
प्रस्तावित उद्धरण: माल्यान अंकुर, और वैभव चतुर्वेदी। 2021. कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन, एंड स्टोरेज टेक्नोलॉजी (सीसीयूए) इन इंडिया: फ्रॉम ए कमेयो टू सपोर्टिंग रोल इन द नेशंस लो-कार्बन स्टोरी. नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर.
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
यह इश्यू ब्रीफ पूरे विश्व में नेट-जीरो पर बढ़ती बहस के बीच भारत में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) तकनीक की तेज होती रफ्तार को रेखांकित करता है। सीसीयूएस, दो दशकों से अधिक समय से चर्चा का विषय रहा है, लेकिन सीमित शोध, वित्त और नीतिगत समर्थन के कारण कोई खास ध्यान नहीं खींच पाया है। यह ब्रीफ सीसीयूएस तकनीक पर बदलते रूझान को रेखांकित करने के लिए भारत सरकार के प्रासंगिक दस्तावेजों, प्रमुख वैश्विक शोधों और भारतीय उद्योगों की घोषणाओं का आकलन पेश करता है। हालांकि, सीसीयूएस अभी जलवायु बहस में मुख्यधारा से बहुत दूर है, लेकिन इस अध्ययन का उद्देश्य भारत में सीसीयूएस को मिली रही रफ्तार को आगे जारी रखने के लिए भविष्य की रूपरेखा पेश करना है।
बीते दो दशकों से अधिक समय से जलवायु परिवर्तन के शमन में कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (सीसीयूएस)1 की भूमिका चर्चा का विषय बनी हुई है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की 1.5 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग पर विशेष रिपोर्ट और नेट-जीरो पर विभिन्न देशों की हालिया घोषणाओं ने, नेट-जीरो दुनिया में ऑफसेट्स की संभावित भूमिका को देखते हुए, इस तकनीक के समर्थकों को उत्साहित किया है। भारत में, सीसीएस तकनीक को लेकर हितधारकों के बीच काफी संशय की स्थिति है, क्योंकि पिछले दो दशकों में इस प्रौद्योगिकी के उपयोग में नगण्य प्रगति हुई है, यह शमन कार्यों को टालने के लिए विकृत प्रोत्साहन (perverse incentive) पेश करता है, और यदि प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल होता है तो यह विद्युत उत्पादन लागत में संभावित वृद्धि करता है। इसके विपरीत, सीसीएस जीवाश्म-ऊर्जा पर निर्भर व्यवसायों में निवेशकों और कंपनियों को जीवनदान देता है, और उन्हें निम्न कार्बन भविष्य (low carbon future) को पाने के लिए आवश्यक उथल-पुथल से भी सुरक्षा दे सकता है।
इस इश्यू ब्रीफ में, हम सीसीएस टेक्नोलॉजी पर बदलते दृष्टिकोण को रेखांकित करने के लिए भारत सरकार के प्रासंगिक दस्तावेजों, महत्वपूर्ण वैश्विक तथ्यों और भारतीय उद्योगों की घोषणाओं का आकलन प्रस्तुत कर रहे हैं। हालांकि, सीसीएस मुख्यधारा की टेक्नोलॉजी बनने से अभी काफी दूर है, लेकिन हमारा आकलन भारत में सरकारी और निजी दोनों ही क्षेत्रों में इस तकनीक को अपनाने के प्रति एक उभरती हुई रुचि को दर्शाता है। वे अब इस प्रौद्योगिकी के तकनीकी और वित्तीय पहलुओं को समझना चाहते हैं। भविष्य में यह कैसे काम करेगा, यह तो अनिश्चित है, लेकिन स्पष्ट तौर पर इतना कहा जा सकता है कि भारत में इस टेक्नोलॉजी से संबंधित बहस में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है।
जीवाश्म-ईंधन-आधारित बिजली संयंत्रों को बंद और औद्योगिक प्रक्रियाओं के विद्युतीकरण करके ही कार्बन तटस्थता (carbon neutrality) के लक्ष्य को पाना संभव हो सकेगा (आईईए, 2020; फ्रीडमैन और अन्य, 2020)। हालांकि, पूर्ण रूप से अक्षय ऊर्जा आधारित बिजली प्रणाली या विद्युतीकृत औद्योगिक प्रक्रियाओं की दिशा में परिवर्तन की एक सीमा (threshold) है, जो अक्षय ऊर्जा और विद्युतीकरण दोनों ही क्षेत्र में मौजूदा तकनीकी प्रगति से बंधी हुई है (बुहलर, मुलर होल्म, और एल्मेगार्ड 2019; डेसन और अन्य 2018)। इस संदर्भ में, कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज की भूमिका पर बहस चल रही है, फिर भी इसे सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है (आईईए, 2021; फ्रीडमैन और अन्य, 2020; आईईए, 2018)। नीचे दिया गया चित्र 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम वैश्विक तापमान वृद्धि के परिदृश्य में दो अलग-अलग विकल्पों में संचयी कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन (cumulative CO2 emissions) की जानकारी देता है। जैसा कि बताया गया है, जीवाश्म ईंधन के उपयोग के साथ सीसीएस में 2018 और 2100 के बीच जीवाश्म ईंधन की खपत से होने वाले उत्सर्जन को घटाने की अपार क्षमता मौजूद है।
चित्र 1: 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान वृद्धि पर संचयी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन

