग है।

भारत में ई-साइकिल का उपयोग बढ़ाने के लिए निम्नलिखित सुझावों को लागू किया जा सकता है:

वित्तीय प्रोत्साहन और एकत्रीकरण (aggregation) व्यवहार्यता को बढ़ा सकते हैं: बड़े पैमाने पर ई-साइकिल का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय और प्रादेशिक सरकारों की तरफ से दो चरणों में लक्षित प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं:

  • पारिस्थितिक तंत्र सक्षमकर्ता (Ecosystem enabler): सरकार से समर्पित वित्तीय प्रोत्साहन, ई-साइकिल और कम रफ्तार वाली ई-मोपेड की शुरुआती ऊंची लागत को घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। वित्तीय प्रोत्साहनों के साथ जागरूकता अभियान और शैक्षणिक कार्यक्रम, जनता को इन तकनीकों के लाभों (जैसे उत्सर्जन में कटौती, ईंधन खर्च की बचत, न्यूनतम रख-रखाव, और स्वच्छ पर्यावरण में उनका योगदान) की जानकारी देंगे। दृश्यता (visbility) में यह वृद्धि एक सर्वव्यापी प्रभाव (ripple effect) पैदा करती है, जिससे अन्य लोग भी आवागमन के अपने मौजूदा साधनों के विकल्प के तौर पर इन किफायती और स्वच्छ उपायों के बारे में सोचने और इन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।
  • बड़े पैमाने पर उपयोग (Large scale adoption): ब्याज-मुक्त ऋण वित्तीय लचीलापन प्रदान करते हैं, जिससे उपभोक्ता ई-साइकिल या कम रफ्तार वाली ई-मोपेड में निवेश कर सकते हैं। सरकार की मदद से ब्याज मुक्त ऋण शुरूआती बाधाओं को घटा देते हैं, जिससे इनके व्यापक उपयोग को प्रोत्साहन मिलता है। ये वित्तीय प्रोत्साहन, उपभोक्ता लाभों को बढ़ाते हुए, ऐसी तकनीकों की मांग में उछाल लाते हैं। यह बढ़ी हुई मांग नवाचारों के लिए उत्प्रेरक का काम करती है, जो तकनीकी उन्नति को बढ़ाते हैं, और बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत में गिरावट को बढ़ाते हैं। प्रोत्साहनों के कारण बढ़ी हुई स्वीकार्यता के परिणामस्वरूप, ई-साइकिल और कम गति वाली ई-मोपेड के लिेए बाजार का विस्तार इनकी व्यवहार्यता को सशक्त बनाएगा और उन्हें भविष्य के एक सतत परिवहन विकल्प के रूप में स्थापित करेगा।
  • लागत को सीमित रखते हुए मौजूदा ई-साइकिलों की डिजाइन में उपयोगकर्ता की जरूरत के अनुरूप सुधार करना चाहिए, ताकि उनकी आवश्यकताएं पूरी की जा सकें (चित्र 2 देखें)। व्यस्थिति रूप से आंकड़ों का संग्रह (Systemic data collection) ई-साइकिल और कम रफ्तार वाली ई-मोपेड के उपयोग और उपयोगकर्ताओं की आजीविका पर उनके प्रभाव के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे इन्हें अपनाने की प्रक्रिया में तेजी आती है। लोगों के बीच ई-साइकिल को दिखाने से आवागमन के रुझानों, उपयोग की आवृत्ति, यात्रा-मार्गों और उपयोगकर्ता के सुझावों के साथ परिचालन के वास्तविक समय के आंकड़े मिलते हैं। इस आंकड़ों का विश्लेषण बुनियादी ढांचे, प्रोत्साहन और नीतियों से जुड़े निर्णयों के लिए सूचना देते हैं और इन्हें मौजूदा प्रणालियों में समायोजन को बेहतर बनाते हैं। आंकड़ों से निर्देशित इस  दृष्टिकोण से उनके संभावित सकारात्मक प्रभाव का सत्यापन करता है, उनके व्यापक इस्तेमाल लाने में मदद करने के लिए ज्यादा प्रभावी पहलों को सक्षम बनाता है।
  • संस्थागत संरचना को मजबूत करने से कोष के वितरण, खासकर ब्याज मुक्त ऋणों के लिए, के लिए सुचारू और पारदर्शी प्रक्रियाएं सुनिश्चित करता है। यह उन्नत ढांचा वित्तीय प्रोत्साहनों का कुशल आवंटन सुनिश्चित करने के साथ जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करता है। बेहतर माध्यमों से, स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में अधिक से अधिक महिलाओं को ई-साइकिल को अपनाने के लिए वित्तीय सहायता मिलती है, जिससे सतत परिवहन के लाभ ज्यादा व्यापक और समावेशी जनसांख्यिकी (inclusive demographic) तक पहुंचते हैं। इन महिलाओं का सशक्तिकरण न केवल उनके आवागमन को बेहतर बनाता है, बल्कि उनके समुदायों के बीच आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण को भी प्रोत्साहित करता है।

