
प्रस्तावित उद्धरण: सिंह, निष्ठा और वैभव चतुर्वेदी। 2023। अंडरस्टैंडिंग कार्बन मार्केट्स: प्रॉस्पेक्ट फॉर इंडिया एंड स्टेकहोल्डर पर्सपेक्टिव। नई दिल्ली: काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर।
21 फरवरी, 2023
डिस्क्लेमर : यह मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद है। हमने इसके अनुवाद में पूरी सतर्कता बरती है। यदि इसमें कोई भ्रम होता है या भूलवश कोई त्रुटि सामने आती है तो इसका अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
भारत सरकार की ओर से ऊर्जा संरक्षण अधिनियम - 2001 में किए गए एक संशोधन से भारतीय कार्बन मार्केट की नींव पड़ी है। इस पृष्ठभूमि में सीईईडब्ल्यू ने औद्योगिक हितधारकों की चिंताओं और दृष्टिकोणों को समझने के लिए एक चर्चा का आयोजन किया। यह इश्यू ब्रीफ कार्बन मार्केट्स के दोनों प्रमुख प्रकारों - परियोजना-आधारित/ऑफसेट और इमीशन ट्रेडिंग स्कीम (ईटीएस) आधारित-मार्केट की व्याख्या करता है और उनकी पर्यावरणीय अखंड़ता (environmental integrity) और कार्यात्मक सीमाओं (functional boundaries) को निर्धारित करने वाली प्रमुख विशेषताओं की एक रूपरेखा तैयार करता है। यह मार्केट-आधारित विभिन्न उपायों और भारतीय कार्बन मार्केट के गठन की दिशा में हालिया घटनाक्रमों के संदर्भ में भारतीय नीतिगत परिदृश्य को भी रेखांकित करता है। अंत में, यह इश्यू ब्रीफ भारतीय कार्बन मार्केट की घोषणा को लेकर प्रमुख भारतीय हितधारकों की प्राथमिक चिंताओं पर चर्चा करता है और अपने सुझाव देता है।
भारत सरकार की एक कार्बन क्रेडिट मार्केट विकसित करने की घोषणा एक नई शुरुआत है। यह नेट-जीरो घोषणा जैसे कई दूसरे कदमों के क्रम में उठाया गया एक कदम है, जो जलवायु परिवर्तन के शमन (climate change mitigation) में भारत की नेतृत्वशीलता और महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। इसी पृष्ठभूमि में, यह इश्यू ब्रीफ कार्बन बाजारों के वैकल्पिक स्वरूपों की चर्चा करता है और इस विषय पर भारतीय हितधारकों के दृष्टिकोणों का मूल्यांकन करता है। इसमें हमने कार्बन मार्केट के दो वैकल्पिक दृष्टिकोणों: 'ऑफसेट मार्केट' (परियोजना-आधारित) और 'कैप-एंड-ट्रेड (या इमीशन ट्रेंडिंग स्कीम [ईटीएस]) मार्केट' को रेखांकित किया है और उनकी व्याख्या की है। ये दोनों ही दृष्टिकोण संरचना के साथ गुणवत्ता, पर्यावरणीय अखंडता, और व्यापार योग्य इकाइयों की परिचालन सीमा को परिभाषित करने वाली प्रमुख विशेषताओं के मामले में एक दूसरे से बहुत अलग हैं। इस संदर्भ में, हमने हालिया घटनाक्रमों पर औद्योगिक हितधारकों के दृष्टिकोणों को समझने के लिए उनके साथ एक परिचर्चा का भी आयोजन किया था।
हितधारकों के साथ चर्चा से सामने आए प्रमुख विषय:
हमारा कुल मिलाकर सुझाव है कि भारत को ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) द्वारा प्रस्तावित परिवर्तन प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण से अनुरूपता रखनी चाहिए और इसके साथ एशिया व पूरे विश्व में प्रभावी ईयू-ईटीएस और कोरियाई ईटीएस जैसे कई अन्य ईटीएस प्रणालियों की तरह एक ईटीएस विकसित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, विश्व के अन्य ईटीएस प्रणालियों के अनुभवों से सीखते हुए भारत के ईटीएस को इस प्रकार से तैयार करना चाहिए कि वह अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और आर्थिक ढांचे को प्रतिबिंबित कर सके।
बाजार-आधारित उपायों की पूरी क्षमता का उपयोग करने और उनकी अखंड़ता व गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए, उनमें अंतर्निहित विशेषताओं और पर्यावरणीय सीमाओं को भी समझना जरूरी है।