स्रोत: आईपीसीसी.2018
भारत ने अपनी दीर्घकालिक जलवायु रणनीति में सीसीयूएस के इस्तेमाल के बारे में अपनी स्थिति अस्पष्ट रखी है (ग्लोबल सीसीएस इंस्टीट्यूट और टीईआरआई 2013)। जैसा कि हाल के दशकों में देश की ऊर्जा मांग कई गुना बढ़ी है और भविष्य में भारत के सबसे बड़े ऊर्जा बाजारों में से एक बनने की संभावना है, हरित अर्थव्यवस्था (green economy) की दिशा में बदलाव सरकार की प्राथमिकता में बना हुआ है (पीआईबी 2019; सोकोलोव्स्की 2019)। ऊर्जा अर्थव्यवस्था (energy economy) में देश भर में सभी क्षेत्रों के विद्युतीकरण और सौर व हाइड्रोजन जैसे अक्षय व वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के प्रोत्साहन को प्राथमिकता मिल रही है। इन प्रयासों के बावजूद, कई दीर्घकालिक अनुमान बताते हैं कि जीवाश्म ईंधन अभी भी भारत की ऊर्जा अर्थव्यवस्था का हिस्सा, खास तौर पर ऊर्जा व्यवस्थाओं (power systems) और उद्योगों की मांग को पूरा करने के लिए, बना रहेगा (आईईए 2021; चतुर्वेदी, नागर कोटी, और चोर्डिया 2021; थम्बी, भट्टाचार्य और फ्रिक्को 2019; सीईए 2018)। अभी तक सीसीयूएस देश की जलवायु चर्चा में रुचि नहीं पैदा कर पाया है। भारत के निम्न कार्बन भविष्य में सीसीयूएस की भूमिका तीन प्रमुख क्षेत्रों के आस-पास घूमती है: (i) शोध एवं विकास (आरएंडी), (ii) वित्त और (iii) नीति। इतिहास में सीसीयूएस प्रौद्योगिकी की संभावनाओं और संबंधित भूवैज्ञानिक मूल्यांकनों को समझने के लिए बहुत सीमित प्रयास हुए हैं (गुप्ता और पॉल 2019)। हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका के कार्बन डाइऑक्साइड संवर्धित तेल रिकवरी (सीओ2-ईओआर) परियोजना (न्यूनेज़-लोपेज़, और अन्य 2019) के बाद वैश्विक विकास में लगभग पांच दशक बीतने के बावजूद, पूंजी और उत्पादन की उच्च लागत (उत्पादन की आधार लागत में लगभग 63-75 प्रतिशत की वृद्धि) सीसीयूएस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल में प्रमुख बाधा बनी हुई है (राव और कुमार 2014)।
तकनीकी पहलुओं के अलावा, राजनीतिक-आर्थिक पहलू भी लो-कार्बन ट्रांजिशन में सीसीयूएस को शामिल करने का मार्ग प्रशस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं (रोमाशेवा और इलिनोवा 2019)। चूंकि, भारत मूल्य के प्रति संवेदनशील बाजार (price sensitive market) है, इसलिए सीसीयूएस के कारण आने वाली अतिरिक्त लागत एक व्यापक नीतिगत संदर्भ में हानिकारक हो सकती है (गुप्ता और पॉल 2019)।
जलवायु परिवर्तन से संबंधित गतिविधियों में सीसीएस की भूमिका के अलावा, दीर्घकालिक गहन डीकार्बोनाइजेशन (long-term deep decarbonisation) में इसका योगदान भी व्यापक चर्चा का विषय है। यह तकनीक अभी आर्थिक रूप से अव्यावहारिक दिखाई देती है, लेकिन विभिन्न परिदृश्यों में किए गए दीर्घकालिक विश्लेषण ऊर्जा प्रणालियों में सीसीएस की जरूरत को प्रमुखता से रेखांकित करते हैं। चतुर्वेदी (2021) द्वारा किए गए हालिया विश्लेषण में भारत की ऊर्जा प्रणालियों में 2050 तक विभिन्न परिदृश्यों में नेट-जीरो जलवायु लक्ष्यों को पाने के लिए आवश्यक विघटनकारी परिवर्तन (disruptive transformation) की मात्रा (नीचे चित्र में वर्णित) और भविष्य की ऊर्जा प्रणालियों की स्थिति के लिए सीसीएस के महत्व को रेखांकित किया गया है।
चित्र 2 नेट-जीरो के सभी परिदृश्यों में भारतीय अर्थव्यवस्था में सीसीएस का कार्यान्वयन सभी प्रगतिशील चरों में आवश्यक परिवर्तन की गति को धीमा कर देता है

स्रोत: चतुर्वेदी, वैभव द्वारा संकलित, वैभव। 2021. पीकिंग एंड नेट–जीरो फॉर इंडियाज एनर्जी सेक्टर कार्बन डाई ऑक्साइड इमीशंस: एन एनालिटिकल एक्सपोजिशन। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर
उपरोक्त चित्र से पता चलता है कि ऊर्जा प्रणाली में आवश्यक परिवर्तनों के मामले में अर्थव्यवस्था में सीसीएस के साथ और इसके बगैर काफी अंतर आ सकता है। 2050 तक नेट-जीरो तक पहुंचने के परिदृश्य में, गैर-हाइड्रो अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी, जब जीवाश्म-आधारित बिजली उत्पादन के साथ सीसीएस व्यवहार्यता है, बगैर सीसीएस की तुलना में 13 प्रतिशत कम हो सकती है। इसके अतिरिक्त, सीसीएस तकनीक प्राथमिक ऊर्जा में जीवाश्म ईंधन की लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी को समायोजित करने में मदद करेगी, जो सीसीएस की उपलब्धता के बिना केवल 5 प्रतिशत होनी चाहिए।
