
प्रस्तावित उद्धरण: एमएनआरई और सीईईडब्ल्यू. 2024. इनेबलिंग अ सर्कुलर इकोनॉमी इन इंडियाज सोलर इंडस्ट्री : असेसिंग द सोलर वेस्ट क्वांटम। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर।
सोलर फोटोवोल्टिक (पीवी) उद्योग में रेखीय दृष्टिकोण की जगह पर चक्रीय दृष्टिकोण का आना न केवल प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी कार्यप्रणालियां तैयार करेगा, बल्कि भारत को एक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र अर्थव्यवस्था की तरफ भी ले जाएगा। इस लक्ष्य की दिशा में पहला कदम देश में सोलर फोटोवोल्टिक वेस्ट (सौर फोटोवोल्टिक अपशिष्ट) की मात्रा का आकलन है। यह अध्ययन मौजूदा और भविष्य की स्थापनाओं से निकलने वाले सोलर फोटोवोल्टिक वेस्ट का आकलन करने के लिए एक नए गुणांक-आधारित अपशिष्ट अनुमान मॉडल (coefficient-based waste estimation model) उपलब्ध कराता है। यह देश भर में प्रमुख अपशिष्ट उत्पादक क्षेत्रों और अपशिष्ट पीवी मॉड्यूल से निकाले जाने वाले खनिजों के उच्च आर्थिक मूल्य को भी चिन्हित करता है। सोलर फोटोवोल्टिक वेस्ट मैनेजमेंट प्रक्रिया, जिसमें इसका संग्रहण, परिवहन और रीसाइकिलिंग (recycling) शामिल है, रोजगार के अवसर भी पैदा कर सकती है। इसलिए, संसाधन प्रबंधन और सामाजिक-आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोणों से सौर अपशिष्ट प्रबंधन (solar waste management) महत्वपूर्ण है।
भारत को 2030 तक लगभग 292 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता की आवश्यकता है (सीईए 2023)। सोलर फोटोवोल्टिक (पीवी) प्रौद्योगिकियों को तेजी से स्थापित किए जाने के साथ सौर अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं। पर्यावरणीय, आर्थिक और सामाजिक कारणों से एक जिम्मेदारीपूर्ण सोलर फोटोवोल्टिक वेस्ट प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है (त्यागी और कुलदीप, 2021)। प्रयोग से बाहर होने वाले सोलर मॉड्यूल में सिलिकॉन, तांबा, टेल्यूरियम और कैडमियम जैसे खनिज मौजूद होते हैं, जिन्हें खनन मंत्रालय द्वारा भारत के लिए महत्वपूर्ण खनिजों के रूप में वर्गीकृत किया गया है (एमओएम 2023)। इन खनिजों को दोबारा प्राप्त करने के लिए सौर अपशिष्ट की रिसाइकिलिंग करने से आयात पर निर्भरता कम होगी और भारत की खनिज सुरक्षा भी बढ़ेगी। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (प्रबंधन) नियमों में संशोधन करके सोलर सेल और मॉड्यूल को अपने दायरे में शामिल कर लिया है (एमओईएफसीसी 2022)। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने भी सोलर पीवी रीसाइकिलिंग को अक्षय ऊर्जा अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास (आरई-आरटीडी) कार्यक्रम (पीआईबी 2023ए) के तहत प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में से एक क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया है।
सौर अपशिष्ट का सूक्ष्मता के साथ किया गया आकलन नीति निर्माताओं और संबंधित उद्योग की कंपनियों को आवश्यक नियमों व बुनियादी ढांचे की स्थापना के लिए सूचित निर्णय (informed decisions) लेने में सहायता करेगा। जैसा कि कुछ अध्ययन भारत के सौर अपशिष्ट (आईआरईएनए और आईईए-पीवीपीएस 2016, सुरेश, सिंघवी और रुस्तगी 2019) का अनुमान उपलब्ध कराते हैं, लेकिन वे मॉड्यूल की जीवन-अवधि पूरी (ईओएल) होने पर अपशिष्ट का पता लगाने के लिए वैश्विक डेटाबेस पर भरोसा करते हैं। भारतीय जलवायु से संबंधित परिस्थितियों में मॉड्यूल की अपक्षरण दरों (module degradation rates) और प्रतिस्थापन रुझानों (replacement trends) का पता लगाने वाला विस्तृत अध्ययन महत्वपूर्ण है।