भारत सरकार ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में एक संशोधन पारित किया है, जो भारत में कार्बन क्रेडिट मार्केट की स्थापना के रास्ते खोलता है (ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022)।
यह संशोधन उत्सर्जन को घटाने के लिए गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य के साथ-साथ कार्बन मार्केट के लिए एक कानूनी ढांचा उपलब्ध कराता है। भारतीय कार्बन क्रेडिट मार्केट के अंतर्गत, संस्थाएं कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना के लिए स्वयं को “पंजीकृत संस्थाओं” के रूप में पंजीकृत कर सकती हैं। केंद्र सरकार या उसके द्वारा अधिकृत कोई एजेंसी कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र जारी करेगी। कोई अन्य व्यक्ति या संस्था स्वैच्छिक आधार पर एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स या कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र को खरीद सकती है। अभी बीईई की ओर से कार्बन मार्केट के परिचालन नियमों और तकनीकी विवरणों का निर्धारण किया जाना शेष है। यह इश्यू ब्रीफ भारत में विभिन्न प्रकार के कार्बन मार्केट, कार्बन डाइ-ऑक्साइड उत्सर्जन से असंबद्ध मार्केट-आधारित अन्य उपकरणों और भारतीय कार्बन क्रेडिट मार्केट की घोषणा से जुड़ी हितधारकों की चिंताओं को रेखांकित करता है।
सेक्शन 2 कार्बन मार्केट के वैकल्पिक स्वरूपों और उनकी प्रमुख विशेषताओं के बारे में बताता है। सेक्शन 3 संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत कार्बन मार्केट के एक संक्षिप्त इतिहास की जानकारी देता है। सेक्शन 4 भारत में कार्बन उत्सर्जन शमन के मार्केट-आधारित वर्तमान उपायों और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में प्रस्तावित संशोधन में कार्बन क्रेडिट मार्केट के विवरणों की जानकारी देता है। सेक्शन 5 सीईईडब्ल्यू में उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ हितधारक चर्चा में सामने आए मुख्य बिंदुओं और प्रस्तावित सुझावों की चर्चा करता है। सेक्शन 6 में भविष्य के लिए हमारे सुझाव हैं।
सीईईडब्ल्यू ने भारत में स्वैच्छिक कार्बन मार्केट, अंतरराष्ट्रीय कार्बन मार्केट और वैकल्पिक मार्केट-आधारित उपायों के लिए भारत के घरेलू कार्बन मार्केट के प्रभावों पर उद्योग के हितधारकों के साथ एक परिचर्चा का आयोजन किया। यह खंड इसी चर्चा में सामने आई प्रमुख बातों को रेखांकित करता है:
जैसा कि सेक्शन 2 में रेखांकित किया गया है, यहां बाजारों के लिए दो वैकल्पिक दृष्टिकोण हैं - एक ऑफसेट (प्रोजेक्ट-आधारित), और दूसरा ईटीएस है। बीईई के श्वेत पत्र और नीति पत्र में एक ईटीएस के भीतर पीएटी कार्यक्रम के उत्तरोत्तर विकास होने की परिकल्पना की गई है। निजी क्षेत्र और नागरिक समाज के सभी भारतीय हितधारकों के पास परियोजना-आधारित दृष्टिकोण का अनुभव, चाहे अनुपालन बाजार के माध्यम से हो या स्वैच्छिक बाजार से, बहुत ज्यादा है। दूसरी तरफ, इसकी बहुत कम या न के बराबर जानकारी और समझदारी है कि व्यवहारिक तौर पर ईटीएस प्रणाली कैसे काम करती है। इसका बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि बाजार के भागीदार कार्बन मार्केट से संबंधित किसी भी घोषणा को 'ऑफसेट' दृष्टिकोण से देखते हैं, न कि ईटीएस दृष्टिकोण से।