रिफाइनरीज में सीसीएस (कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज) का व्यवहार्य होना बायोफ्यूल को बढ़ावा देने में मदद करेगा और इलेक्ट्रिक माल ढुलाई ट्रक की बिक्री में परिवर्तन की गति को धीमा कर देगा (21 प्रतिशत), जो CCS के बिना 2050 तक 67 प्रतिशत होगी (चतुर्वेदी 2021)। इसके अलावा, अध्ययन बताते हैं कि भारत में गहन डीकार्बोनाइजेशन परिदृश्यों में, सीसीएस में 2 डिग्री सेल्सियस परिदृश्य में 60 अमेरिकी डॉलर/टी-सीओ2 से कम में 780 मिलियन टन/वर्ष और 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे के परिदृश्य में 75 यूएस डॉलर/टी-सीओ2 तक 250 मिलियन टन/वर्ष की शमन क्षमता (mitigation potential) है (विश्वनाथन और अन्य 2018; गर्ग और अन्य 2017)। इसलिए, सीसीएस नेट-जीरो लक्ष्य को पाने में मदद कर सकता है और साथ ही जीवाश्म ऊर्जा को छोड़ने से जुड़े परिवर्तन की रफ्तार में थोड़ी छूट दे सकता है, जो प्रणालियों से जुड़े बदलाव (system transformation) और इस बदलाव के लिए आवश्यक निवेश में थोड़ी राहत दे सकता है। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि इन मामलों में सीसीएस की व्यवहार्यता (feasibility) एक बड़ी धारणा है और जैसा कि पहले चर्चा की गई है कि भारत में पिछले दशक में सीसीएस की आर्थिक और नीतिगत व्यवहार्यता ने पर्याप्त गति नहीं पकड़ी है। फिर भी, हाल के समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में सीसीयूएस को बढ़ावा देने के लिए बढ़ते प्रयास (वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होकर) सीसीएस के लिए तकनीकी-अर्थशास्त्र और नीति को परिभाषित करने पर केंद्रित है, यानी आरएंडडी, वित्त और नीतिगत संदर्भ में। उपरोक्त वर्णित चुनौतियों के साथ कार्बन भंडारण से जुड़ा जोखिम भी सीसीएस प्रबंधन में चुनौती पेश करता है। लोगों की भागीदारी और तकनीक के बारे में जागरूकता बहुत कम है, जो 'मुझसे जुड़ी समस्या नहीं है' की सोच को बढ़ावा देता है, जिससे सार्वजनिक चिंताएं बढ़ रही हैं (टीसीवेटकोव, चेरेपोवित्सिन, और फेडोसेव 2019)। इसके अलावा, दायित्व, दंड, दीर्घकालिक प्रबंधन और नेतृत्व से जुड़े सवाल भी हैं, और सीसीएस से जुड़ी प्रशासनिक चिंताएं भी हैं और अगर यह प्रौद्योगिकी अर्थव्यवस्था में पर्याप्त जगह बनाती है (आईआरजीसी 2018) तो राष्ट्रीय संचारों और द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट (बीयूआर), विभिन्न क्षेत्रों में इस तकनीक की बदलती भूमिका पर ध्यान देने वाले प्रमुख वैश्विक शोधों, और भारतीय संदर्भ में सीसीयूएस की बदलती धारणाओं को पकड़ने वाली भारतीय उद्योगों की प्रमुख घोषणाओं जैसी बहसों पर ध्यान देने की जरूरत है। इस इश्यू ब्रीफ के बाकी हिस्सों में, हमने भारत में सीसीएस/सीसीयूएस से जुड़ी चर्चा की गति को बरकरार रखने के लिए विशेष रूप से ध्यान दिए जाने वाले क्षेत्रों को रेखांकित करते हुए आकलन, निष्कर्ष और आगे के रास्ते से सामने आई प्रमुख बातों पर चर्चा की है।
भारत में सीसीयूएस की चर्चा पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया है, लेकिन ऊर्जा और जलवायु नीति क्षेत्र के लिए यह चर्चा नई नहीं है। नीचे दिया गया चित्र भारत में सीसीएस/सीसीयूएस चर्चा के विकासक्रम में आए विभिन्न प्रमुख पड़ावों की जानकारी देता है। 2007 में भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा भारतीय कार्बनडाइऑक्साइड सिक्वेस्ट्रेशन एप्लाइड रिसर्च (आईसीओएसएआर) नेटवर्क की स्थापना एक प्रमुख घटनाक्रमों में से एक है, जिसने हितधारकों के बीच सीसीएस अनुप्रयोगों पर शोध के बारे में चर्चा शुरू की और सुविधाएं उपलब्ध कराईं (वीबैन, वैलेन्टिन, और हॉलर 2014; विबाहन और अन्य 2011; बम्ब और ऋतुराज एन.डी.)। 2008 में, भारत सरकार नेशनल एक्शन प्लान फॉर क्लाइमेट चेंज (एनएपीसीसी) लेकर आई, जिसमें कोयला आधारित पॉवर प्लांस्ट से उत्सर्जन को घटाने के संदर्भ में सीसीएस का उल्लेख किया गया, जबकि इसकी उच्च लागत और कार्बन डाइऑक्साइड स्टोरेज रिपॉजिटरी की (अ)स्थिरता से जुड़ी चिंताओं को रेखांकित किया गया था (पीएमसीसीसी 2008)। यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के लिए द्वितीय राष्ट्रीय संचार (एसएनसी) में भी भारत ने कार्बन डाइऑक्साइड कैप्चर एंड स्टोरेज के लिए एक प्रदर्शक परियोजना पेश की थी (एमओईएफ 2012)। जल्द ही, भारत के विकास की कहानी और जलवायु चर्चा में सीसीएस पर बातचीत अपनी लय खो बैठी। बाद के बीयूआर ने देश में सीसीएस की प्रगति को शामिल नहीं किया। बीयूआर-I और बीयूआर-II दोनों में ही भारत की कार्बन कैप्चर गतिविधियों का ज्यादा उल्लेख नहीं किया गया (एमओईएफसीसी 2015, 2018)। हालांकि, 2015 में, कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप)-21 में मिशन इनोवेशन (एमआई) की शुरुआत भारत में सीसीएस तकनीक पर शोध एवं विकास के लिए एक मील का पत्थर बनकर सामने आया (एमओईएफसीसी 2018)।