यह अध्ययन एक व्यापक अपशिष्ट अनुमान मॉडल को विकसित करते हुए भारत विशेष के लिए सौर अपशिष्ट अनुमानों में मौजूद अंतर को दूर करता है, जो सौर अपशिष्ट के बारे में समय और स्थानिक वितरण (temporal and spatial distribution) की जानकारियां उपलब्ध कराता है। यह मॉड्यूल की क्षरण दर (degradation rate) और अन्य उपलब्ध गणना के तरीकों में बदलाव करके विभिन्न परिदृश्यों में तुलनात्मक विश्लेषण भी करता है।
चित्र ईएस 1 2030 में संचयी अपशिष्ट का 67 प्रतिशत पांच राज्यों से उत्पन्न होने की उम्मीद
स्रोत: लेखकों का विश्लेषण
चित्र ईएस 2 भारत का संचयी सौर अपशिष्ट 2030 और 2050 के बीच 32 गुना बढ़ जाएगा
सोलर वेस्ट (Solar Waste) का अर्थ प्रयोग से बाहर हो चुके सोलर पैनल और सेल व मॉड्यूल के निर्माण के दौरान निकलने वाला कचरा है। सोलर पैनल अपनी जीवन अवधि पूरी करने या ट्रांसपोर्टेशन, हैंडलिंग व इंस्टॉलेशन के दौरान हुए नुकसान के कारण प्रयोग से बाहर हो सकते हैं। भारत में सोलर वेस्ट को इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2022 के तहत उपयुक्त तरीके से परिष्कृत (ट्रीट) किया जाना चाहिए। सोलर वेस्ट को गलत तरीके से रखरखाव करने (हैंडल करने) और लैंडफिल में डालने से बचना चाहिए, ताकि इसमें मौजूद कीमती खनिजों को निकाला जा सके और पर्यावरण को लेड व कैडमियम जैसे जहरीले पदार्थों के रिसाव से बचाया जा सके।
हां। कांच, एल्यूमीनियम, तांबा, सिलिकॉन और चांदी जैसी सामग्री को निकालने के लिए सौर अपशिष्ट की रीसाइकिलिंग की जा सकती है। रीसाइकिलिंग को मोटे तौर पर मकैनिकल, थर्मल और कैमिकल प्रक्रियाओं में वर्गीकृत किया जा सकता है। प्रत्येक प्रक्रिया अलग-अलग शुद्धता ग्रेड के विशेष खनिजों को दोबारा पाने में मदद करती है।
इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2022 के तहत सोलर पीवी मॉड्यूल, पैनल्स और सेल से निकलने वाले कचरे का प्रबंधन किया जाता है। यह नियम सौर पीवी मॉड्यूल और सेल बनाने वाली कंपनियों के लिए 2034-2035 तक सौर पीवी मॉड्यूल और सेल से निकलने वाले कचरे का सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के नियमों के आधार पर भंडार को अनिवार्य बनाता है। यह नियम 2034-2035 तक ई-वेस्ट मैनेजमेंट पोर्टल पर वार्षिक रिटर्न दाखिल करने को भी आवश्यक बनाता है। सोलर पीवी मॉड्यूल और सेल के प्रत्येक रिसाइकलर्स के लिए सीपीसीबी की ओर से निर्धारित नियमों के अनुसार सामग्री की रिकवरी करना अनिवार्य होगा।
सौर कचरे के कुशल प्रबंधन के लिए एक व्यापक नियामकीय रूपरेखा की आवश्यकता होती है, जो संग्रह, पुनर्चक्रण/पुन: उपयोग और सामग्री-विशिष्ट पुनर्प्राप्ति लक्ष्यों का मार्गदर्शन करे। इसमें निकाली जाने वाली सामग्रियों के लिए बाजार संपर्क और सौर कचरा प्रबंधन को सुविधाजनक बनाने के लिए बाजार तंत्र को प्रोत्साहित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। साथ ही, रिसाइकिलिंग टेक्नोलॉजी के शोध एवं विकास में घरेलू प्रयासों को तेज करने की भी आवश्यकता है। ऐसे अनुसंधान और प्रायोगिक प्रदर्शनों को बढ़ावा देने के लिए वित्त पोषण (Funding) के विकल्प बनाने की जरूरत है।
सौर अपशिष्ट एक विस्तृत आकलन कई व्यावसायिक और नीतिगत निर्णयों का मार्गदर्शन करेगा। इसमें अपशिष्ट प्रबंधन ढांचा (जैसे भंडारण एवं रीसाइकिलिंग केन्द्रों की संख्या व स्थान), उत्पादकों एवं रीसाइकिलर्स के लिए संग्रह व रीसाइकिलिंग संबंधी लक्ष्य निर्धारण और अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बिजनेस मॉडल शामिल हैं।
Building a People-centric Energy Future:
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How Big is the Solar Module Recycling Industry in India?