उपरोक्त रेखांकित बिंदुओं के क्रम में, ईटीएस के सैधांतिक और परिचालन पक्षों से जुड़े विभिन्न विषयों पर सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज के बीच एक निरंतर संपर्क स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि वे ईटीएस के लिए बेहतर ढंग से तैयार रहें और ईटीएस से संबंधित विभिन्न बातों को बारीकी से समझ सकें। यह सुनिश्चित करना भी सभी के हित में है कि ईटीएस की बनावट देश की सच्चाइयों के अनुरूप होनी चाहिए और इसमें एशिया व विश्व भर में संचालित ईटीएस प्रणालियों के विभिन्न स्वरूपों से प्राप्त होने वाले अनुभव भी शामिल रहें। भारतीय हितधारकों के लिए इस प्रणाली के बारे में गहराई के साथ जानकारी होनी बहुत जरूरी है, ताकि वे सुपरिचित ऑफसेट दृष्टिकोण से परे जाकर देख और सोच सकें।
कार्बन से संबंधित वैश्विक बहस में, कार्बन क्रेडिट को अलग-अलग नाम दिए गए हैं: सीडीएम मार्केट में प्रमाणित उत्सर्जन कटौती (सीईआर), जेआई मार्केट में उत्सर्जन कटौती इकाई (ईआरयू) और ईयू-ईटीएस में भत्ता, इत्यादि। चूंकि भारतीय हितधारकों के पास ऑफसेट मार्केट दृष्टिकोण का काफी अनुभव है, इसलिए भारत में कार्बन क्रेडिट सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाला शब्द है और इसको कार्बन उत्सर्जन कटौती या विभिन्न तरह की निष्कासन इकाइयों (removal units) को परिभाषित करने के लिए उपयोग किया जाता है। हालांकि, अपने नवीनतम संचार में बीईई ने तीन अलग-अलग कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्रों की रूपरेखा सामने रखी है: सी-सीसीसी, एम-सीसीसी और ओ-सीसीसी। इसके अलावा, ऐसे भी प्रावधान हैं कि कुछ क्रेडिट की सिर्फ घरेलू स्तर पर और कुछ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खरीद-बिक्री की जाएगी, और उन्हें बगैर किसी विशिष्ट वर्गीकरण के विभिन्न पद्धतियों की जांच से गुजरना पड़ेगा। भारतीय बाजार में विभिन्न प्रकार के क्रेडिट को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना और नाम तय करना उपयोगी होगा, ताकि विभिन्न हितधारकों के बीच संचार में स्पष्टता रहे। भारत में अनुपालन और स्वैच्छिक बाजारों में कार्बन उत्सर्जन शमन इकाइयों का वर्गीकरण घरेलू हितधारकों के लिए काफी उपयोगी होगा।
चाहे अनुपालन मार्केट (सीडीएम) के माध्यम से हो या स्वैच्छिक मार्केट के, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज में सभी में भारतीय हितधारकों के पास परियोजना-आधारित दृष्टिकोण का व्यापक अनुभव है।
ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 का संशोधन और नीति पत्र, एक 'स्वैच्छिक' कार्बन क्रेडिट मार्केट बनाने का प्रस्ताव रखता है, जहां सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी द्वारा कार्बन क्रेडिट को जारी किया जाएगा, और संगठनों व व्यक्तियों समेत स्वैच्छिक खरीदारों को बेचा जाएगा। स्वैच्छिक खरीदार भी बाजार से एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स को खरीद सकते हैं। इसने बाजार के भागीदारों के बीच कुछ भ्रम पैदा किया है, क्योंकि पहले से ही एक मजबूत स्वैच्छिक बाजार मौजूद है, जो इस आधार पर सच्चे अर्थों में स्वैच्छिक है कि इसमें सरकार का कोई दखल नहीं है, और इन क्रेडिट्स की मांग, आपूर्ति और सत्यापन जैसे सभी कार्य निजी क्षेत्र करता है। सरकार से प्रशासित होने वाली योजना में 'स्वैच्छिक' शब्द का शामिल किया जाना उचित और सूझ-बूझ से भरा है, क्योंकि बाजार के भागीदारों को शुरुआती चरणों में ही विवश नहीं किया जाना चाहिए, जब तक वे यह नहीं समझ लें कि वास्तविक व्यवहार में बाजार कैसे काम करेगा। हालांकि, सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि सरकार द्वारा प्रशासित 'स्वैच्छिक' बाजार का निजी क्षेत्र द्वारा संचालित वर्तमान स्वैच्छिक बाजार से कोई रिश्ता नहीं है।