चित्र 3 मिशन इनोवेशन के कारण 2015 के बाद भारत में सीसीयूएस के लिए संभावनाएं तलाशने पर चर्चा और वित्तपोषण ने गति पकड़ी

मिशन इनोवेशन (एमआई) के अंग के रूप में, आठ नवाचार चुनौतियों (innovation challenges) को पूरा करने के लिए भारत 24 सदस्य देशों और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ साझेदारी कर रहा है। नवाचार चुनौती (आईसी)-3 'कार्बन कैप्चर-बिजली संयंत्रों व कार्बन-उत्सर्जित करने वाले उद्योगों से लगभग शून्य कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को सक्षम बनाने पर केंद्रित है (एमओईएफसीसी 2021)। चूंकि भारत के पास सीसीयूएस को व्यापक स्तर पर लागू करने का अधिक अनुभव नहीं है, इसलिए नवाचार योजना एमआई देशों के बीच एक-दूसरे से सीखने (peer learning) के जरिए विकास को विस्तार देने पर केंद्रित है (डीबीटी और डीएसटी 2018)। एमआई देशों ने उल्लिखित नवाचार चुनौतियों (जीओआई 2017) के लिए शोध एवं विकास गतिविधियों को वित्तीय प्रोत्साहन देने के लिए 2015 बेसलाइन से वित्तपोषण को दोगुना करने पर भी सहमति जताई है। इसके अलावा, एमआई की शुरुआत का भारत में सीसीयूएस प्रौद्योगिकी को अपनाने पर कई सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और डीएसटी ने, एमआई के अंतर्गत एक्सलेरेटिंग सीसीयूएस टेक्नोलॉजीज (एसीटी) पहल के साथ, समान प्रौद्योगिकी आदान-प्रदान और शोध एवं विकास के लिए धन आवंटित करके भारतीय संदर्भ में सीसीएस/सीसीयूएस पर दोबारा ध्यान केंद्रित करने में आवश्यक भूमिका निभाई है। वित्तीय सहायता के लिए नवीनतम अपील में, 15 एसीटी सदस्य देशों और संगठनों ने भाग लेने का निर्णय लिया है। हालांकि, धनराशि को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय बजट से आवंटित किया जाएगा, जो शोध एवं विकास के साथ प्रयोगों और प्रदर्शक परियोजनाओं का समर्थन करती है। तीसरी अपील में रेखांकित कुछ शोध प्राथमिकताओं में शामिल हैं: कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण के लिए कुशल अवशोषक (efficient absorbents), प्रौद्योगिकी का आर्थिक और औद्योगिक मूल्यांकन, अधिक तेल प्राप्त करते हुए पृथक्करण (sequestration) इत्यादि (डीबीटी और डीएसटी 2018)। सीसीयूएस ने भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में गति पकड़नी शुरू कर दी है। नेशनल एल्युमीनियम कंपनी (एनएएलसीओ), ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी), और भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल) जैसे भारी उद्योग सीसीयूएस सुविधाएं स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं। सर्वाधिक उत्सर्जन-गहनता वाले लौह व इस्पात और सीमेंट उद्योगों की अग्रणी कंपनियां कार्बन-तटस्थ (carbon-neutral) बनने (एमओईएफसीसी 2021) के दृष्टिकोण के साथ सीसीयूएस प्रौद्योगिकियों को खंगालने के मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं। फिर भी, संयुक्त राज्य अमेरिका के ऊर्जा विभाग (US-DoE) और डीएसटी के बीच बातचीत के कारण भारत ने एक्सीलरेटिंग सीसीयूएस टेक्नोलॉजीज (ACT) में भाग लिया है, जिसके परिणामस्वरूप देश में सीसीयूएस विकास के लिए अमेरिका-भारत सहयोग हुआ है (एमओईएफसीसी 2021)। इसके अलावा, भारत-ब्रिटेन के भविष्य के संबंधों पर हाल ही में जारी हुए रोडमैप 2030 में स्वच्छ ऊर्जा और परिवहन के प्रमुखता से ध्यान केंद्रित किए जाने वाले क्षेत्रों (focus areas) के तहत सीसीयूएस पर विचार किया गया है (एमईए2021)। इस प्रकार से, विभिन्न पहलें भारत में उद्योगों में सीसीयूएस के अनुप्रयोग को फिर से शुरू करने पर प्रकाश डालती हैं। विभिन्न देश और उद्योग महत्वाकांक्षी जलवायु परिवर्तन शमन लक्ष्य लेकर आ रहे हैं, इसके साथ सीसीयूएस पर दोबारा शुरू हुई यह बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है।
सीसीएस/सीसीयूएस पर वैश्विक नीतिगत दस्तावेजों की समीक्षा