चित्र 2 ई-साइकिल के प्रदर्शन के बाद लाभार्थियों द्वारा मांगी गई अतिरिक्त सुविधाएं


स्रोत: लेखकों के विश्लेषण

गांवों और छोटे कस्बों में सामाजिक आकांक्षाओं को पूरा करते हुए ई-साइकिलें व्यक्तिगत आवागमन की चुनौतियों को दूर करने के लिए एक आदर्श समाधान के रूप में उभरी हैं। यह ऊर्जा दक्षता और शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों को बढ़ावा देने के साथ भारत के नेट-जीरो 2070 लक्ष्य में भी योगदान देता है। इसके अलावा, ई-माइक्रोमोबिलिटी प्रौद्योगिकियां समय बचाती हैं, आवागमन की चुनौतियों का समाधान करती है, आजीविका की संभावनाएं बढ़ाती हैं, और महिलाओं को अधिक आत्मनिर्भर बनाते हुए एक समावेशी परिवर्तन प्रोत्साहित करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Frequently Asked Questions

  • ई-साइकिल की संकल्पना क्या है? क्या भारत में इलेक्ट्रिक साइकिल खरीदना उपयुक्त है?

    ई-साइकिलें ऐसी साइकिलें होती हैं, जिनमें एक सहायक पॉवर यूनिट लगी होती है, जो पैडल चलाने में मदद करती है या पूरी तरह से थ्रॉटल-कंट्रोलिंग प्रोपेलिंग फोर्स (propelling) उपलब्ध कराती है। हमारा विश्लेषण संकेत देता है कि ई-साइकिल और कम गति वाली ई-मोपेड अपने आईसीई और ईवी समकक्ष वाहनों की तुलना में लगभग 56-70 प्रतिशत किफायती हैं। इसलिए, ये भारतीय बाजार में अन्य मोटर चालित दोपहिया वाहनों की तुलना में एक किफायती समाधान हो सकती हैं।

  • ई-बाइक/ई-साइकिल पर्यावरण को कैसे प्रभावित करते हैं?

    ई-साइकिल 5-10 किलोमीटर की दूरी के लिए एक फायदेमंद और मोटर चालित आंतरिक दहन इंजन (ICE) दोपहिया वाहनों का एक अच्छा विकल्प हो सकती हैं। इस प्रकार से, ई-साइकिल दोपहिया वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को घटा सकती हैं, जो वर्तमान में भारतीय सड़कों पर कुल मोटर चालित वाहनों का सबसे बड़ा हिस्सा है।

  • ई-साइकिलों के सामाजिक प्रभाव क्या हैं?

    अपने सर्वेक्षण से हम पाते हैं कि अधिकांश लाभार्थी (70-75 प्रतिशत) मानते हैं कि इ-साइकिल थकान को घटाएगी और कार्य कुशलता में सुधार लाएगी, जिससे उन्हें अधिक आय मिल सकेगी। हमारा विश्लेषण यह भी संकेत देता है कि ई-साइकिल को अपनाने से सालाना लगभग 70-80 प्रतिशत की बचत होती है। यह लाभार्थियों की खर्च करने योग्य आय को बढ़ा सकती है, जो बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा की सुविधा और बेहतर पारिवारिक व सामाजिक सहायता बढ़ाता है।

  • ई-साइकिल क्यों ग्रामीण इलाकों के लिए एक आकर्षक विकल्प है?

    भारत के कई ग्रामीण इलाकों में, कम और बिखरी हुई मांग के कारण सार्वजनिक परिवहन और साझा किए जाने वाले वाहन अव्यवहार्य (unviable) हैं, जिससे लोगों को आवागमन के लिए पेट्रोल से चलने वाले निजी दोपहिया वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता है। कुल स्वामित्व लागत (TCO) बताती है कि ई-साइकिल और कम गति वाले ई-मोपेड पेट्रोल से चलने वाले दोपहिया वाहनों की तुलना में लगभग 70% सस्ते हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से फायदेमंद हैं।

  • ई-साइकिलों का भविष्य में क्या रुझान रहने वाला है?

    हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी संस्थानों में ई-साइकिलों के लिए संभावना है। केवल केरल में ही आंगनवाड़ी, आशा और एसएचजी कार्यकर्ताओं के बीच लगभग 77,000 ई-साइकिलों की मांग है।

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