वर्तमान पीएटी योजना और आरईसी योजना की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि बाजार में एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स और आरईसी के लिए मांग कम है। अतिरिक्त आपूर्ति के कारण आरईसी और एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स की कीमतों में गिरावट आई है। प्रस्तावित कार्बन क्रेडिट मार्केट का लक्ष्य एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स और आरईसी के लिए मांग पैदा करना है, जो प्रशंसनीय है। यह आशा है कि निर्धारित प्रक्रिया में, कार्बन क्रेडिट के लिए एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स और आरईसी के परिवर्तनीयता के नियमों को अंतिम रूप दे दिया जाएगा, और उसके बाद विनिमय शुरू हो जाएगा। हालांकि, इस दृष्टिकोण का निश्चित रूप से यह अर्थ नहीं है कि नए और अतिरिक्त कार्बन उत्सर्जन घट जाएगा। इस प्रस्तावित बाजार का आखिरी चरण एक ईटीएस होगा, जो परिवर्तनीयता की समस्या के कारण प्रारंभिक चरण से होने वाला एक स्वाभाविक विकास नहीं होगा। एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स और आरईसी की अबिक्रीत सूची के साथ कंपनियों को मूल्य देना अति-महत्वपूर्ण है, लेकिन इन्हें कार्बन मार्केट में शामिल करना जटिल हो सकता है और जहां तक दीर्घावधि के ईटीएस मार्केट के प्रारूप की बात है, यह भ्रम पैदा कर सकता है। इसका समाधान करने के लिए वैकल्पिक उपायों को खोजना उपयोगी होगा। उदाहरण के लिए, जब सरकार की नीलामी शुरुआत करती है, तब वह कुछ राजस्व को अबिक्रीत सीईआर और एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स का समाधान करने में उपयोग कर सकती है। यह शुरुआत से ही ईटीएस के लिए एक सरल प्रारूप का अवसर दे सकेगा। इसके अलावा, बेंचमार्क-आधारित आवंटन का इस्तेमाल करते हुए ईटीएस प्रारूप पीएटी योजना के अंतर्गत ऐसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनकर्ताओं को पुरस्कृत करेगा, जिनके पास अत्यधिक मात्रा में अबिक्रीत एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट मौजूद हैं, जिससे उन्हें अपने वास्तविक कार्बन उत्सर्जन की तुलना में किसी ईटीएस में नि:शुल्क भत्तों का ज्यादा हिस्सा मिल सकेगा और भत्ता खरीदने की कम जरूरत और बिक्री के लिए ज्यादा संभावना होने से उनके लिए वित्तीय रूप से लाभकारी होगा।
एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट्स और आरईसी की अबिक्रीत सूची के साथ कंपनियों को मूल्य देना अति-महत्वपूर्ण है, लेकिन इन्हें कार्बन मार्केट में शामिल करना जटिल हो सकता है और जहां तक दीर्घावधि के ईटीएस मार्केट के प्रारूप की बात है, यह भ्रम पैदा कर सकता है।
अपने जैसी अन्य अंतरराष्ट्रीय कार्बन उत्सर्जन ट्रेडिंग योजनाओं से नहीं जुड़े होने पर घरेलू कार्बन मार्केट अंतरराष्ट्रीय वित्त के लिए माध्यम नहीं हो पाएगा, लेकिन यह घरेलू वित्त का एक अच्छा स्रोत होगा
भारत सीडीएम के माध्यम से ऐतिहासिक रूप से कार्बन क्रेडिट की बिक्री करता रहा है। इस विकल्प के अलावा निजी क्षेत्र द्वारा संचालित स्वैच्छिक कार्बन मार्केट भी भारत में जलवायु वित्त का एक चालक रहा है। क्रेडिट के स्वैच्छिक आपूर्तिकर्ता अंतरराष्ट्रीय कंपनियों और भारतीय कंपनियों, दोनों से वित्त प्राप्त करते हैं। आखिरकार, ये सभी ऑफसेट सिस्टम हैं। ईटीएस दृष्टिकोण मूल रूप से अलग होता है, क्योंकि इसमें लागत-प्रभावी घरेलू जीएचजी मिटिगेशन के अंतिम लक्ष्य पर ध्यान होता है। ईटीएस