2015 में, जलवायु परिवर्तन शमन (climate change mitigation) के वैश्विक प्रयासों के कारण हुए पेरिस समझौते के तहत संबंधित देशों ने उत्सर्जन को घटाने का वादा करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों (NDC) को पेश किया था। हालांकि, विभिन्न अध्ययन पहले ही बता चुके हैं कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए एनडीसी पर्याप्त नहीं हैं (आर. लियू और राफ्टरी 2021; वांग और चेन 2019)। चूंकि शमन लक्ष्य पर्याप्त महत्वाकांक्षी नहीं थे, इसलिए पार्टियों (देशों) ने यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) में प्रस्तुत एनडीसी में भविष्य की एक संभावित तकनीक के रूप में सीसीएस को बहुत मामूली स्तर पर शामिल किया है। एनडीसी की समीक्षा से पता चलता है कि 163 देशों में से केवल 13 देशों और यूरोपीय संघ (अपने सदस्य देशों के लिए) ने अपनी घोषणाओं में सीसीएस का उल्लेख किया है (कैंपबेल और अन्य 2018)।
हालांकि, मध्य-शताब्दी रणनीतियों (एमसीएस)4 के मामले में, छह में से केवल तीन देशों ने अर्थव्यवस्था में सीसीएस को लागू करके संभावित कटौती का निर्धारण किया है (कैंपबेल और अन्य 2018)।
लेकिन जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के बढ़ते अनुभव ने देशों को नेट-जीरो जैसे कठोर जलवायु संकल्पों की दिशा में जाने पर विवश किया है। यूरोपीय संघ (2050 तक), जापान (2050 तक) और चीन (2060 तक) जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं पहले ही अपने नेट-जीरो लक्ष्य घोषित कर चुकी हैं (मरे 2020)। संयुक्त राज्य अमेरिका में नेतृत्व परिवर्तन के साथ, 2050 तक नेट-जीरो का संकल्प लेना भी बाइडेन प्रशासन की प्राथमिकता सूची में है (मूनी 2020)। इसके साथ, स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में सीसीयूएस की भूमिका पर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के विश्लेषण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सीसीयूएस तकनीक के बिना कार्बन तटस्थता को हासिल कर पाना लगभग असंभव है (आईईए 2020)। इसी दिशा में, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में नेट-जीरो लक्ष्य पाने के अनुमान सख्त कार्बन बाधाओं के परिदृश्य में सीसीएस की प्रमुख भूमिका पर जोर देते हैं। अनुमान के अनुसार, यूरोप को 2030 में लगभग 230-430 मीट्रिक टन कॉर्बन डाइऑक्साइड/वर्ष को कैप्चर करने और 2050 तक इसे 930-1,200 मीट्रिक टन कॉर्बन डाइऑक्साइड/वर्ष तक बढ़ाने के लिए एक बड़ी सीसीएस सुविधा की आवश्यकता होगी, ताकि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक तापमान को सीमित करने के लक्ष्य के अनुरूप 2050 तक नेट जीरो तक पहुंचा जा सके(बटनर, क्रोनिन और पाई 2020)। यहां तक कि चीन की नेट-जीरो महत्वाकांक्षा का विश्लेषण भी दिखाता है कि 2060 तक, ऊर्जा की 16 प्रतिशत मांग जीवाश्म ईंधन पर निर्भर होगी और लक्ष्य को पाने के लिए सीसीएस तकनीक को शामिल करने की जरूरत होगी (नेचर 2020; ब्लूमबर्ग 2020बी)।

वैश्विक तापमान कटौती लक्ष्यों को पाने में सीसीयूएस के महत्व और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तत्परता के बावजूद, सीसीयूएस परियोजना पाइपलाइन का निवेश और विकास उतनी तेजी से नहीं हो पा रहा है, जितना होना चाहिए (आईईए 2020; ग्लोबल सीसीएस इंस्टीट्यूट 2019)। ऐतिहासिक रूप से, घोषणाओं के बावजूद, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सीसीएस के वित्तपोषण के लिए निवेश में तेजी नहीं आई है। अंतर के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार यूरोप में रद्द हुई सीसीएस परियोजनाओं के साथ, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ग्रेट ब्रिटेन द्वारा 2009 में घोषित 31 बिलियन अमेरिकी डॉलर में से वास्तव में केवल 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ (रोमाशेवा और इलिनोवा 2019)। 2010 से 2017 तक सीसीएस क्षमता में लगातार गिरावट आने के बाद, यह 2017 से 2020 तक चढ़ना शुरू हो गया है। जैस तरह से वैश्विक स्तर पर सीसीएस (कार्बन कैप्चर एंड स्टोरेज) गति पकड़ रहा है, 2010 की तुलना में मौजूदा संचालन क्षमता चार गुना अधिक है (ग्लोबल सीसीएस इंस्टिट्यूट 2020a)। बढ़ती महत्वाकांक्षाएं राष्ट्रीय नेतृत्व को सीसीएस तकनीक को अपनाने के लिए और अधिक प्रेरित कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन शमन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और दीर्घावधि में सीसीएस की अनिवार्यता के अहसास ने प्रमुख देशों में निवेश को आकर्षित करना शुरू कर दिया है। नीचे दी गई तालिका सीसीएस सुविधाओं के लिए प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की सरकारों की ओर से वित्तीय सहायता और निवेश पहल की प्रमुख घोषणाओं का वर्णन करती है।