सिस्टम में सभी भागीदार सामूहिक कार्बन उत्सर्जन सीमा को पाने के लिए लागत-प्रभावी ढंग से आपस में व्यापार कर रहे हैं। इसलिए, घरेलू ईटीएस में क्रेडिट की खरीदारी के लिए पैसा एक भागीदार से दूसरे भागीदार के बीच में प्रवाहित हो रहा है। भारत की शमनकारी गतिविधियों के वित्त पोषण में विदेशी पूंजी का प्रवाह सुनिश्चित करने का एकमात्र उपाय है कि भारत का ईटीएस (विक्रेता के रूप में) ईयू-ईटीएस जैसे वैश्विक ईटीएस से जुड़ा हो। ऐसा न होने पर, केवल यूएनएफसीसीसी-आधारित (जैसे कि अनुच्छेद 6 से संबंधित कार्बन मार्केट) या स्वैच्छिक गतिविधि-निर्देशित बाजार ही भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त के एक स्रोत बन सकेंगे। इसके बावजूद, किसी ईटीएस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह नीलामी राजस्व से बड़ी मात्रा में घरेलू वित्त को जुटाने का अवसर दे सकता है, जो यूरोपीय संघ के अनुभवों की तरह ऊर्जा-गहन उद्योग और बिजली क्षेत्रों के लिए नेट-जीरो परिवर्तन के वित्तपोषण में प्रमुख भूमिका निभा सकता है, साथ में ऊर्जा की बढ़ती कीमतों से कमजोर हितधारक समूहों को भी बचा सकता है।
यूएनएफसीसीसी-आधारित मार्केट किसी न किसी रूप में बना रहेगा। इसके अलावा, निजी क्षेत्र द्वारा संचालित स्वैच्छिक मार्केट का विद्यमान रहना जरूरी है, ताकि इस बाजार के माध्यम से निजी क्षेत्र में अधिक महत्वाकांक्षी कदमों (विनियमन के कारण जो आवश्यक है उससे आगे) का संचालन किया जा सके। ये दोनों ही ऑफसेट (परियोजना-आधारित) से संबंधित निवेशों के माध्यम से कंपनियों के लिए वित्त के स्रोत होंगे। इनके अलावा, एक ईटीएस पूरे देश में डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले एक प्रमुख साधन के रूप में काम करेगा। बाजार के इन तीनों वैकल्पिक रूपों में अंतरराष्ट्रीय वित्त को उपलब्ध कराने के साथ-साथ भारत के घरेलू शमन लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता मौजूद है। यह समझना ज़रूरी है कि भारत में फलने-फूलने के लिए इन तीनों वैकल्पिक बाजार प्रारूपों के बीच कैसे संतुलन बनाया जाना चाहिए।
भारत सरकार द्वारा कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना को स्थापित करने की घोषणा एक नई शुरुआत है। हितधारकों के साथ चर्चा के आधार पर, हमारे आकलन का प्रमुख सुझाव यह है कि ईयू-ईटीएस और कोरियाई ईटीएस जैसे एशिया और विश्व भर में फैले विभिन्न ईटीएस की तरह एक ईटीएस के विकास के साथ भारत को ऊर्जा परिवर्तन के प्रारंभिक चरण से अनुरूपता लानी चाहिए। भारत सरकार को स्वैच्छिक ऑफसेट कार्बन मार्केट में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और इसे कुशलता व स्वतंत्रता के साथ संचालित होने देना चाहिए। हालांकि, भारत के अनुपालन बाजार, जैसे ईटीएस, को विश्व भर की अन्य ईटीएस प्रणालियों के अनुभवों से सीखते हुए अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और आर्थिक संरचना को प्रतिबिंबित करना चाहिए। भारतीय हितधारकों को घरेलू ईटीएस को अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त की जगह पर डीकार्बोनाइजेशन और घरेलू जलवायु वित्त के साधन के रूप में देखना चाहिए। आदर्श रूप में, इसे स्थापित करने की प्रक्रिया स्पष्ट और सरल होनी चाहिए और परिवर्तनीयता संबंधी समस्याओं के उलझाव से बचा जाना चाहिए, जो कि बाजार के भागीदारों को भ्रमित कर सकता है। एक प्रायोगिक चरण के माध्यम से ईटीएस के परिचालन की प्रकृति को समझने के लिए बाजार भागीदारों और नियामकों को पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। सफलता प्राप्त करने के लिए, यह जरूरी है कि हम आवश्यक अवधारणाओं को स्पष्ट करते हुए शुरुआत करें और सभी हितधारकों के बीच बाजार के वैकल्पिक स्वरूपों के बारे में एक उन्नत समझ को विकसित करें, जो इस इश्यू ब्रीफ को लाने की प्रेरणा भी है।
कार्बन मार्केट, ऐसे बाजार हैं, जिसमें एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO2e) को एक व्यापार योग्य यूनिट की तरह उत्पाद माना गया है या कमोडिफाइड किया गया है। यह यूनिट ईटीएस प्रणाली के तहत जारी एक उत्सर्जन भत्ते या फिर ऑफसेट (प्रोजेक्ट-आधारित) के तहत जारी एक वेरिफाइड इमीशन रिडक्शन/रिमूवल क्रेडिट (ऑफसेट) के रूप में हो सकती है। कार्बन मार्केट का उद्देश्य जीएचजी उत्सर्जन के लिए एक मूल्य संकेत (price signal) लाना है, जो उत्सर्जन कटौती को बढ़ाता हो। कार्बन मार्केट का उद्देश्य कंपनियों को अपने कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए प्रोत्साहित करना और उत्सर्जन सीमा का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाना है, ताकि जीएचजी उत्सर्जन के लिए एक मूल्य संकेत मिल सके और उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को बढ़ावा मिल सके।
मोटे तौर पर कार्बन मार्केट के दो स्वरूप हैं- ऑफसेट और इमीशन ट्रेडिंग सिस्टम। ऑफसेट-आधारित मार्केट ऑफसेट का उत्पादन परियोजना-आधारित प्रणाली के माध्यम से होता है। यदि किसी परियोजना के परिणामस्वरूप जीएचजी उत्सर्जन में कमी या हटाना (removal) होता है, तो परियोजना विकासकर्ता (Project developer) घटाए या हटाए गए प्रति टन कार्बन डाई-ऑक्साइड उत्सर्जन के आधार पर एक क्रेडिट के साथ कार्बन क्रेडिट का दावा कर सकता है। परियोजना विकासकर्ता इन क्रेडिटों को उन व्यक्तियों, संगठनों या क्षेत्राधिकारों (Jurisdictions) को बिक्री कर सकता है, जो अपने उत्सर्जन की भरपाई करने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र आधारित बाजार क्योटो प्रोटोकॉल के तहत सीडीएम और जेआई के रूप में और पेरिस समझौते के तहत अनुच्छेद-6 बाजार के रूप में मौजूद हैं। एक ईटीएस एक मात्रा-आधारित उपकरण है, जिसमें विनियमित कंपनियां जीएचजी उत्सर्जन की एक निश्चित मात्रा तक सीमित रहती हैं। यह सीमा “कैप” कहलाती है। उत्सर्जन परमिट बोलियों के माध्यम से विभिन्न समूहों को दिए और साझा किये जाते हैं। एक ईटीएस दायरे में आने वाली संस्थाओं के बीच लागत प्रभावी ढंग से उत्सर्जन में कमी लाने (शमन) की सुविधा देता है। जैसे - ईयू ईटीएस, के-ईटीएस
भारत में सीडीएम मार्केट और स्वैच्छिक कार्बन मार्केट के रूप में एक कार्यात्मक ऑफसेट मार्केट है और कार्बन मार्केट में भारतीयों का अनुभव पूरी तरह से परियोजना-आधारित/ऑफसेट दृष्टिकोण से जुड़ा है। इसके अलावा, भारत के पास ऊर्जा दक्षता को बढ़ाने के लिए प्रदर्शन प्राप्ति और व्यापार (Perform Achieve and Trade) (PAT) कार्यक्रम और अक्षय ऊर्जा को अपनाने को बढ़ावा देने के लिए रिन्यूएबल परचेज ऑब्लिगेशन (आरपीओ) के रूप में बाजार-आधारित उपकरणों को लागू करने का भी अनुभव है।
अभी तक, भारत में कार्बन मार्केट सीडीएम बाजार के लिए यूएनएफसीसीसी और स्वैच्छिक कार्बन मार्केट के लिए निजी संस्थानों द्वारा संचालित थे। लेकिन भारत सरकार ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में संशोधन किया है, जो भारतीय कार्बन मार्केट की नींव रखता है। भारतीय कार्बन मार्केट में एक अनुपालन और स्वैच्छिक बाजार शामिल होगा और यह सरकार द्वारा विनियमित किया जाएगा।
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