विकसित राष्ट्र की ओर से जलवायु परिवर्तन शमन प्रतिज्ञाओं से जुड़ा उतार-चढ़ाव भारत के दृष्टिकोण और निर्णय को प्रभावित करेगा। बढ़ती हुई वैश्विक महत्वाकांक्षाओं से भारत पर या तो नेट-जीरो की दिशा में जाने या फिर अपने शमन लक्ष्यों में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी करने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाए जाने की संभावना है। फिर भी जलवायु परिवर्तन शमन के प्रयासों में नेतृत्वकारी प्रदर्शन करने के लिए भारत की प्रशंसा की जाती है। साथ ही में, भारत उन जी20 देशों में से एक है, जो तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। एक अग्रणी देश होने के नाते, भारत वैश्विक जलवायु परिवर्तन राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। हालांकि, जैसे-जैसे अधिक से अधिक जी20 देश5 कार्बन तटस्थता लक्ष्यों के साथ आगे आ रहे हैं, महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के साथ अनुरूपता लाने की योजना नहीं बनाने के परिणाम में भारत अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन राजनीति में नेतृत्वकारी भूमिका खो सकता है।
टेबल 1 सीसीएस/सीसीयूएस को अपनाने के लिए वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन देने के लिए प्रमुख घोषणाएं

इसके अतिरिक्त, यूरोपीय संघ 'कार्बन लीकेज' से बचने के लिए कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) की ओर बढ़ने वाले शुरुआती देशों में से एक है। सीबीएएम विश्व व्यापार में एक हलचल पैदा कर सकता है और विभिन्न देशों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ की शर्तों को बदल सकता है (बीसीजी 2020)। एक तरफ, भारत यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते के नजदीक पहुंच रहा है, जिससे यूरोपीय कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में प्रवेश करना आसान हो जाएगा (बिजनेस स्टैंडर्ड 2020)। दूसरी ओर, यूरोपीय संघ उच्च उत्सर्जन वाले बाजारों से आयात पर कार्बन टैक्स लगाना चाहता है (ब्लूमबर्ग 2020)। इन दोनों तरह के समझौतों के एक साथ होने से वैश्विक और स्थानीय स्तर पर भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता पर असर पड़ने की की आशंका है। इन चिंताओं ने भारत में निजी क्षेत्र को सामान्य प्रगति से आगे जाने और उद्योगों में सीसीएस/सीसीयूएस सुविधाओं के लिए प्रयोग शुरू करने के लिए प्रेरित किया है।
भारतीय उद्योगों द्वारा उठाए गए कदम
वर्तमान में, उद्योगों में गहन डीकार्बोनाइजेशन क्षमता को हासिल करना किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण है। पारंपरिक प्रक्रियाओं में पहले हो चुका निवेश और प्रौद्योगिकी की उन्नति से जुड़ी सीमाएं, जैसे विशिष्ट ऊष्मा आधारित प्रक्रियाओं की जीवाश्मों पर निर्भरता, दोनों ही कारण बदलाव की संभावनाओं को सीमित करते हैं (बुहलर, मुलर होल्म, और एल्मेगार्ड 2019; डीसन और अन्य 2018)। इस संदर्भ में, उद्योग जगत की प्रमुखता से सहायता करने वाली एक महत्वपूर्ण शमन तकनीक के रूप में सीसीएस/सीसीयूएस के बारे में व्यापक चर्चा की जा रही है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में ऊर्जा और उत्सर्जन के मामले में औद्योगिक क्षेत्र प्रमुख बना रहेगा। 2050 तक अंतिम रूप से कुल ऊर्जा खपत में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 58 प्रतिशत बनी रहने की उम्मीद है (चतुर्वेदी, नागर कोटी और चोरडिया 2021)। जबकि सदी के मध्य तक संपूर्ण अर्थव्यवस्था से जुड़े उत्सर्जन में इसकी हिस्सेदारी लगभग 31 प्रतिशत होगी (चतुर्वेदी, नागर कोटी और चोरडिया 2021)। इसके अतिरिक्त, औद्योगिक क्षेत्र में जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों का प्रभुत्व बने रहने की उम्मीद है, जो 2017 में कुल औद्योगिक ऊर्जा खपत का 66 प्रतिशत था (आईईए 2018) और 2050 तक केवल 2 प्रतिशत घटकर 64 प्रतिशत होने की संभावना है (चतुर्वेदी, नागर कोटी और चोरडिया 2021)। भारत के औद्योगिक क्षेत्र की जीवाश्म ईंधन पर अपेक्षित दीर्घकालिक निर्भरता इस क्षेत्र में गहन डीकार्बोनाइजेशन परिदृश्यों में सीसीयूएस प्रौद्योगिकियों की भूमिका को अपरिहार्य बनाती है। भारतीय उद्योग के लिए सीसीयूएस प्रौद्योगिकियों के महत्व के बावजूद, उद्योगों में इन शमन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने में नीतिगत सहायता की कमी है। हालांकि, औद्योगिक नेतृत्वकर्ताओं को दीर्घकालिक सततशीलता (उत्सर्जन-गहन का ठप्पा हटाने के लिए) में व्यावसायिक जोखिमों की जानकारी है, इसलिए उन्होंने चयनित संयंत्रों में सीसीएस/सीसीयूएस को लागू करने के लिए कुछ प्रयोग शुरू किए हैं।
जैसा कि पिछले खंड में बताया गया है, नाल्को, ओएनजीसी और भेल जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम सीसीएस के लिए शुरुआती प्रयोग कर रहे हैं (एमओईएफसीसी 2021)। नाल्को ने एक पायलट-सह-प्रदर्शन सीओ2 सीक्वेस्ट्रेशन प्लांट संचालित किया है (गुप्ता और पॉल 2019) । आईटीपीसीएल प्लांट में कैप्चर किए गए कॉर्बन डाइऑक्साइड को ओएनजीसी कावेरी एसेट के तेल क्षेत्रों में डालने के लिए 2018 में ओएनजीसी ने आईएलएफएस एनर्जी और तमिलनाडु पावर कंपनी (आईटीपीसीएल) के साथ एक समझौता-पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं (कॉर्नोट-गंडोल्फे 2019)। तकनीक को विस्तार देने की क्षमता, विभिन्न सफल प्रदर्शन, सीसीयूए की उच्च लागत को ऑफसेट करते हुए राजस्व सृजित करने की क्षमता और शुद्ध पृथक्करण परियोजनाओं का अग्रदूत होने जैसे विभिन्न कारण इनहैंस्ड ऑयल रिकवरी (ईओआर) को सीसीयूएस परियोजनाओं के लिए एक पसंदीदा विकल्प बनाते हैं। चूंकि तेल की खोजें कमी होती जा रही हैं, इसलिए इनहैंस्ड ऑयल रिकवरी (ईओआर) जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से कॉर्बन डाइऑक्साइड का उपयोग परिपक्व तेल क्षेत्रों (mature oil fields) को पुनर्जीवित करने की एक बड़ी क्षमता दिखाता है (मिश्रा, और अन्य 2019)। इसलिए, ओएनजीसी और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) ने आईओसीएल की कोयली रिफाइनरी से कैप्चर किए गए कॉर्बन डाइऑक्साइड को भरकर कॉर्बन डाइऑक्साइड आधारित ईओआर के लिए एक समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। इस प्रयास का उद्देश्य घरेलू क्षेत्रों से उत्पादन बढ़ाते हुए कॉप21 (COP21) में निर्धारित भारत के कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों में कमी लाना है (ओएनजीसी 2019)। आकलनों के अनुसार, ओएनजीसी की ईओआर परियोजना में संरचनात्मक, घुलनशीलता और अवशिष्ट ट्रैपिंग तंत्र के माध्यम से लगभग 5-8 एमएमटी कॉर्बन डाइऑक्साइड के पृथक्करण की संभावना (sequestration potential) है (मिश्रा, और अन्य 2019)।
इसके अलावा, डालमिया सीमेंट, देश के अग्रणी सीमेंट निर्माताओं में से एक, जैसी निजी कंपनियां भी सीसीएस तकनीक को अपनाने की संभावनाएं तलाश रही हैं। उद्योगों के गहन डीकार्बोनाइजेशन की दिशा में निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी भारत के औद्योगिक क्षेत्र के लिए एक बड़ा बदलाव ला सकती है। इसलिए, इस केस स्टडी में डालमिया सीमेंट का अध्ययन किया गया है।

डालमिया सीमेंट के मामले से यह स्पष्ट है कि अगर उत्सर्जन को घटाने के लिहाज से मुश्किल माने जाने वाले क्षेत्रों (hard to abate sectors) के लिए नेट-जीरो जैसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करना है, तो सीसीयूएस तकनीक को अनिवार्य रूप से रणनीति के रूप में शामिल करना होगा, भले ही ऐसे उद्योग दुनिया भर में सबसे कुशल उद्योगों में से एक हैं। इसी तरह, टाटा स्टील की नवीनतम तकनीक, 'हिसारना' (HISARNA) को सीसीएस तकनीक के साथ लागू करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि, सीसीएस के साथ हिसारना तकनीक अभी भी विकसित हो रही है और कार्यान्वयन की समय-सीमा भी स्पष्ट नहीं है (टीएनओ 2020)।
फिर भी, 'कार्बन लीकेज' से बचने के लिए यूरोपीय संघ में कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट टैक्स जैसे वैश्विक शमन रणनीतियों में बदलावों के साथ, उद्योगों को यूरोपीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए 'सामान्य प्रयास' से आगे बढ़कर कम कार्बन-गहन स्थिति (lesser carbon-intensive state) की तरफ जाने की जरूरत है। फिर भी, जलवायु परिवर्तन शमन कार्यों और विभिन्न देशों द्वारा घोषित महत्वाकांक्षी जलवायु प्रतिज्ञाओं की तात्कालिकता को देखते हुए, यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट टैक्स की तरह दूसरे कदमों की उम्मीद की जा सकती है।
इस प्रकार, उद्योगों द्वारा सीसीयूएस की भूमिका को पहचाना जा रहा है, लेकिन भारत में सीसीएस/सीसीयूएस तकनीक के स्वीकरण को प्रोत्साहन देने से संबंधित बदलावों के लिए और अधिक हितधारकों की जरूरत है।
भारत समेत पूरे विश्व में सीसीएस/सीसीयूएस तकनीक को लागू करने की संभावनाओं के प्रति बदली धारणाएं स्पष्ट हैं, जो मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन शमन महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित हैं। हमारा आकलन निम्नलिखित बिंदुओं को रेखांकित करता है:
देशों द्वारा कार्बन तटस्थता के लिए महत्वाकांक्षी प्रतिज्ञाएं करने के साथ भारतीय और वैश्विक संदर्भों में सीसीएस/सीसीयूएस प्रौद्योगिकी के बारे में चर्चा दोबारा जोर पकड़ रही है।
हालांकि, भारत में यह तकनीक मुख्यधारा में आने से अभी काफी दूर है, लेकिन भारत सरकार और भारतीय उद्योग इस प्रौद्योगिकी के तकनीकी-आर्थिक व्यवहार्यता और इसे विस्तार दिए जाने की क्षमता को बेहतर ढंग से समझने का प्रयास कर रहे हैं।
सततशीलता और प्रतिस्पर्धात्मकता के व्यापक संदर्भ में कार्बन-तटस्थ रहने की आवश्यकता को पहचानते हुए, भारतीय उद्योग और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) सीसीएस सुविधाओं को बढ़ावा देने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
एक दशक की निष्क्रियता के बाद, भारत में जलवायु परिवर्तन शमन चर्चाओं में सीसीयूएस ने वापसी की है। इस पर सबसे पहले 2007 में चर्चा शुरू हुई थी, लेकिन समय के साथ इसने अपनी लय खो दी थी। 2015 में भारत के मिशन इनोवेशन में शामिल होने और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तत्कालिक आवश्यकता को देखते हुए कई देशों द्वारा कार्बन तटस्थता जैसे महत्वाकांक्षी शमन प्रतिज्ञा (ambitious mitigation pledges) करने के साथ, भारत सहित विभिन्न देशों में जीवाश्म-आधारित उद्योगों की मौजूदगी के बीच एक आवश्यक तकनीक के रूप में सीसीयूएस तकनीक दोबारा रफ्तार पकड़ रही है। भले ही सीसीयूएस तकनीक बिजली और औद्योगिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, लेकिन भारत का बिजली क्षेत्र अभी अक्षय ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर करता है। हालांकि, दीर्घकालिक गहन डीकार्बोनाइजेशन परिदृश्यों में, ऊर्जा प्रणालियों में नेट-जीरो उत्सर्जन (net-zero emissions) पाने में सीसीयूएस तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी के साथ, औद्योगिक क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो इसके परिवर्तन को बाधित कर रहा है। परिणामस्वरूप, चुनौतियों की बढ़ती स्वीकार्यता और औद्योगिक क्षेत्र की उत्सर्जन शमन की आवश्यकता के साथ, कई भारतीय उद्योगों द्वारा सीसीयूएस को प्रायोगिक तौर पर अपनाया जा रहा है।
भारत में सीसीयूएस के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान करने के लिए, भारतीय बाजार में सीसीयूएस सुविधाओं के लिए सहायक पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने और उन्नत बनाने की आवश्यकता है। सीसीयूएस की सफलता केवल उस तकनीक से बाधित नहीं है, जो आने वाले वर्षों में उन्नत होगी, बल्कि नीतिगत पारिस्थितिकी की कमी से भी बाधित होती है। पारिस्थितिकी तंत्र को आवश्यक स्तंभों, यानी शोध एवं विकास, नीति, वित्त एवं शासन के आसपास विकसित किया और सशक्त बनाया जाना चाहिए। एमआई-डीबीटीडीएसटी परियोजनाओं को छोड़कर, सीसीयूएस के लिए विशेष रूप से केंद्रित कोई अध्ययन नहीं कराया जा रहा है। हालांकि, चुनौतियों और स्थानीय समाधानों को समझने के लिए भारत के विशिष्ट संदर्भ में व्यापक अध्ययन करने की आवश्यकता है। इसके साथ, बदलती आवश्यकताओं और सीसीयूएस की भूमिका पर नीतियों के प्रभावों, खासकर औद्योगिक क्षेत्र में, को समझने के लिए नीतिगत मोर्चे पर अनुसंधान और संचार की भी आवश्यकता है। प्रौद्योगिकी को लेकर हितधारकों का भरोसा बढ़ाने और इससे जुड़ी अनिश्चितताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए, प्रदर्शन परियोजनाओं (demonstration projects) की जरूरत है। इसके अलावा, बाजार आधारित शमन तंत्र उद्योगों में सीसीयूएस सुविधाओं को बढ़ाने और सीसीयूएस को एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सुलभकर्ता (ecosystem enabler) के रूप में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। वैकल्पिक वित्तीय तंत्र और उपभोक्ताओं को इस महंगी लेकिन प्रासंगिक तकनीक को अपनाने में सहायता करने की जरूरत को रेखांकित करने वाले कई दशकों के शोध के बावजूद, सीसीयूएस की लागत बहुत अधिक है। चूंकि सीसीयूएस से जुड़ी अनिश्चितता और जोखिम सर्वविदित है, इसलिए पारिस्थितिकी तंत्र में सीसीयूएस को शामिल करने की दीर्घकालिक सततशीलता और संबंधित व्यापारगत समझौतों (trade-offs) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इसके बावजूद विकसित देशों की तुलना में भारत के लिए सीसीयूएस तकनीक अपेक्षाकृत नई है और इसलिए भारत की कम कार्बन वाली कहानी पर चर्चा करते हुए बहस को जारी रखने के लिए अधिक व्यापक शोध, कार्यों और चर्चाओं की आवश्यकता है।
डिस्क्लेमर: यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
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